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अडानी को राहत दिलाने में कामयाब मोदी-ट्रंप मुलाकात ?

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नरेंद्र मोदी सरकार ने ट्रंप प्रशासन से संपर्क बनाने और उसे ‘सही संकेत’ भेजने के लिए अति-सक्रियता दिखाई है। फिलहाल, भारत के व्यापक हितों से जुड़े मामलों में तो नहीं, लेकिन गौतम अडानी के मामलों में रुख कारगर हुआ माना जा सकता है। मगर ट्रंप ने तलवारें लटकाए रखी हैं, ताकि मोदी सरकार का मौजूदा रुख आगे भी उनके अनुकूल बना रहे। भारत की ओर से ट्रंप प्रशासन की इच्छाओं के अनुरूप कई कदम उठाए गए। ऐसे कदम उठाने का सिलसिला वैसे तो ट्रंप के चुनाव जीतने के साथ ही शुरू हो गया था, लेकिन हाल में इस बारे में कई खास एलान हुए।

सत्येंद्र रंजन

डॉनल्ड ट्रंप से बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति उनके दूसरे कार्यकाल में अपनी पहली मुलाकात से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काफी “निवेश” किया। कहा जा सकता है कि उनका ये दांव शुरुआती तौर पर कम से कम एक मामले में कामयाब रहा है।  

अमेरिका के जाने-माने समाचार माध्यम ब्लूमबर्ग ने पिछले हफ्ते इस बारे में अनुमान की कोशिश की थी कि मोदी की इस मुलाकात से क्या उम्मीद हो सकती है। इस मीडिया संस्थान के स्तंभकार ने अनुमान लगाया था कि मोदी दो राहतें पाने की आस लेकर अमेरिका पहुंच रहे हैं। ये हैः

इनमें से पहली उम्मीद पूरी हुई है।      

राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपने अटार्नी जनरल को ‘विदेश भ्रष्ट आचरण अधिनियम’ (एफसीपीए) के तहत जारी तमाम मुकदमों की समीक्षा का आदेश दिया है। अमेरिका के न्याय मंत्रालय ने इसी कानून के तहत गौतम अडानी और उनकी कंपनियों के कई अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। आरोप है कि अडानी और उनके अधिकारियों ने अमेरिका में अडानी ग्रुप को ठेके दिलवाने में मदद के लिए भारतीय रिश्वत दी। 

ट्रंप ने आदेश दिया है कि जब तक समीक्षा पूरी नहीं हो जाती, इस कानून के तहत कोई नया मामला शुरू ना किया जाए। यह खबर आते ही भारतीय बाजारों में अडानी ग्रुप के शेयरों के भाव उछल गए। स्पष्ट है कि इसे अडानी ग्रुप के लिए बड़ी राहत माना गया है। 

इसके पहले भारत की ओर से ट्रंप प्रशासन की इच्छाओं के अनुरूप कई कदम उठाए गए। ऐसे कदम उठाने का सिलसिला वैसे तो ट्रंप के चुनाव जीतने के साथ ही शुरू हो गया था, लेकिन हाल में इस बारे में कई खास एलान हुए। मसलन, 

मोदी और ट्रंप दोनों की पहचान खुलेआम पूंजीपतियों के हित साधक नेता की रही है। उन्हें निवेशकों एवं उद्योगपतियों के साथ तालमेल बना कर शासन करने वाले नेता के रूप में देखा जाता है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी अगर किसी देश में निवेश का वादा करते हैं, तो उसका अर्थ होता है कि वे भारतीय अरबपतियों को वहां पैसा लगाने के लिए प्रेरित करेंगे। अडानी और अंबानी ग्रुप के जताए गए इरादों के मद्देनजर यह संकेत ग्रहण किया जाता है कि भारतीय निवेशक अमेरिका में नया निवेश करेंगे।

मोदी सरकार ने ट्रंप को प्रसन्न रखने के खास कदमों के साथ-साथ ट्रंप के भारत विरोधी बयानों पर प्रतिक्रिया ना जताने का रुख भी अपनाया है। जाहिर है, उसने खास संकेत दिए हैं कि अमेरिकी धुरी के साथ भारत के संबंध मजबूत रखने को लेकर वह कृत-संकल्प है। 

इसीलिए अडानी को मिली राहत को इस रुख के परिणाम के रूप में देखा गया है। 

क्या पन्नू मामले में भी ट्रंप सरकार से भारत को राहत मिलेगी? इस बारे में कुछ संकेत मोदी-ट्रंप वार्ता के बाद मिल सकते हैं।  

बाकी मामलों में ट्रंप अपनी अमेरिका फर्स्ट नीति की कीमत पर कोई रियायत करेंगे, इसकी संभावना नहीं है। अमेरिका ने अवैध आव्रजकों को जिस अपमानजनक ढंग से भारत लौटाया, उससे देश में नरेंद्र मोदी सरकार की भारी किरकिरी हुई। मगर उससे ट्रंप विचलित नहीं हुए। 

वैसे यह अकेला मुद्दा नहीं है। कुल मिलाकर डॉनल्ड ट्रंप के दौर में उभरती सूरत भारत के व्यापक हितों के अनुकूल नहीं दिखती। प्रधानमंत्री जब अमेरिका यात्रा के लिए तैयार हो रहे थे, तभी ट्रंप ने भारत को असहज करने वाला एक और बड़ा कदम उठा लिया।

उन्होंने चाबहार बंदरगाह के मामले में एक नया आदेश जारी किया। भारत ईरान में चाबहार पोर्ट बना रहा है। ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में चाबहार पोर्ट बनाने को लेकर भारत को छूट दी थी, लेकिन अब रुख बदल गया है। ह्वाइट हाउस ने ईरान पर ‘अधिकतम दबाव’ बनाने की नीति घोषित की है।

उससे संबंधित बयान में कहा गया है- ‘जो देश ईरान को किसी भी तरह से आर्थिक फ़ायदा पहुंचाते हैं, उन्हें प्रतिबंध से मिली छूट में या तो परिवर्तन होगा या उसे रद्द कर दिया जाएगा। इसमें ईरान का चाबहार पोर्ट भी शामिल है।’ 

ट्रंप ने भारत से आयात होने वाली वस्तुओं पर नए शुल्क लगाने की धमकी दे रखी है, हालांकि अभी तक उसने ये कदम उठाया नहीं है। इस सिलसिले में गौरतलब है कि भारत ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है। हालांकि भारत डॉलर का वर्चस्व खत्म करने की परियोजना से खुद को अलग दिखाता रहा है, मगर ब्रिक्स अंतरराष्ट्रीय भुगतान की वैकल्पिक व्यवस्था बनाने में जुटा हुआ है। इसके अलावा भारत ने भी अनेक देशों के साथ द्विपक्षीय कारोबार का भुगतान अपनी- अपनी मुद्राओं में करने के करार किए हैं। 

ट्रंप ने ऐसे देशों पर 100 फीसदी आयात शुल्क लगाने की धमकी दी है। फिर यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि अडानी के मामले की अभी समीक्षा भर का आदेश ट्रंप ने दिया है। मुकदमे को रद्द करने का फैसला अभी नहीं हुआ है। तो अडानी मामले और चारबहार मामले की तलवारें भी अभी लटक ही रही हैं। 

ट्रंप की धमकियों पर नरेंद्र मोदी सरकार की व्यग्रता अक्सर जाहिर हुई है। इसी क्रम में उसने ट्रंप प्रशासन से संपर्क बनाने और उसे ‘सही संकेत’ भेजने के लिए अति-सक्रियता दिखाई है। फिलहाल, भारत के व्यापक हितों से जुड़े मामलों में तो नहीं, लेकिन गौतम अडानी के मामलों में रुख कारगर हुआ माना जा सकता है। मगर ट्रंप ने तलवारें लटकाए रखी हैं, ताकि मोदी सरकार का मौजूदा रुख आगे भी उनके अनुकूल बना रहे। 

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