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मोहब्बतें

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भारमल गर्ग “विलक्षण”

मिरी अलमारी में रहती है चार मोहब्बतें
धुआं उड़ता रहता है ख़ाक होती मोहब्बतें !!

उसने छोड़ा तो हुई सिगरेटो से मोहब्बतें
रूह उजाड़ती जिस्म गुजारती मोहब्बतें !!

विद्यालय का प्रांगण याद दिलाता है बातें
बचपन में लोटा तो याद आई मोहब्बतें !!

यह दुनिया बड़ी खूबसूरत और वीरानी भी
अश’आर मुकमल ग़ज़ल की मोहब्बतें !!

जब से देखा है पेड़ से लटकती लाशों को
किताबें अनपढ़ है यार ज़िंदगी मोहब्बतें !!

तिरा वो ख्याल सताता है रात भर’ मुझे
लोग क्या कहेंगे ? दीवाने की मोहब्बतें !!

मिरे कमरे में साथ रहती है आखरी तन्हाई
दो-चार डिब्बे-बोतल खजूर बस मोहब्बतें !!

गुजरते दिनों का कोई सानी नहीं बनता
दोस्त ज़िंदगी में कितनी छूटती मोहब्बतें !!

विलक्षण तेरा हर राज़ सानी में छुपा मिला
बचपन की स्कूल से यार तेरी मोहब्बतें !!

इक शे’र अक्सर पंडित बज़्म में सुनाता है
मतले से मक्ते तक मोहब्बतें ही मोहब्बतें !!

साहित्य पंडित श्री भारमल गर्ग “विलक्षण”
पुलिस लाईन जालौर राजस्थान (३४३०४१)
अणुडाक:- bhamugarg@gmail.com
bharmalgarg2016@gmail.com

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