अग्नि आलोक

*आदिवासी वर्ग की महिलाओं के साथ हो रहे दुराचारों को रोकने में मोहन सरकार हुई नाकाम*

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*पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता कमलनाथ ने आदिवासी वर्ग को मजबूती देने के लिये उठाये थे महत्वपूर्ण कदम*

*मुख्यमंत्री रहते हुए कमलनाथ ने आदिवासी वर्ग के लिये थे कई आवश्यक फैसले*

*दलगत रा‍जनीति की सोच से उपर होना चाहिए आदिवासियों का कल्‍याण*

*विजया पाठक

मध्यप्रदेश सरकार की कथनी और करनी में जमीन और आसमान का अंतर होता है। लेकिन वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपने 18 महीने के कार्यकाल में आदिवासी वर्ग के लिये जो कहा उसे न सिर्फ पूरा किया बल्कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद आदिवासियों को उस योजना का लाभ निरंतर मिलता रहे उसकी चिंता करते हुए लगातार प्रयास किये। वहीं उसके उलट प्रदेश की डॉ. मोहन यादव की सरकार के कार्यकाल की बात करें तो इसमें सबकुछ अलग दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि आज आये दिन आदिवासी महिलाओं, बहनों के साथ दुराचार, बालात्कार, छेड़छाड़, लूट और मारकाट की घटनाएं सामने आ रही हैं। जनजातीय वर्ग के साथ लगातार हो रही इस तरह की घटनाएं न सिर्फ चिंता का कारण हैं बल्कि यह प्रदेश सरकार की खस्ताहाल कानून व्यवस्था की ओर भी इशारा करती है।

*खंडवा की घटना ने किया शर्मसार*

मध्यप्रदेश में आज आदिवासी समाज की ऐसी स्थिति हो गई है कि वे खुद को पूरी तरह से असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। पिछले दिनों खंडवा में आदिवासी महिला के साथ हुई दरिंदगी ने इस बात को और स्पष्ट कर दिया है कि मध्यप्रदेश में आदिवासी वर्ग आज भी सुरक्षित नहीं है। यह असुरक्षा का भाव न केवल प्रदेश सरकार की नाकामी को जाहिर करता है बल्कि यह प्रदेश की लचर कानून व्यवस्था और गृह मंत्रालय का जिम्मा संभाल रहे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की असफलता को भी दर्शाता है।

*इससे पहले भी हो चुकी हैं आदिवासियों के साथ घटनाएं*

इससे पूर्व कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश के गुना में सहरिया आदिवासी महिला रामप्यारी बाई को एक ज़मीन विवाद में जिंदा जलाने की कोशिश की गई। यही नहीं मध्यप्रदेश के मऊगंज जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर बसा गड़रा गांव में आदिवासी कोल समाज के एक परिवार के ऊपर जानलेवा हत्या की कोशिश की। प्रदेश के आदिवासियों पर हो रहे यह इस तरह के अत्याचार चिंता का कारण हैं। जिस प्रकार से दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार हो रहे हैं, उसमें प्रदेश तीसरे नंबर पर आ चुका है। मण्डला की घटना के बाद जवाब आया था कि यदि वे नक्सली नहीं हैं तो उन्हें पैसे दिए जाएंगे, लेकिन अब तक इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

*कमलनाथ ने साधा भाजपा और मुख्यमंत्री पर निशाना*

पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपने गृह जिले छिंदवाड़ा में आदिवासियों की जमीनें भू-माफिया द्वारा हड़पने का आरोप लगाया है। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को खुला पत्र लिखकर न केवल भू-माफियाओं पर निशाना साधा, बल्कि जिला प्रशासन पर भी सीधे-सीधे मिलीभगत के आरोप जड़ दिए। कमलनाथ ने पत्र में लिखा है कि छिंदवाड़ा आदिवासी बहुल जिला है, जहां जामई, तामिया, हर्रई, अमरवाड़ा, बिछुआ और पांढुर्ना जैसे क्षेत्र आदिवासी संस्कृति की पहचान हैं, लेकिन अब इन क्षेत्रों में संगठित भू-माफिया नेटवर्क सक्रिय हो चुका है, जो आदिवासियों की जमीनें औने-पौने दाम में खरीदने, फर्जी अनुबंध कराने और बाद में नामांतरण कराकर उन्हें गैर-आदिवासियों के नाम दर्ज कराने में जुटा है। कमलनाथ ने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि इस पूरे मामले में जिला प्रशासन की भूमिका संदिग्ध है। उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में प्रशासन की चुप्पी यह संकेत देती है कि या तो प्रशासन मूकदर्शक है या फिर इस साजिश में सहभागी।

*वन अधिकार कानून लाने का श्रेय कमलनाथ को जाता है*

मध्य प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने आदिवासियों के लिए बड़ा फैसला किया है। कमलनाथ ने अपने कार्यकाल में यूपीए सरकार में लागू वन अधिकार कानून को लागू करने का फैसला किया। कमलनाथ का यह फैसला आदिवासियों को उनकी ज़मीन का हक़ देने और उनके दावों पर विचार करने के लिये आवश्यक था। जाहिर है कि इस कानून का लाभ प्रदेश की 21 फीसदी आदिवासी आबादी को मिला। उल्लेखनीय है कि कमलनाथ सरकार ने आदिवासियों के ज़मीन संबंधी उन दावों पर फिर से विचार कर उन्हें संबल दिया जिन्हें शिवराज सरकार के दौरान रद्द कर दिया गया था। अपनी योजना के तहत कमलनाथ सरकार ने साढ़े तीन लाख दावों पर दोबारा विचार किया।

मुख्‍यमंत्री मोहन यादव को अपने वरिष्‍ठ नेताओं अटल बिहारी वाजपेयी जैसे उच्‍च विचारों वालों से सीखना चाहिए जो सत्‍ता में रहते हुए विपक्ष के नेताओं से सलाह लेकर लोगों के कल्‍याण की योजनाओं को बनाते थे और उन्‍हें लागू करते थे। आखिर लोगों के कल्‍याण के लिए बनाई जाने वाली योजनाओं में कैसी राजनीति करना।

*कमलनाथ सरकार ने तैयार किया था वन मित्र सॉफ्टवेयर*

कमलनाथ सरकार में इसके लिए वन मित्र सॉफ्टवेयर तैयार किया गया था। इसके जरिए आदिवासी दोबारा दावा कर सकेंगे। इसके लिए आदिवासी इलाकों में वन रक्षक नियुक्त किए जाएंगे जो आदिवासियों के दावों से जुड़ी जानकारी सॉफ्टवेयर में अपलोड करेंगे। इसके लिए वन रक्षकों को सरकार कुछ राशि का भुगतान करेगी। सरकार की कोशिश थी कि वनक्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों को उनकी ज़मीन का अधिकार दिया जाए। सरकार का दावा था कि मार्च 2020 तक सभी दावों पर विचार कर आदिवासियों को जमीन का अधिकार दे दिया जाएगा।

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