मनोज अभिज्ञान
पहली बार ऐसा नहीं है जब किसी महाशक्ति ने दुनिया को यह याद दिलाया हो कि सिद्धांत अक्सर तभी तक ज़िंदा रहते हैं, जब तक वे लाभ में बाधा न बनें। फर्क बस इतना है कि इस बार यह बात कूटनीतिक संकेतों या फाइलों के भीतर नहीं, बल्कि खुले मंच से कही जा रही है। डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति में नैतिक भाषा आवरण मात्र है, असली केंद्र आर्थिक हिसाब-किताब है। राष्ट्र की सुरक्षा को अब सीमाओं या संधियों से नहीं, बल्कि तेल, खनिज और व्यापार मार्गों से परिभाषित किया जा रहा है। यह दृष्टि बताती है कि शक्ति का नया पैमाना हथियार नहीं, बल्कि संसाधनों तक पहुंच है।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बीसवीं सदी की उस धारणा को उलट देता है, जिसमें प्रभाव क्षेत्र शब्द को ही संदिग्ध माना जाने लगा था। शीत युद्ध के बाद ऐसा लगा था कि दुनिया धीरे-धीरे नियमों और संस्थाओं की ओर बढ़ रही है, जहां ताकतवर देशों को भी औचित्य साबित करना पड़ता है। लेकिन ट्रंप का रुख यह संकेत देता है कि इतिहास का पहिया पीछे की ओर भी घूम सकता है। जब नेता खुले तौर पर यह कहने लगें कि संसाधन हमें चाहिए, तब यह सिर्फ किसी एक देश की नीति नहीं रहती, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था के लिए चेतावनी बन जाती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस सोच को आज व्यवहार में उतारना शुरू किया है, वह नई नहीं है, बस उसे नया नाम और खुली भाषा मिल गई है। इसे कुछ लोग ‘Donroe Doctrine’ कह रहे हैं। नाम भले नया हो, पर आत्मा पुरानी है। वही जो उन्नीसवीं सदी में अमेरिका को यह कहने का नैतिक साहस देती थी कि पश्चिमी गोलार्ध उसकी खास ज़मीन है।
वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के पीछे अमेरिका ने कई कारण गिनाए। तानाशाही, जनता पर अत्याचार, विरोधी शक्तियों से नजदीकी, ड्रग तस्करी और पलायन का संकट। लेकिन जब Donald Trump ने खुद कारण बताया, तो तस्वीर साफ हो गई। उन्होंने कहा कि वेनेज़ुएला में अद्भुत ऊर्जा संसाधन हैं और अमेरिका को उनकी जरूरत है। बात सीधी थी। नैतिकता बाद में, तेल पहले।
यहीं से ट्रंप का नजरिया स्पष्ट होता है। उनके लिए विदेश नीति लेन-देन का हिसाब मात्र है। उनका मानना है कि अमेरिका को उनके अपने गोलार्ध में व्यापार, संसाधन और भूभाग की रक्षा हर हाल में करनी चाहिए। यह सोच सीधे-सीधे उस सिद्धांत की याद दिलाती है, जिसे 1823 में जेम्स मुनरो ने पेश किया था। फर्क बस इतना है कि तब बात यूरोपीय ताकतों को दूर रखने की थी, और अब बात चीन व रूस जैसी शक्तियों से संसाधन बचाने की है।
यह नया रुख द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी अमेरिकी रणनीति से भी खिलाफ है। शीत युद्ध के दौर में अमेरिका ने खुद को लोकतंत्रों का रक्षक और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का नेता बताया। गठबंधन, संस्थाएं और साझा मूल्य उसकी भाषा थे। ट्रंप की भाषा अलग है। उनकी भाषा में राष्ट्र हित का मतलब है आर्थिक फायदा, और सुरक्षा का मतलब है संसाधनों पर पकड़। सवाल खड़ा होता है कि अगर अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध को अपना प्रभाव क्षेत्र मानता है, तो क्या वह चीन को ताइवान या एशिया में और रूस को यूक्रेन व पड़ोसी देशों में वही अधिकार देने को तैयार है? आधिकारिक जवाब तो नही है, लेकिन ट्रंप के बयानों और नरमी भरे सुरों ने इस नहीं को कमजोर बना दिया है।
‘Donroe Doctrine’ का दूसरा डरावना पहलू है अगला नंबर किसका? वेनेज़ुएला के बाद संकेत ग्रीनलैंड की ओर गए। ट्रंप प्रशासन से जुड़ी रही केटी मिलर द्वारा ग्रीनलैंड का अमेरिकी झंडे वाला नक्शा और उस पर लिखा SOON इसी मानसिकता का संकेत था। ग्रीनलैंड लोकतांत्रिक है, डेनमार्क के अधीन है और नाटो का हिस्सा है। फिर भी उसका विस्तार और खनिज संपदा उसे आकर्षक बनाती है।
इतिहास बताता है कि जब मुनरो सिद्धांत ने साम्राज्यवादी रूप लिया, तो अमेरिका ने हवाई को जोड़ा, प्यूर्टो रिको, फिलीपींस और गुआम पर कब्जा किया, और पनामा को कोलंबिया से अलग कराया। उस दौर में उपनिवेश व्यापारिक संपत्ति माने जाते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसी सोच से दुनिया को बचाने के लिए नियम बनाए गए, ताकि टैरिफ और कब्जे आर्थिक युद्ध का औजार न बनें।
फिर भी अमेरिका पूरी तरह बदला नहीं था। 1953 में ईरान का तेल हो या 1954 में ग्वाटेमाला की फल कंपनियां, आर्थिक हित कई बार हस्तक्षेप की वजह बने। फर्क बस इतना था कि समय के साथ इन बातों को खुलकर कहने में झिझक आने लगी थी।
‘Donroe Doctrine’ की कमजोरी यह है कि वह संसाधनों के महत्व को बढ़ा-चढ़ाकर देखती है। आज अमेरिका की ताकत कच्चे माल से नहीं, बल्कि तकनीक, सेवाओं और मानव कौशल से आती है। वेनेज़ुएला के पास तेल बहुत है, लेकिन निकालना महंगा और जटिल है। ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज हैं, पर वहां की कठोर भौगोलिक परिस्थितियां उन्हें लाभकारी बनाना मुश्किल करती हैं।
इतिहास में साम्राज्य इसलिए टूटे क्योंकि उपनिवेशों ने विद्रोह किया। वैश्वीकरण ने उपनिवेशवाद की जगह ली। यही वजह है कि मादुरो से छुटकारा चाहने वाले वेनेज़ुएलाई भी जरूरी नहीं कि अमेरिकी प्रभाव को खुशी-खुशी स्वीकार करें। ऊपर से चीन पहले ही ब्राज़ील, चिली और पेरू जैसे देशों का बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है। असल में ‘Donroe Doctrine’ किसी स्थायी विचारधारा से ज्यादा ट्रंप की निजी प्राथमिकताओं का विस्तार है। इसलिए शायद यह मुनरो सिद्धांत जितनी लंबी उम्र न पाए। लेकिन जब तक ट्रंप सत्ता में हैं, यह मान लेना ही बेहतर है कि अमेरिका की विदेश नीति में नैतिक भाषण कम और संसाधनों का हिसाब ज्यादा सुनाई देगा। यही इस दौर की सबसे बड़ी सच्चाई है।
ट्रंप की इस सोच में एक और परत है, जो अक्सर नजरअंदाज हो जाती है। यह सिर्फ विदेश नीति नहीं, घरेलू राजनीति का भी विस्तार है। अमेरिका के भीतर उद्योग, ऊर्जा और रोजगार को लेकर जो असुरक्षा है, ट्रंप उसे बाहरी संसाधनों से जोड़कर समाधान की तरह पेश करते हैं। वेनेज़ुएला का तेल या ग्रीनलैंड के खनिज उनके लिए भू-राजनीति से ज्यादा चुनावी तीर हैं। संदेश साफ है कि अमेरिका की समृद्धि के लिए बाहर देखना पड़ेगा, और अगर जरूरत हो तो दबाव भी बनाया जाएगा।
इस दृष्टिकोण में अंतरराष्ट्रीय कानून और साझेदारियों की भूमिका स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ती है। जिस नियम-आधारित व्यवस्था को अमेरिका ने खुद गढ़ने में बड़ी भूमिका निभाई थी, वही अब उसके रास्ते की रुकावट लगने लगी है। ‘Donroe Doctrine’ के तहत सहयोगी देश भी सिर्फ सहयोगी नहीं रह जाते, वे संभावित एसेट बन जाते हैं। ग्रीनलैंड इसका सबसे साफ उदाहरण है, जहां सुरक्षा सहयोग के बावजूद संसाधनों की लालसा रिश्तों पर भारी पड़ती दिखती है। यह सोच पुराने साम्राज्यों की याद दिलाती है, जहां दोस्ती और दबाव के बीच की रेखा बहुत पतली होती थी।
इस नीति का सबसे बड़ा जोखिम यह है कि अगर अमेरिका खुले तौर पर अपने गोलार्ध को प्रभाव क्षेत्र मानता है, तो चीन और रूस से अलग नैतिक मानक की उम्मीद स्वतः कमजोर हो जाती है। इससे वैश्विक राजनीति फिर से ताकत और कब्जे की भाषा में लौट सकती है। तकनीक, ज्ञान और आपसी निर्भरता के दौर में यह वापसी न सिर्फ अप्रासंगिक लगती है, बल्कि खतरनाक भी। ‘Donroe Doctrine’ शायद स्थायी न हो, लेकिन यह संकेत जरूर है कि आने वाले वर्षों में ताकतवर देशों की बातचीत कम और उनकी मांगें ज्यादा सुनाई दे सकती हैं।
यह पूरी बहस किसी एक सिद्धांत या एक राष्ट्रपति तक सीमित नहीं रह जाती। यह उस प्रश्न से टकराती है कि आधुनिक दुनिया में शक्ति का नैतिक आधार क्या है। क्या ताकत का अर्थ यह है कि जो सक्षम है वही तय करेगा कि क्या सही है, या फिर सही वही है जिसे साझा सहमति और नियम तय करें? इतिहास बताता है कि जब शक्ति अपने लिए नैतिक अपवाद गढ़ने लगती है, तब वह दूसरों को भी वही रास्ता अपनाने का निमंत्रण देती है। ऐसे में व्यवस्था नहीं बनती, केवल अस्थायी संतुलन बनता है, जो पहले झटके में ही टूट जाता है।
शायद असली परीक्षा संसाधनों की नहीं, बल्कि संयम की है। तकनीक और आपसी निर्भरता के इस दौर में किसी भी देश की समृद्धि अकेले संभव नहीं है, चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो। अगर दुनिया फिर से प्रभाव क्षेत्रों और ‘यह मेरा है’ की भाषा में लौटती है, तो नुकसान सिर्फ कमजोर देशों का नहीं होगा। यह उस कल्पना का भी अंत होगा कि मानव समाज अनुभव से सीखता है। इतिहास बार-बार दोहराया जा सकता है, लेकिन हर बार उसकी कीमत ज्यादा चुकानी पड़ती है

