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औरत विरोधी मानसिकता बदलने की सबसे ज्यादा जरूरत

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मुनेश त्यागी

      अखबारों को पढ़कर लगता है कि जैसे वर्तमान समय में औरत विरोधी मानसिकता और अपराधों की सुनामी आई हुई है। औरतों के विरुद्ध आज कल नई नई खबरें आ रही हैं जैसे अभी अभी खबर आई है कि एक नवजात बच्ची को लैट्रिन के पोट में डूबा कर मार दिया गया, एक बच्ची को एक शिक्षिका द्वारा पहली मंजिल से नीचे फेंक दिया गया, एक 60 वर्षीय ताई को उसके भतीजे ने 10 टुकड़ों में काटकर उसकी हत्या कर दी और उसके शरीर के अंगों को इधर-उधर फेंक दिया।

     इससे पहले श्रद्धा केस में उसके सत्तर टुकड़े करके जंगलों में फेंक दिए गए, मां बाप द्वारा अपनी बच्ची के पांच टुकड़े कर दिए गए करके मार दिया गया। भाई अपनी बहन को मार रहा है, पिता अपनी बेटी को मार रहा है। शिक्षिका अपने शिष्या को पीट रही है। इससे पहले भी अनुपमा के 70 टुकड़े करके जंगलों में फेंक दिया गया था और नैना साहनी केस में सुशील शर्मा ने अपनी प्रेमिका को तंदूर में जलाकर मार दिया था। ये औरत विरोधी अपराध आज भी थमने का नाम नहीं ले रहे हैं।

        बहुत सारे कानूनों के बाद भी औरत विरोधी अपराध थम नहीं ले रहे हैं। उनके खिलाफ बलात्कार हो रहे हैं, उन्हें पेड़ों से लटका कर मारा जा रहा है, जलाकर मार दिया जाता है,  उनकी अंतड़ियां निकाल निकाल दी जाती है। इस तरह के अपराधों को देखकर मन एकदम से विचलित होता हो जाता है। 2012 में निर्भया के साथ दिल दहला देने वाली बलात्कार और हत्या की को साजिश को अंजाम दिया गया था। फिर कठुवा केस में नाबालिक बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया।

      2012 की निर्भया हत्या के बाद कानूनों में कई तब्दीलियां की गई, अपराधी की उम्र सीमा घटाकर 16 कर दी गई, पर आज भी सोशल मीडिया के प्रचार के साथ 15 साल या उससे कम उम्र के अपराधी भयानक अपराध कर रहे हैं। हमने संबंध बनाने की सहमति की उम्र बढ़ाकर 18 साल कर दी है पर चिंता आज भी कायम है। 2014 के बाद यौन अपराधों से बच्चों को मुक्ति दिलाने के लिए पोक्सो कानून बनाया गया जिसके अंदर आज भी लगभग 70 फ़ीसदी बच्चियां इंसाफ के इंतजार में है।

      इस बीच महिलाओं की पुलिसिंग भी बढ़ी है,  कानूनों में विभिन्न बदलाव किए गए हैं। फास्ट ट्रेक कोर्ट की स्थापना की गई है। मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में लाने की मांग तेज हुई है। मुस्लिम महिलाओं द्वारा तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठाई है। अब शिक्षा के क्षेत्र में पहले से ज्यादा महिलाएं और लड़कियां मौजूद हैं। 2013 में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने के लिए कानून बनाया गया।

      2018 में कठुवा में एक बच्ची से सामूहिक बलात्कार यात्रा और हत्या के मामले में स्थानीय बार एसोसिएशन ने पुलिस को आरोप पत्र दाखिल करने से रोक दिया था। श्रद्धा वाकर मामले को भी हिंदू और मुसलमान के मामले में उलझाया जा रहा है। आज हालत यह है कि तीन में से एक महिला को पति या परिवार के सदस्य पीटा जाता हैं। इन मामलों में सिर्फ 14% महिलाएं ही इसकी सूचना देती हैं बाकी की खबरें ही नहीं आतीं। यह भी मान कर चला जाता है कि पुलिस ऐसे मामलों में निजी मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगी, माता-पिता शर्मिंदगी से बचने के लिए बेटियों को समझौते की सलाह देते हैं, यही काम कई केसों में पुलिस भी करती है, दलित व आदिवासी लड़कियों महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों और उत्पीड़न पर बहुत सारे लोग सोते रहते हैं।  जल्दी बाजी में पुरुष किसी पीड़ित लड़की का अंतिम संस्कार कर देती है। आज हकीकत यह है कि न्याय पाने के लिए बहुत सारी लड़कियां अकेले ही लड़ रही हैं और अब तो मामला इस तरह से हिंदू मुस्लिम नफरत में बंट गया है कि कई मामलों में तो चुप्पी ही साध ली जाती है।

       यहां पर सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है कि इतने सारे नियम, कानून, पुलिस, वकील, जज और नेता होने के बावजूद भी औरतों को अपराधों से मुक्ति नहीं मिल रही है और उनके खिलाफ रोज नए-नए अपराध किए जा रहे हैं। अगर इन सब कारणों पर गंभीरता से विचार करें तो हम पाते हैं कि हमारे समाज में आज भी औरत विरोधी मानसिकता मौजूद है। आज भी औरत को मनोरंजन का सामान समझा जाता है, उसे भोग्या समझा जाता है। आज भी हमारा समाज लड़कियों को लड़कों के बराबर अधिकार देने को तैयार नहीं है। आज भी लड़कियां और औरतें दोयम दर्जे की नागरिक बनी हुई हैं ।

      दरअसल यह कानूनों की कमी का मामला नहीं है। यह औरत विरोधी मानसिकता और पितृसत्ता का मामला है जिसे मिटाने की इच्छा शक्ति का प्रदर्शन सरकार, पुलिस, वकील और विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका समेत किसी भी पक्ष ने नहीं किया है। आज जरूरत है कि बेटियों की अपेक्षा बेटों से काम कराए जाएं, कपड़े धुलवाये जाएं, घर का काम कराया जाए, सरकारी और समाज की बुनियादी सोच और ढांचे में सुधार करें। 

     सार्वजनिक जगहों पर महिला को भी पुरुषों के समान आवाजाही का अधिकार मिले, अधिक से अधिक पुलिस थानों में महिला डेस्क बनें। शिक्षकों, विधायकों, पुलिस थानों, वकीलों और न्यायाधीशों को अनिवार्य रूप से औरतों को लेकर संवेदनशील बनाया जाए। जब तक हमारी औरत विरोधी मानसिकता और पितृसत्तात्मक सोच नहीं बदलेगी, तब तक हमारे लिए कुछ भी नहीं बदलने वाला है। जब तक पूरा पूरे समाज के लोग यह नहीं समझते कि यह औरत विरोधी स्थिति अब और ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सकती, तब तक औरत विरोधी अपराधों में कमी नहीं आने वाली है।

        यहां पर हम जोर देकर कर कहेंगे कि हमारे समाज में और देश में आज भी सामंती और पूंजीवादी व्यवस्था का गठजोड़ कायम है। इन दोनों के गठजोड़ ने औरतों के खिलाफ होने वाले अपराधों को मिटाने की समुचित कोशिश नहीं की है, बल्कि वही हजारों साल पुरानी औरत विरोधी मानसिकता कायम है। हमारा मानना है कि जब तक यह औरत विरोधी पूंजीवादी व्यवस्था और सामंती व्यवस्था कायम रहेगी, तब तक औरत विरोधी अपराधों में कमी आने वाली नहीं है।

       यहां पर हम जोर देकर कहेंगे हमें बच्चों, लड़कों और लड़कियों में समानता का अधिकार देने की पहल अपने परिवार से करनी पड़ेगी। इसको स्कूलों में ले जाना होगा और वहां पर बच्चों को शिक्षा देंनी होगी कि हमारे समाज में लड़के और लड़कियों को बराबर के अधिकार हैं।      

          उनमें सदियों से चले आ रहे भेदभावों को दूर करना पड़ेगा और इसके लिए जब तक पूरे समाज को, परिवार को, माता पिता को, लड़कों को, समाज के लोगों को, पुलिस को, विधायिका, कार्यपालिका को, न्यायालयों को, शिक्षकों को, वकीलों को और पूरी की पूरी पुलिस व्यवस्था को जागरूक और संवेदनशील बनाया जाएगा और जब तक इस वर्तमान जनविरोधी सामंती और पूंजीवादी व्यवस्था को बदलकर इसके स्थान पर समता, समानता और आर्थिक आजादी पर आधारित किसानों मजदूरों की सरकार और सामाजिक व्यवस्था कायम नहीं की जाएगी और ऐसे ही औरत समर्थक समाज की स्थापना नहीं की जाती, जब तक यह सब आवश्यक रूप से नहीं किया जाता, तब तक औरत विरोधी अपराधों में कमी आने वाली नहीं है।

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