सुसंस्कृति परिहार
भारत देश की एक मातावादी देश के रूप में ख्याति निरंतर उफ़ान पर है जो देश की महान संस्कृति का प्रतीक है। जिस पर हम भारतवासी ही नहीं बल्कि सारी दुनिया नाज़ करती है पुरुषवादी सत्ता प्रधान देश में माताओं की पूजा आज से नहीं बल्कि आदिकाल से होती आ रही है वह शक्ति का ही पर्याय नहीं बल्कि वह कई गुणों से परिपूर्ण है इसलिए आज भी बड़े विधान से नौ देवियों की पूजा अर्चना की जाती है ।खास बात ये इन देवियों से आशीर्वाद पाने बड़ी संख्या में पुरुष भी उपवास रख विधान पूर्वक अनुष्ठान करते हैं ।ये तमाम देवियां एक आम स्त्री की तरह विभिन्न स्वरूपा हैं। करूणा ,दया ,ममता ,प्रेम के साथ रौद्र रूप में ये हैं और ये सभी मातायें वन्दनीय हैं ।
कभी कभी लगता है कि पुरुष क्यों इस बात को समझने में भूल करता है कि वह जिस देवी मां की भक्ति में रत हैं वह असल स्वरूप में उसके घर में और सब जगह मौजूद है।वह मां,पत्नि,बहन,बेटी रुप में उसे नज़र क्यों नहीं आती।वह तमाम देवित्व गुणों से भरपूर है ।वह उन तमाम देवियों की तरह आज भी बड़ी तादाद में मूक है।आमतौर पर देखा गया है कि हमारे देश में जो मूक है -बोल नहीं सकता -सुन नहीं सकता और प्रतिकार नहीं कर सकता उसी की पूजा होती है। धरती माता ,नदी माता ,गौ माता ,भारत माता के साथ साथ हमें जन्म देने वाली माता की स्थिति भी अमूनन ऐसी ही है ।विडम्बना देखिये,जो मां अपने बच्चों को बोलना सिखाती है,भविष्य की चुनौतियों के लिये तैयार करती है ।वह खुद आमतौर पर मुखर नहीं होती । कम बोलना उसके शील का एक जरूरी हिस्सा है। ऊंचे स्वर में बोलना , विरोध करना आज भी समाज लगभग प्रतिबंधित ही है।
बहरहाल घरू माताओं जैसा व्यवहार हमारी सीता माता और शकुन्तला और द्रौपदी आदि माताओं को भी सहना पड़ा है ।अफसोस उन्हें धरती माता की तरह सहनशीला कहकर आदर्श नारी का खिताब दिया गया यह जानते हुए भी धरती मां को जब क्रोध आता है तो सारी कायनात ना केवल हिल उठती है बल्कि ज्वाला देवी बन जाती है। सहनशीलता को भारतीय संस्कृति की संज्ञा दी गई ।कहते हैं माता कष्ट सहने के लिये ही होती है ।बाप ,भाई,पति और फिर बेटे के सुरक्षा घेरे में रहती माता का अपना कोई अस्तित्व नहीं ।लेकिन वह पूज्य है ।यह क्या कम गौरव की बात है ?
यही हाल मूक धरती माता का है धन्नासेठों ने प्रकृति प्रदत्त इस उपहार का हरण कर रखा है धरती के जल,जंगल,खनिज संपदा और उसकी उत्पादक क्षमता का मनमाना शोषण हो रहा है ।धरती के वन और वन्यप्राणी भी धन लिप्सा में भोग चढ़ रहे है ।वह कुछ कह नहीं सकती ।धरती मां को सुबह सबेरे प्रणाम कर उसके उपकार का शुक्रिया आज भी किया जाता है । धरती मां की पीड़ा का अहसास बराबर होता है किंतु इसकी चिंता सिर्फ पर्यावरणविदों को ही है।
इधर गंगा मैय्या जी का हाल बेहाल है ।उसकी अति पावन जल धारा आज विष वमन कर रही है ।पूजा,अर्चना ,स्नान -ध्यान ,भजन-कीर्तन ,चुनरी चढ़ोत्री आदि सब जारी है ।गंगा की वेदना को कौन समझेगा ? कोरोना काल में वह शववाहिनी बन चुकी है।वह खामोश है इसीलिए तो कल कल बहे जा रही है, सहे जा रही है ।एक गंगा साध्वी मंत्राणी उमा भारती को गंगा साफ सफाई का ठेका मिला हुआ था पर क्या हुआ?गंगा मां के बुलावे पर गए प्रधानसेवक भी कुछ नहीं कर पाए पर है गंगा है कि जार जारआंसू बहाये जा रही है ।नर्मदा के प्रवाह को बांधों में बांधकर उसे छेड़ा जा रहा है ।आने वाले कल में नर्मदा जैसी स्वच्छ नदी भी गंगागति को प्राप्त हो जायेगी ।ये खामोश नदियां भी जब सब्र तोड़ेगी तो जाने कितना कुछ आगोश में समा जायेगा। कुछ वर्षों से गौ माता को अतिपूजनीय बना दिया गया है हालांकि बचपन से गाय हमारी माता का निबंध सभी पढ़ते आये हैं।वह उपयोगी है ।हमें दूध देती है ।जबकि देती नहीं ,उसके बच्चे का हिस्सा हम छीनते हैं ।उसका तमाम शरीर मानव के लिये समर्पित है ।यह एक ऐसा पालतू प्राणी है जो गली कूचों में शान से घूमती है इधर उधर मुंह मार कर पेट भरती है ।डंडे भी खाती है ।जब दूध देना बंद करती है तो बूचड़खाने भेज दी जाती है ।भैंस का दूध पीकर बलवान बने गौभक्त् गौमांस के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति को सरे आम पीट पीट कर मार देते हैं।फिर आका बताते हैं कि वेदों में गौ मांस खाने की चर्चा है । गौ मांस खाने वाला संघी हो सकता है ।मंत्री हो सकता है । यानि गौ भक्तों का गौ माता की पूंछ पकड़कर लोक परलोक सुधारने का विचार भी झूठा है ।वे तो गौ माता का इस्तेमाल माहौल देखकर करते हैं जहां गौमांस खाने वाले कम लोग हैं (जैसे उ०प्र०,म०प्र०) वहाँ विरोध और जहां गौमांस खाने वाले अधिक हैं वहाँ (अरुणांचल,गोवा, नागालैंड ) समर्थन ।यानि गौमाता इस्तेमाल की वस्तु बन गई है ।वह दंगा माता और वोट माता बन चुकी है जय हो गौ माता की। आजकल गौशाला सदन कमाई के केन्द्र बन चुके हैं। उनमें गौमाता की स्थिति कैसी है सभी जान चुुुके हैं कहने की जरूरत नहीं।उसके अवयव जो पहले एक विशेष वर्ग के काम आते थे अब बड़े लोगों के व्यवसाय का हिस्सा हो चुके हैं। गौमाता का भी हाल बेहाल है।
इधर भारत माता की जय के नाम पर कत्लेआम का नया सिलसिला शुरु हुआ है।हम सभी जानते हैं कि हमारे देश का नाम दुष्यंत-शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर पड़ा । भारतमाता कहकर इसको मान दिया जाता रहा जो सहज स्वीकार्य था ।मगर अति राष्टवाद के कथित भक्तों ने जब से जबरिया जयकारा करने की मुहिम छेड़ी है तब से माहौल बिगड़ रहा ।जय श्री राम की तर्ज पर भारत माता की जय के नाम पर पुन:राजनैतिक फायदे की कोशिशें चल रही हैं । शर्म आनी चाहिए भारत मां का हाल अन्य माताओं जैसा करने की कोशिश हो रही है।वह घातक ही हैं अलगाव वाद की भी सूचक है।ये जबरियाकरण भारत के टुकड़े कर करता है।
इसलिए इस पुनीत नवरात्र पर यह स्मरण रखना चाहिए महाकालिका का स्वरुप कभी भी स्त्री,धरती, नदी, गौमाता रख सकती है।इन सबके विभीषिका वाले स्वरुप से हम सब परिचित हैं बेहतर हो नवरात्र में इस बात का ख़्याल ज़रूर कर लें कि हम मातावादी देश के लोग अपनी माताओं के प्रति दिखावे से अलहदा उन्हें एक आत्मीय सम्मानित दर्जा देंगे। उन्हें प्रकृति ने विशिष्ट स्वरुपा इसीलिए ही बनाया। तमाम माताएं वंदनीय ही नहीं हम सबकी अहम ज़रुरत भी हैं कायनात के हम सब शुक्रगुजार बने।इससे धरा सर्वदा खुशहाल होगी।इति शुभम् । तथास्तु।जय मां।

