जूली सचदेवा __
विकृति है
यह संस्कृति की
सुविधाभोगी जीवन
जीने वाले हम
संवेदनहीन अनुभूतियों
की वैशाखी के सहारे
सूरज और चाँद को
गिरवी रख
तथाकथित सभ्य समाज
की आदमखोर
प्रवृतियों का
मखमली कफन ओढ़े
अपने जीवित होने के
असत्य को
पाल रहे होते हैं
गाँव के टुटहे
मकान में
आठ दशक पार
कोई बुढ़िया
हाँफती, खाँसती
अंधी आँखों से
अंगीठी जलाकर
भात पका रही
थकी अधमरी
सांसों से सन्तानों को
सुखद जीवन
का आशीष देती है
साल में एक दिन
माँ की
बहुत याद आती है
और फेसबुक में
उम्दा शेर, मुक्तक, तस्वीर
के साथ उन्हें याद
करने का मुहुर्त आता है
बहुत संतोष देता है
मित्रों सहकर्मियों का
लाईक•••• कमेंट्स
धन्यवाद!
मेरे पतित चरित्र
भावशून्य अनुभूतियाँ
मदर्स डे
एक रोज में
रिश्तों के समापन
की शुरुआत
और अंत भी
कर्मकांड सम्पूर्ण।।
(चेतना विकास मिशन)
