मेरा दूसरा जन्म हुआ आंदोलन मेंजब16 साल की थी,
लव जिहाद की उम्र मेंइश्क किया भी तो आंदोलन से
आज तक कम्बख्त बढ़ता गया है..
.और क्रांती का जिहाद बन गया…
. आंदोलन मैंने केवल जिया नहीं, खाया,
पिया, सोया, ओढ़ा, सपनों में भी संजोया..
सोते जागते उस से आंदोलित होती रहीउस सूरज की तलाश में…
एक बहुत बडी अग्नी शलाकाजो रोज नहीं उगती
लेकिन जिन्होंने देखा हैं वो आसमाँ का फटना,
क्रांती सूर्य का जन्मकह रहे थे
बच्चे के जन्म के समयमाँ की चीख सी आवाज होती हैं
और बाद में किलकारी और असंख्य शृंखलाएँ टूटने की गूँज प्रतिध्वनित होती हैं…
जब वे उगती हैं… न जाने अंधेरे के कितने पहाडों के पीछे छुपी है…
वो सूरज तभी उगती हैंजब लोगों का सैलाबनिकलता हैं
अन्याय के खिलाफशहादतें देने…
तब सैनिक आगे से भी और पीछे से भी आते हैं, बंदूके, गोली लेकर…
आप को बता दूँ किआंदोलन मैंने इस लिए भी किया था कि किसी पर बलात्कार न हो
किसी शुद्र के हाथ पाँव न काटे कोई दबंग
इसलिए संरक्षण मिले सैनिकों का…
फिर पता चला कि वे रोबो थे
सत्ता की चौकड़ी उन को आदेश दे वैसा ही करते थे…
आंदोलन नें सिखाया कि डरना नहीं
लड़ना और जब तक मंझील न मिले लड़ते रहना…
मैंने पाया वे सैनिक तो परजीवी थे
और उनको नचानेवाले डरपोकसामने नहीं आते थे
वे लोमड़ी की तरह शिकार होने की राह देखते,
लार टपकाते कॉर्पोरेट और सत्ता वाली लोमडीयाँ
आप को पंचतंत्र में नहीं मिलेंगी
वे अर्णव रजत तंत्र में मिलेंगी
कंगना और सचिन के ट्वीट में
लता मंगेशकर के कंठ स्वर मेंमिले सुर मेरा तुम्हारा कहेंगे
तब तुम्हारे सारे रिश्तेदार भीगदगद होकर उन के साथ ताली बजाते दिखेंगे
46 साल हो गये, आंदोलन जीवी होने के नाते एक बात समझ गयी
आंदोलन के सैलाब से डरकर जो घर के छत पर गिटार बजाते हैं
उस का घर भी भस्मसात होता है
ये वो क्या समझे जो आग लगाकर
हवाई जहाज से उड़ने लगते हैं
सुना हैं स्पिलबर्ग भी नहीं कर पाया कल्पना कि क्रांती की सूर्य कैसे उगती हैं?
ये हवाई जहाज में भागने वालेसत्ता भ्रम जीवी को अंदेशा नहीं
जब वो इतने सालों तक छुपीक्रांती सूर्य निकलेंगीकितनी
अग्नी शलाकाओं का गोलाकार प्रपात गगन में …
क्रांती आंदोलन जीवीयों को भी लपेटती हैं
लेकिन तब असंख्य आंदोलन जीवी
जमीन से हाथ उठाते हैं दुआ मांगते हैं कि इस क्रांती के बाद जन गण मनखुशहाल हो …
खुशहाल हो… मलाल न हो… अन्यथा आंदोलन जीव जो सूक्ष्म कणों
की तरह हवा में बसते है, सत्ता के खिलाफ फिर उग आते हैं…
छंटते नहीं छंटते… हम आंदोलन जीवी आदिवासी हैं
रेलाँ के सूर गाते हुए नाचते, थिरकते आते है …
डॉ लता प्रतिभा मधुकर
9th February 2021

