नवनीत गुर्जर
जब आंखों में कोई हसीन ख़्याल या विचार (तसव्वुर) क़ायम रहता है, और उस ख़्याल या विचार के रास्ते में जो कुछ भी ग़लत हो, उसके प्रति मन में जो रोष उमड़ता है, वही आंदोलन है। शर्त यह है कि ख़्याल जितना पवित्र होगा, आंदोलन भी उतना ही पावन होगा। चलिए, आंदोलन को ऐसे समझते हैं- जब हम छोटे बच्चे थे, तो सबसे पहला आंदोलन हमने कब किया था?
जब हम खेल में व्यस्त होते थे और शाम के वक्त पिताजी या दादाजी बुलाकर कहते थे, ‘चलो बैठो, ईश्वर का ध्यान करो।’ हम बाक़ायदा आलथी-पालथी मारकर बैठ जाते थे, लेकिन ईश्वर का ध्यान नहीं करते थे। ध्यान यही रहता था कि देखो, दिनेश क्या खेल रहा होगा? महेश कैसे दुलत्ती मार रहा होगा? …और एक हम हैं, बैठे हैं या पालथी मारे!
यह हमारा आंदोलन ही तो था। हम सोचते थे- आंखें बंद करके हम ईश्वर का ध्यान करें या न करें, पिताजी को कैसे पता चलेगा! फिर हम कुछ बड़े होते हैं। किशोर उम्र में आते हैं। किसी भी तरह का भेदभाव हमें बुरा लगने लगता था। सबसे पहला आंदोलन हम दादी-नानी की रसोई के खिलाफ करते थे।
कोई भी दूसरी जाति का व्यक्ति जब घर आता था, तो उसकी चाय के लिए घर की परछत्ती पर एक मैला-कुचैला कप रखा रहता था। उसे चाय उसी कप में दी जाती थी। किसी दिन इस भेदभाव से तंग आकर हम परछत्ती से उस कप को निकालकर दूर कहीं फेंक आते थे। दादी-नानी के रसोई-राज के ख़िलाफ़ यह हमारा आंदोलन ही था। ये बात और है कि कुछ दिनों बाद वहां एक नया कप रख दिया जाता था, लेकिन हम अपने आंदोलन की सफलता पर फिर भी इतराते रहते थे।
ऐसे आंदोलनों में कई बार हम पकड़े भी जाते थे। बाक़ायदा रिमांड पर ले लिए जाते थे। रामायण के 5 दोहों तक सभी चौपाइयों और उनके अर्थ जब ज़ोर-ज़ोर से पढ़ने होते थे, हम बीच में कोई चौपाई ग़ायब कर देते थे। दूर बैठे दादाजी पकड़ लेते थे। आधी चौपाई बोलकर पूछते थे, वो कहां गई? बस, रिमांड हो जाता था।
पढ़ाई के दिनों, जब विषय चुनने की बात आती थी, घर वाले और रिश्तेदार सब मिलकर हम पर टूट पड़ते थे। साइंस ही लेना है। हमें उसके बारे में कुछ अता-पता नहीं होता था, लेकिन चूंकि सब मिलकर पीछे पड़े होते थे इसलिए हम उस मुए साइंस के अलावा कुछ भी लेने को तैयार रहते थे।
अपनी ज़िद पूरी करने के लिए दो-दो दिन मौन व्रत रखकर, खाना-पानी छोड़कर जब अंधेरे कोप भवन में जा बैठते थे, वो हमारा आंदोलन नहीं तो और क्या था? हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे कई मौक़े आए होंगे जब उसने किसी परंपरा के ख़िलाफ़, अपनी स्वतंत्रता या अपने ख़्यालों की आज़ादी के पक्ष में आंदोलन किया होगा।
कहा जा सकता है कि इस देश का हर व्यक्ति आंदोलनकारी है। बचपन से आंदोलन उसकी रग-रग में समाया होता है। कोई कर पाता है। कोई मन में ही दबाए रखता है। जो इसे मन में दबाकर रखते हैं, कभी न कभी वो किसी न किसी रूप में फूटता ज़रूर है। हो सकता है उसके तरीक़े बदल जाएं, हो सकता है मौक़े और संदर्भ तक बदल जाएं…।

