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*मुबाहिला : इस्लामी कलेंडर के अंतिम माह की 24 तारीख़*

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    (असगर मेंहदी की देशना)

      ~ दिव्या गुप्ता

“मुबाहिला” का शाब्दिक अर्थ “श्राप” है। इस शब्द को किसी व्यक्ति या गिरोह के झूठ बोलने या प्रचार करने की वजह से अपनी कृपा से अलग करने के लिए भी प्रयोग में होता है। समस्त सामी (Semitic) सभ्यताओं में मुबाहिला की प्रक्रिया प्रचलित थी जिसके अंतर्गत अपने दावे की सत्यता के लिए प्रत्येक पक्ष अपने ख़ुदा से झूठों के लिये अज़ाब नाज़िल करने की प्रार्थना करता था।

      इस्लामी इतिहास में मुबाहिला की घटना का महत्व इस बात में निहित है कि क़ुरान में पैग़म्बर को नजरान के ईसाइयों से मुबाहिला के स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। इस घटना से सम्बंधित आयत नाज़िल होने की वजह से मुस्लिम इतिहासकार घटना को नकारने में नाकाम हैं लेकिन इसका महत्व कम करने में वे सफल अवश्य रहे। 

      “नजरान” का इलाक़ा यमन की सीमा पर साऊदी अरब के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। वर्तमान में इस क्षेत्र में इस्माइली मुस्लिम समुदाय की बहुलता है। “नजरान” के दो शाब्दिक अर्थ लिए जाते हैं, दरवाज़े की चौकठ और प्यासा। किदवंती यह है कि इस इलाक़े में बसने वाले पहले व्यक्ति का नाम नजरान इबने सैदान इबने सबा इबने यहजूब इबने यारुब इबने क़हतान था।

     अतीत में यह इलाक़ा यमन में शामिल था जो वस्त्र निर्माण के लिये प्रसिद्ध था। इसकी अहमियत इस बात में भी निहित थी कि यह “मसाला व्यापार मार्ग” (Incense trade route) का एक पड़ाव भी था। 

प्राचीन कालीन में “नजरान” एक महत्वपूर्ण नख़लिस्तान के रूप में विभिन्न सभ्यताओं के संघर्ष के गवाह के रूप में नज़र आता है।

      इस इलाक़े का ईसाईयत से पाँचवी शताब्दी में ही परिचय हो गया था। बनी लख़मी रियासत की राजधानी “हीरा” में नजरानी व्यापारियों का आवागमन रहता था वहीं यज़दगर्द (420-438) के शासन काल में ईसाईयत की “नेस्तोरियन” शाखा से प्रभावित होकर नजरान के व्यापारी ईसाई बन गए थे।नजरान में ईसाई समुदाय ने भी एक काबा स्थापित कर लिया गया था जहां अरब ईसाई ज़ियारत के लिये आते थे। लेकिन, समय के साथ “मोनोफ़ाईसीटिज़्म” का प्रभाव ज़्यादा हो गया था। 

इस इस दौर में यमन और अरब इलाक़ों में यहूदी धर्म की जड़ें काफ़ी मज़बूत हो रही थीं। यमन के दक्षिण में स्थित पहाड़ी क्षेत्रों में “हिमैर राज्य” (Himyarite Kingdom) में छठी शताब्दी के दूसरी दहाई में ज़ू-नुवास सत्तानशीन हुआ तो ईसाइयों को उसकी दमनकारी और धार्मिक उत्पीड़न की नीतियों का सामना करना पड़ा।

       ज़ू-नुवास का ईसाई विरोधी दृष्टिकोण और नीतियों की पृष्ठभूमि में बाज़िनतीनीयों का यहूदियों के प्रति व्यवहार को सामने रखना होगा। 515 ई० से 525 ई० तक ज़ू-नुवास ने निकटवर्ती ईसाई आबादियों पर ज़मीन तंग कर रखी थी। 523-24 के अभियान में नजरान में हज़ारों ईसाइयों का क़त्ल ए आम हुआ, ईसाइयों के काबा सहित चर्चों को आग के हवाले कर दिया गया। यह जब हुआ कि उसकी ओर से आम माफ़ी की घोषणा की गयी थी। जब ये समाचार बाज़िनतीनी सम्राट जस्टिन द्वितीय तक पहुँचे तो उसने अब्यस्सिनीय शासक से अनुरोध किया कि वह ज़ू-नुवास के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही करे और हिमैर राज्य को अपने राज्य में सम्मिलित कर ले। इस प्रकार ज़ू-नूवास के साथ क्षेत्र से यहूदियों का शासन हमेशा के लिये समाप्त हो गया। 

      नजरान के इसक़फ़ (Bishop) को रोमन कलीसा से केवल बाक़ायदा मान्यता ही नहीं मिली हुई थी बल्कि यह उसका अधिकारिक रूप से प्रतिनिधित्व भी करता था। हुदैबिया की संधि के बाद पैग़म्बर ने रोमन और ईरानी शासकों सहित अनेक सरदारों, शासकों और धार्मिक केंद्रों की ओर इस्लाम क़ुबूल करने के आशय से अनेक पत्र लिखे थे। इसी क्रम में 631 ई० के माह मार्च में पैग़म्बर ने नजरान के बिशप को भी पत्र भेजा जिसमें इस्लाम की दावत दी गयी थी और इसे क़ुबूल ना करने की स्थिति में “मदीना” के साथ संधि करने का प्रस्ताव दिया गया था।

     नजरान के धार्मिक और राजनैतिक हल्क़ों में इस पत्र को बहुत गम्भीरता से लिया गया क्योंकि इस्लाम की ओर दावत के साथ में इस्लामी राज्य के साथ अनुबंध हेतु भी प्रस्ताव रखा गया था। नजरानवासी इस वास्तविकता को जानते थे कि वर्तमान में “मदीना” अरब राजनीति का शक्तिशाली केंद्र बन चुका है दूसरे यह कि दीन की दावत देना ईसाई धर्म का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा था सम्भवत उन्हें महसूस हुआ होगा कि शायद मदीना की रियासत ईसाई मत क़ुबूल कर ले। तमाम परिस्थितियों पर विचार करने के लिये नजरान में एक सभा बुलायी गयी और परस्पर परामर्श के बाद 60 रुकनी एक प्रतिनिधिमंडल मदीना रवाना किया गया जिसमें बिशप अबु हारिस बिल अलक़मा और एक अन्य धर्मगुरु अब्दुल मसीह सम्मिलित थे। 

       यह प्रतिनिधिमंडल जब मदीना पहुँचा तो पैग़म्बर मस्जिद में थे। मंडल के समस्त सदस्य क़ीमती वस्त्र, आभूषण और हीरा जड़ित अँगूठियाँ धारण किए हुए थे जिसकी वजह से पैग़म्बर ने इनको बिलकुल नज़रअन्दाज़ कर दिया। पैग़म्बर के इस व्यवहार से नजरानियों को निराशा ने घेर लिया लेकिन जब अली से बात हुई तो इस उपेक्षा का कारण समझ में आते ही उन्होंने साधारण वस्त्र धारण कर लिए।

      असर (दूसरे पहर के बाद) के समय जब यह दल पुनः मस्जिद में दाख़िल हुआ तो पैग़म्बर ने इनका गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। इनके ठहरने के उचित व्यवस्था करायी और अन्य मुसलमानों की आपत्ति के बावजूद मस्जिद में इनको अपनी इबादत करने की अनुमति भी दी। 

दूसरे दिन पैग़म्बर से नजरान के धार्मिक गुरुओं से विस्तार में बात हुई। पैग़म्बर ने इस्लाम की दावत देते हुए नजरानियों के समक्ष क़ुरान से चंद आयतें पढ़ीं। नजरानियों ने अपना दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि वे भी एक ईश्वरवाद के पैरोकार है और यदि इस्लाम से मुराद तौहीद अर्थात एक ईश्वर पर ईमान लाना और केवल उसकी इबादत करना है तो वे पहले से ही इस पर ईमान लाए हुए हैं और इसी के अनुसार अमल करते हैं। इसके जवाब में पैग़म्बर ने कहा कि नजरानी तौहीद का दावा कैसे कर सकते हैं जबकि वे अपने ख़ुदा के लिए पुत्र का अक़ीदा रखते हैं।

     नजरानियों ने हज़रत ईसा के चमत्कारों जैसे मुर्दे को ज़िंदा करने, मिट्टी के बने परिंदे में जीवन डालने की घटनाओं को बतौर दलील पेश करते हुए कहा कि इन घटनाओं से सिद्ध होता है कि वह ख़ुदा है। 

    इसके जवाब में पैग़म्बर ने कहा, “नहीं, वह उस ख़ुदा का बंदा और मख़लूक़ (creation) है जिसने उसे मरियम के गर्भ में क़रार दिया और यह सामर्थ्य और सबलता उसने इसे दी।”

गुफ़्तगू के इस मोड़ पर नजरान से एक व्यक्ति ने कहा, “हाँ, वह ख़ुदा का पुत्र है क्योंकि उसकी माँ मरियम किसी के साथ असदवाज (nuptial) किये बग़ैर उसे इस दुनिया में लायीं। बस, अनिवार्य रूप से उनका (ईसा) का पिता संसार का वही ख़ुदा है।”पैग़म्बर ने क़ुरान के तीसरे सूरे की आयत संख्या 59 को उद्धृत किया, “अल्लाह के नज़दीक तो जैसे ईसा की मिसाल वैसी ही आदम की मिसाल कि उनको मिट्टी का पुतला बनाकर कहा कि ‘हो जा’ पस (फ़ौरन ही) वह (इन्सान) हो गया।” अर्थात, आदम अल्लाह का बेटा क़रार दिये जाने हेतु ज़्यादा योग्य हैं जो माँ और बाप दोनों के बग़ैर पैदा किये गये।

     नजरान के प्रतिनिधिमंडल का पैग़म्बर के इस तर्क को क़ुबूल करने का अर्थ था कि ईसाइयत के बुनयादी और केंद्रीय अक़ीदे के साथ समझौता करना। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनके लिए पैग़म्बर के तर्क और दलीलें स्वीकार करना सम्भव नहीं है। इसके साथ उन्होंने मुबाहिले का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि दोनों पक्ष एक निर्धारित समय पर एक दूसरे से मुबाहिला करें जिसमें झूठों पर लानत करते हुए ख़ुदा से दुआ की जाए कि वह मिथ्यावादियों को नीस्त ओ नाबूद कर दे। 

    24 ज़िलहिज हिजरी 9 अर्थात 3 अप्रैल 631 ई० को मदीना से बाहर मुबाहिला का कार्यक्रम निर्धारित किया गया। इस सम्बंध में क़ुरान के उक्तवर्णित सूरा की आयत संख्या 60-61 के अनुसार प्रक्रिया तय हुई जिसके अनुसार अल्लाह ने पैग़म्बर को निर्देश दिया गया, “फिर आपके पास ज्ञान आ जाने के पश्चात् कोई आपसे ईसा के विषय में विवाद करे, तो कहो कि आओ हम अपने बेटों को बुलाएँ तुम अपने बेटों को और हम अपनी औरतों को औेर तुम अपनी औेरतों को और हम अपने नफ़्स (जानों) को बुलाएँ ओर तुम अपनी जानों को उसके बाद फिर अल्लाह से सविनय प्रार्थना करें कि अल्लाह की धिक्कार मिथ्यावादियों पर हो।”

मुबाहिले की सुबह पैग़म्बर अपनी पुत्री फ़ातिमा के घर तशरीफ़ ले गये, छोटे नाती हुसैन को गोद में लिया हसन का हाथ पकड़ा साथ में फ़ातिमा और अली को लिया और निर्धारित जगह पर पहुँच कर दो निकट पेड़ों के बीच अपनी अबा फैलाकर उसकी छाँव में चारों के साथ बैठ गये।

      यह दृश्य सभी को आश्चर्य में डालने वाला था क्योंकि तारीख़ के इस अहम मोड़ पर राजनैतिक और धार्मिक मुद्दों का मुक़ाबला करने के लिये पैग़म्बर ने केवल अपने परिवारजनों का चुनाव किया। नजरान के दल के नज़दीक भी यह सब अप्रत्याशित था उन्होंने आपस में मशविरा किया और इस नतीजे पर पहुँचे कि अगर पैग़म्बर अपने दावे में सच्चे ना होते तो वह कदापि अपने अहले-बैत को साथ में नहीं लाते। 

      नजरानी प्रतिनिधमंडल के नेता अबु हारिस ने पैग़म्बर से आग्रह किया कि वे मुबाहिला नहीं चाहते और वह किसी ऐसी संधि पर राज़ी हैं जिसमें पैग़म्बर की ओर से नजरान की सलामती की ज़मानत दी गयी हो। इस अहदनामा (pledge) की इबारत की शुरुआत इस तरह थी, “मेहरबान और बख़शने वाले ख़ुदा के नाम, यह अहदनामा है मुहम्मद रसूल ख़ुदा की तरफ़ से नजरान और उसके निकट क्षेत्र के बाशिंदों के लिये। जिनको उनके जीवन, धर्म, धरती, सम्पत्ति की सुरक्षा की ज़मानत दी जाती है, चाहे वह मौजूद हों या ना हों।” 

       पैग़म्बर के इस अहदनामा में नजरान की भगौलिक, राजनैतिक और धार्मिक स्वायत्तता बरक़रार रखते हुए उनसे ख़िराज (जज़िया) के तौर पर  केवल दो हज़ार वस्त्र (जिसके लिये नजरान विख्यात था) का प्रावधान रखा गया जो दो क़िस्तों में वाजिब उल अदा था। इसके अतिरिक्त यमन की ओर से किसी आक्रमण की स्थिति में नजरान की ओर से तीस कवच, तीस घोड़े, तीस ऊँट बतौर आरिया मज़मूना (borrowed articles) उपलब्ध कराने का प्रावधान भी रखा गया।

बग़ौर देखें तो तत्कालीन परिस्थितियों में यह एक क्रांतिकारी क़दम था क्योंकि  इसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों और उनके प्रति अधिकतम सहनशीलता और सहिष्णुता का भाव मौजूद था। एक बात उल्लेखनीय है कि 1960 में प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट “STUDY OF DISCRIMINATION IN THE MATTER OF RELIGIOUS RIGHTS AND PRACTICE” में इस अहदनामा के अंश को जगह दी गयी है। 

       मुबाहिला की घटना मुस्लिम-ईसाई और शिया-सुन्नी समुदायों के बीच अनेक विवादात्मक व्याख्याओं को जन्म देती रही है। ईसाई पक्ष के अनुसार मुबाहिला के केंद्र में ईसा की देवीय स्थिति से ज़्यादा पैग़म्बर मुहम्मद की राजनैतिक स्थिति ज़ेर ए बहस थी। इसी प्रकार पैग़म्बर द्वारा अपने किसी सहाबी या पत्नी की साथ में ना रखना और केवल चार लोगों को साथ में लाने का अर्थ अली, फ़ातिमा, हसन और हुसैन की श्रेष्ठता से परिचित कराना भी था। 

     मुबाहिला की घटना इतिहास के साथ क़ुरान की तफ़सीर और हदीस का एक महत्वपूर्ण घटक है। अतः मुसलमानों के मध्य मुबाहिला की घटना की व्याख्या को लेकर अनेक मत और धाराएँ हैं। एक बड़ा वर्ग इसकी रौशनी में हसन और हुसैन को “फ़र्ज़न्द ए रसूल” मानता है और अहले-बैत के आला मक़ाम पर आस्था रखता है। लेकिन, बाद के राजनैतिक घटनाक्रम के आलोक में अन्य पर अली की सर्वोच्च स्थिति का क़ायल नहीं है इसके साथ वह पैग़म्बर की पत्नियों को भी अहले-बैत की श्रेणी में शामिल करने पक्षधर है। 

      शिया वर्ग इस घटना के क्रम में अली की सर्वोच्च राजनैतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थिति को पैग़म्बर द्वारा अपने नफ़्स के तौर पर परिचित कराने की दलील के रूप में पेश करता है। इसके साथ मुबाहिला की घटना का एक और रौशन पहलू है कि सीमाओं पर बसी धार्मिक अल्पसांख्यक बस्तियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाए, शायद यह संदेश गुम हो चुका है। 

हज़रत उमर के काल (634-644) में नजरान के ईसाइयों को शहर छोड़ कर अरब प्रायद्वीप से बाहर अन्यत्र बसने का आदेश दिया गया था। शहर की ईसाई आबादी का एक हिस्सा सीरिया के शहर अल-लज्जात में बस गयी और बड़ा हिस्सा इराक़ के नवनिर्मित शहर कूफ़े के निकट आबाद हो गया जिसे अल-नज्जरानीया कहा जाता था। लेकिन, नजरान शहर के आस पास की ईसाई आबादी आगामी कई वर्षों तक आबाद रही।

      बीसवीं सदी में उस्मानी ख़िलाफ़त के पतन के बाद यमन ने नजरान पर आधिपत्य के अधिकार को लेकर अनेक संघर्ष किए लेकिन समीकरण कुछ ऐसे बैठे कि 1934 में यह क्षेत्र साऊदी अरब के अधिकार में आ गया। नजरान सुलेमानी इस्माइलीयों की आध्यात्मिक राजधानी है जहां उनका धार्मिक नेता “अददायी मुत्लक़” निवास करता है। साऊदी अरब में वहाबी शाखा को राज्यधर्म का स्थान हासिल है जिसकी नज़र में इस्माइली फ़िरक़ा मुशरिक है और अन्य धर्मों और आस्थाओं की तरह उन्हें भी भेदभाव और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है।

     1996 में मिशआल बिन साऊद नजरान प्रांत का राज्यपाल नियुक्त हुआ तो हालात ख़राब होते चले गए। उसने इलाक़े में आबादी में संतुलन बनाने का प्रयास किया और वहाबी सुन्नियों को बसाने का प्रयास किया जिसका तीव्र विरोध किया गया। 2000 में इस्माइली मस्जिदों को बंद करने के आदेश हो गए और इसके तीन माह बाद अप्रैल 2000 में पुलिस और मुत्तवों ने इस्माइली धर्मगुरु को नज़रबंद कर दिया गया जिसके विरोध में राज्यपाल के निवास होलीडे इन पर ज़बरदस्त प्रदर्शन किए गए।

      राजपाल ने प्रदर्शनकारियों से भेंट हेतु स्पष्ट तौर पर इनकार कर दिया और इसी बीच सुरक्षा बलों की गोलियों से दो प्रदर्शनकारियों की मृत्यु हो गयी। इस्माइलियों ने अपने धार्मिक नेता के निवास के चारों ओर एक दीवार का निर्माण कर लिया, लेकिन आगे मामला बिना किसी रक्तपात के ख़त्म हो गया। 

     2006 में राज्यपाल ने एक नये प्रोजेक्ट को अमल में लाने का काम शुरू  किया जिसके अंतर्गत नजरान के बाहरी क्षेत्रों में दस हज़ार क़बाइली आबादी को बसाने का उद्देश्य था।

     तीव्र विरोध के चलते 2009 में शाह अब्दुल्लाह ने मिशआल बिन साऊद को पदच्युत कर दिया। जिसकी एक महत्वपूर्ण वजह यमन में बदलता घटनाक्रम भी था जिसने सीमा पर स्थित अतिसंवेदनशील प्रांत में शांतिपूर्ण वातावरण क़ायम रखने के लिये साऊदी हुकूमत को मजबूर कर दिया।

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