अग्नि आलोक

*मुंबई का अलंकार थ‍िएटर:वो सिनेमाघर, जिसमें फिल्‍म रिलीज होने का मतलब था ‘सुपरहिट’*

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पर्दे पर फेवरेट हीरो-हीरोइन, गानों पर गूंजती सीटियां, हर डायलॉग पर बजती तालियां, फ्रंट रो, बालकनी की सीट के लिए टिकट काउंटर पर धक्‍का-मुक्‍की, हाउसफुल के बोर्ड के बावजूद किसी तरह टिकट का जुगाड़ करने की जुगत। यह वह दौर था, जब सिनेमाघरों में आज की तरह पॉपकॉर्न, और कॉफी की महक नहीं थी। तब सिनेमाघरों में एयरकंडीशन नहीं होते थे, पर पर्दे पर प्रोजेक्‍टर की रोशनी देखकर अजब सी ताजगी दौड़ती थी। इंटरवल में कोल्‍ड ड्र‍िंक की शीश‍ियों की वो आवाज… हम कितना कुछ पीछे छोड़ आए हैं। वक्‍त के साथ सिनेमा और सिनेमाघर दोनों बदल गए हैं। आज हर छोटे-बड़े शहर में मल्‍टीप्‍लेक्‍स खुल गए हैं या फिर खुल रहे हैं। लेकिन नब्‍बे के दशक या उससे पहले के दर्शक इस बात से इत्‍तेफाक रखते होंगे कि 200-250 सीटों, छोटे पर्दे वाले मल्‍टीप्‍लेक्‍स स्‍क्रीन्‍स में वो मजा नहीं है, जो कभी 1000 दर्शकों के बीच लड़खड़ाती कुर्सियों पर बैठकर फिल्‍म देखने में था।

आप सोच रहे होंगे कि आज अचानक ये बातें क्‍यों? दरअसल, सिंगल स्‍क्रीन थ‍िएटर्स आज भी सिनेमा के हर शौकीन की पहली चाहत हैं। लेकिन धीरे-धीरे एकल पर्दे का यह दौर अब सिमटता जा रहा है। कभी शहरों की पहचान जिन सिंगल स्‍क्रीन थ‍िएटर्स से हुआ करती थी, उनमें से कई धीरे-धीरे बंद होते जा रहे हैं। मुंबई में हाल ही अलंकार थ‍िएटर की इमारत को भी ध्वस्त कर दिया गया। यह शहर का ऐसा पुराना सिंगल-स्क्रीन थिएटर था, जिसने ना सिर्फ दशकों से सिनेमा प्रेमियों को अनग‍िनत यादें दी, बल्‍क‍ि ये प्रकाश मेहरा, राज कपूर और मनमोहन देसाई जैसे दिग्‍गजों के लिए भी ‘लकी चार्म’ था।

ग्रांट रोड पर था अलंकार थ‍िएटर, 2006 में हो गया बंद
गिरगांव और ग्रांट रोड के बीच स्थित, अलंकार थ‍िएटर सिर्फ सिनेमाघर नहीं था। यह ग्रांट रोड, गिरगांव, कोलाबा और शहर के अन्य सटे दूसरे इलाकों के लोगों के लिए ऐसी जगह थी, जहां दोस्‍तों-परिवारों की टोली वक्‍त बिताने आती थी। मुंबई के आइकॉनिक थ‍िएटर्स में अलंकार पहला नहीं है, जो बंद हो गया। इसी तरह नॉवेल्टी सिनेमा ने भी करीब 80 साल के संचालन के बाद 2006 में अपने दरवाजे बंद कर दिए। एक और उदाहरण न्यू एम्पायर है, जो 20वीं सदी की शुरुआत में एक लाइव थिएटर के रूप में खोला गया था और बाद में सिनेमाघर में बदल गया। घाटे की वजह से इसे भी 2014 में बंद कर दिया गया।

प्रकाश मेहरा अलंकार को मानते थे अपने लिए लकी

वक्‍त के साथ दूसरे सिनेमाघरों की तरह अलंकार को भी, पुराने इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर, कम स्क्रीनिंग और मल्टीप्लेक्स जैसी सुविधाओं से मुकाबला करने की क्षमता नहीं होने के कारण घाटा उठाना पड़ा। जबकि एक वक्‍त ऐसा था जब यहां अपनी फिल्‍म रिलीज करने के लिए फिल्‍ममेकर्स में युद्ध जैसी स्‍थ‍िति हो जाती थी। मुंबई में रहने वाले ब्‍लॉगर, कवि, और लेखक युनूस खान फेसबुक पर लिखते हैं, ‘प्रकाश मेहरा ने अपनी कई फ‍िल्में इसी टॉकीज में रिलीज की थीं। वो इसे अपने लिए लकी मानते थे।’

1960 में शुरू हुआ था अलंकार थ‍िएटर, ये थी पहली फिल्‍म
अलंकार थ‍िएटर साल 1960 में शुरू क‍िया गया था। इसमें रिलीज होने वाली पहली फिल्‍म थी बिमल रॉय प्रोडक्शन की ‘उसने कहा था’, जिसके बाद राज कपूर ने भी उसी साल ‘जिस देश में गंगा बहती है’ का प्रीमियर अलंकार में किया। यह सिनेमाघर अचानक सुर्ख‍ियों में आ गया। आगे चलकर यह हर नामी फिल्‍ममेकर की पहली पसंद बन गया। ‘प्रोफेसर’, ‘जब जब फूल खिले’, ‘फूल और पत्थर’, ‘आन मिलो सजना’, ‘चरस’, ‘खून पसीना’, जैसी फिल्‍में अलंकार थ‍िएटर में ही रिलीज हुईं।

1000 दर्शक के बैठने की जगह, अमिताभ की सुपरहिट फिल्‍में हुईं रिलीज
अलंकार अपने जमाने में सबसे बड़े और बेहतरीन सुविधाओं वाला सिंगल स्‍क्रीन थ‍िएटर था। इसमें कुल 1000 दर्शक एकसाथ बैठकर फिल्‍म देख सकते थे। हिंदी सिनेमा को अमिताभ बच्चन और प्रकाश मेहरा की जोड़ी ने ‘एंग्री यंग मैन’ दिया। उनकी फिल्म ‘जंजीर’ और इसके बाद आई ‘हेरा फेरी’ तब इम्पीरियल टॉकीज में रिलीज की गई थीं। लेकिन इसके बाद, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘लावारिस’, ‘नमक हलाल’ जैसी फ‍िल्में अलंकार में ही रिलीज की गईं।

अलंकार थ‍िएटर में 75 हफ्ते चली थी ‘मुकद्दर का सिकंदर’
प्रकाश मेहरा की ‘मुकद्दर का सिकंदर’ ने अलंकार थ‍िएटर में 75 हफ्ते पूरे किए थे। वह अलंकार को लकी मानते थे। उनका मानना था कि यहां फिल्‍म रिलीज हुई तो पक्‍का सुपरहिट होगी। प्रकाश मेहरा साल 1984 में अमिताभ बच्‍चन स्‍टारर ‘शराबी’ को भी यहीं रिलीज करना चाहते थे। लेकिन तब वहां पहले से ही ‘कुली’ चल रही थी और उसकी सिल्वर जुबली आने वाली थी। मनमोहन देसाई ने अपनी फिल्म हटाने से इनकार कर दिया था। इसलिए प्रकाश मेहरा को मजबूरन ‘शराबी’ को अप्सरा टॉकीज में रिलीज करना पड़ा।

वो बात सिंगलस्‍क्रीन की मटमैली कालीन में, वो मल्‍टीप्‍लेक्‍श की खुशबू में कहां!
अलंकार थ‍िएटर, अब मुंबई की यादों में है। हालांकि, आज भी लोग इसके नाम को इलाके में लैंडमार्क की तरह इस्‍तेमाल करते हैं। लेकिन वक्‍त के साथ, साल दर साल, इसकी जगह कोई और लैंडमार्क ले लेगा। पर जो चीज चाहकर भी साथ नहीं छोड़ेगी, वो है अलंकार सिनेमा की यादें। आपके शहर में भी, आपकी यादों में भी कोई ऐसा सिनेमाघर जरूर होगा। जहां की मटमैली कालीन की मह‍क, आपको आज के मल्‍टीप्‍लेक्‍स की फ्रूटी खुशबू से कहीं बेहतर लगती होगी। जहां सिनेमा देखते हुए किसी के हल्‍के से दरवाजा खोलने पर आपने भी आवाज लगाई होगी- अरे गेट बंद कर लो यार।

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