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मेरा अमीनाबाद श्रीनगर, लाल चौक

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दीपक असीम
उत्साह और उल्लास संभाले नहीं संभल रहा था। सौ किलो का आदमी तीन मंज़िल सीड़ियां गेंद जैसे फुदकते हुए चढ़ता उतरता था। दोस्तों को हर चीज़ ऐसे बताता था, जैसे खुद ने ही बनाई हो। दो लेखक साथ थे। एक अनिल यादव और दूसरे संजय वर्मा। संजय वर्मा ने राय दी कि अगर तुम यहां इतनी खुशी महसूस करते हो, तो ऐसा करो, टूर एजेंट बन जाओ। लोगों को कश्मीर घुमाओ, उनके साथ खुद भी घूमो। एक फ्लैट यहां किराये से ले लो। नाम भी उन्होंने सुझाया असीम टूर पैकेज…। ऐसा कहकर वे खूब हंसे।
मगर यह मेरे मन की बात थी। यह तो कई दिनों से मेरे ही मन में उमग रहा था कि एक बार सारे दोस्तों रिश्तेदारों को लेकर कश्मीर आया जाए। लोग समझते हैं कश्मीर बहुत महंगा है और वहां बहुत खतरा है। हम तीनों जिस होटल में ठहरे उसका भाड़ा 400 रुपये रोज़ था। लाल चौक में। संजय वर्मा कम से कम थ्री स्टार में स्टे चाहते थे। मगर मेरी ज़िद थी कि यहीं रुकेंगे। हम प्लेन से गए, प्लेन से आए, मगर हमने उस होटल के किचन में टूटे फूटे बर्तनों में खाना खाया। दोनों को मैंने डाउन टाउन घुमाया। यानी कश्मीर की गलियां और वो इलाका जहां आम कश्मीरी रहते हैं। तीनों ने इसे खूब एंजाय किया।
 संजय वर्मा ने जो बात मज़ाक में कही थी उस पर अमल मैंने फौरन किया। हम जुलाई में गए थे और सितंबर में मैं पहला टूर लेकर हाज़िर। कोई दस बारह लोग। होटल लाल चौक की गली में झेलम के पास। खिड़की खोलो तो सामने झेलम दिखे और दिखे उसमें तैरते शिकारे और हाउस बोट। बरसों पहले लखनऊ के अमीनाबाद में राहत इंदौरी ने यगाना यास चंगेजी का एक शेर सुनाया था – कशिशे लखनऊ अरे तौबा / फिर वही हम अमीनाबाद…। यगाना यास चंगेजी के लिए जो कशिश अमीनाबाद में थी, मेरे लिए वही कशिश लाल चौक में है। हालांकि लाल चौक अमीनाबाद जैसा खूबसूरत नहीं है। मगर लाल चौक के पुल से दो पहाड़ दिखते हैं जिन पर कई बार बर्फ होती है। कभी मौसम खराब हो तो धुंध में नहीं भी दिखते। मेरे पसंदीदा होटल के पसंदीदा कमरे की बड़ी खिड़कियों से वो पहाड़ साफ नजर आते हैं और मैं देर तक बस उन्हें देखता रहता हूं।
सितंबर में कश्मीर में बर्फ का नामो-निशान नहीं था। ना गुलमर्ग में थी ना सोनमर्ग में। दूर पहाड़ों में अगर थी तो वहां तक जाना दूभर था। गर्मी इतनी थी कि दोपहर में सूरज ऐसे तपता था कि लगता था यूपी के किसी शहर में हैं। गनीमत है शामें खुशनुमा हो जाती थीं। मगर साथ के लोग बहुत प्यारे और भोले थे। किसी ने शिकायत नहीं की। ना होटल की और ना बर्फ मुश्लिक से मिलने की। फिर एक टूर दिसंबर का बना जिसमें बहुत ठंड थी और बहुत बर्फबारी देखने को मिली। अभी मार्च में एक टूर हुआ है और मई की फिर तैयारी है।
कश्मीर हर मौसम में प्यारा है। मुझे वो सितंबर में भी अच्छा लगा, जब बर्फ तो नहीं थी, मगर उसकी कमी सेबों से लदे हुए पेड़ कर रहे थे। ताज़ा अखरोट पेड़ों से उतारी जा रही थी। असल में मैं यही कहकर लोगों को लाया था कि हम बर्फ देखने नहीं, सेब और अखरोट के लिए जा रहे हैं। वाकई खूब सेब खाए, खूब अखरोट और खूब नाशपातियां। दिसंबर में पतझड़ और उदासी थी। पहाड़ नंगे थे। बर्फ गिरती थी तो ऊपर सोनमर्ग और गुलमर्ग में। मगर ठंड भी इतनी बढ़ जाती थी कि दो दो हीटर चला कर भी चैन नहीं मिलता था।
मार्च में तो बहार ही आ गई थी। खुशनुमा मौसम, खिलते फूल,उगती घास, उड़ती तितलियां…। बर्फ हर जगह थी, गुलमर्ग, पहलगाम, सोनमर्ग…। खूब बर्फ…। बच्चे खूब खेले। जोड़ों ने फोटो सेशन किया। अपने रिश्तेदारों को वीडियो कॉल लगाकर बताया। खरीदारी की…। संजय वर्मा की शिकायत है कि मैं टूर का रेट बहुत कम रखता हूं। मगर यह शिकायत करते हुए वे यह भूल जाते हैं कि टूर चलाने की सलाह उन्होंने मुझे पैसे कमाने के लिए नहीं, ज्यादा से ज्यादा कश्मीर में रहने के लिए दी थी। 2004 से अब तक 11 बार कश्मीर आ चुका हूं। कई बार अकेला, कई बार दोस्तों के साथ, दो बार परिवार के साथ। मनाली, कुल्लू, दार्जिलिंग, धरमशाला, मंडी, रिषिकेश, डलहौजी…हर जगह गया हूं और इनमें से शायद ही कहीं दोबारा जाना चाहता हूं। मगर कश्मीर तो जितनी बार जाऊं उतनी बार कम है। मैं हर महीने कुछ दिन यहां रहना चाहता हूं। चिनार के पत्तों को रंग बदलते देखना चाहता हूं। बादाम, आड़ू, नाशपाती के फूल खिलते देखना चाहता हूं। अभी मार्च में नाशपाती और आड़ू के पेड़ों में फूल आ रहे थे। सेब के दरख्तों पर नन्हीं पत्तियां हरी मक्खियों की तरह बैठी दिख रही थीं। किसी चिनार पर कोंपले आ रही थीं तो कोई चिनार नंगा था। जैसे नहाने के बाद छोटे बच्चे कुछ देर ऐसे ही खड़े रहते हैं कि कोई आकर कपड़े पहनाए।
(बाकी कल)

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