~ सुधा सिंह
पुराणों में ग्रह तारे, पर्वत, नदी, जल, पृथ्वी, अग्नि, सरस्वती, लक्ष्मी, श्रद्धा, मैत्री आदि अनेक जड़ पदार्थ और गुण चेतन मान लिये गये हैं। मंगल ग्रह कहीं शिव का और कहीं विष्णु का पुत्र है तो कहीं शुक्र ग्रह ही मंगल बन बैठा है।
(१)
ब्रह्मवैवर्त पुराण (ब्रह्मखण्ड अध्याय ९) का कथन है कि पृथ्वी एक बार विष्णु भगवान् का सुन्दर रूप देख कर कामातुर हो गयी। यह अक्षतयौवना सुन्दरी नारी बन कर हँसती हुई मलयागिरि के निर्जन वन में विराजमान तथा रत्नाभरणों से भूषित विष्णु के पलंग पर जाकर सो गयो। विष्णु ने उसकी मनोभावना को जान कर उसके साथ कामशास्त्र की सब विधियों से संभोग किया। तब वह संभोग सुख से मूर्च्छित हो गयी।
हरि ने बड़े बड़े नितम्बों एवं विशाल स्तनों वाली उस निद्रिता एवं मृततुल्या कामिनी को वक्षस्थल से लगाया, उसके अधरों का चुम्बन किया, उसमें वीर्याधान किया और तदुपरान्त उसे उसी मूर्छित अवस्था में छोड़ अन्यत्र प्रस्थान किया।
देवगण स्वर्ग की उर्वशी नाम्नी अप्सरा को कामपूर्ति नहीं कर पाते, इसलिये वह प्रायः मर्त्यलोक में घूमा करती है। उसकी दृष्टि में धरती के मानव स्वर्गीय देवों को अपेक्षा अधिक सशक्त हैं। उर्वशी उसी मार्ग से किसी जार के पास जा रही थी। उसने पृथ्वी को जगाया और उसके मुख से सारा वृत्तान्त सुना।
पृथ्वी ने कहा कि मैं विष्णु के वीर्य को धारण करने में असमर्थ हूँ। उर्वशी ने उसे मूंगे की एक खदान में गिरा दिया तो उससे सूर्य सा तेजस्वी एवं मूंगे के समान लाल शरीर वाला मंगल पैदा हो गया। बाद में उसका विवाह मेधा से हुआ। वह तेजस्वी देव है, नारायण का पुत्र है और पापग्रह भी है।
उपेन्द्ररूपमालोक्य कामाभूद् वसुन्धरा।
विधाय सुन्दरी वेशमक्षता प्रौढयौवना॥
मलये निर्जने रम्ये रत्नभूषणभूषितम्॥
सस्मिता तस्य तल्पे सा सहसा समुपस्थिता।
नानाप्रकारशृङ्गारं स चकार तथा सह।
मृतेव निद्रितेवासीद् बीजाधानं कृते हरौ॥
बृहनितम्बां विपुलस्त संभोगमूर्च्छिताम्।
क्षणं वक्षसि कृत्वा तां तदोष्ठं च चुचुम्ब सः॥
विहाय तत्र रहसि जगामान्यत्र माघवः।
उर्वशी पथि गन्छन्ती बोधयामास तां मुने॥
प्रवालस्याकरे त्रस्ता वीर्यन्यासं चकार सा।
ततः प्रवालवर्णश्च कुमारः समपद्यत।
तेजसा सूर्यसदृशो नारायणो महान्।
(२)
पद्मपुराण सृष्टिखण्ड अध्याय ८३) का कथन है कि एक बार अन्धक नाम का दैत्य पार्वती को देख कामातुर हो गया, उसका शिव से युद्ध होने लगा और शुक्राचार्य मरे दैत्यों को संजीवनी विद्या द्वारा जिलाने लगे।
नन्दी ने पकड़ कर उन्हें शिव को दिया, शिव निगल गये किन्तु बाद में उन्होंने शुक्र को भूमि पर उगल दिया। चूंकि शुक्र भूमि पर गिरे इसलिये भीम (मंगल) कहे जाने लगे।
दैत्योऽन्धको शिवां दृष्ट्वा कामस्य वशगोऽभवत्।
दैत्यान् रणे मृतांस्तत्र शुक्राचार्यो ह्यजीवयत्॥
अगिलद् भार्गवं शंभुः पश्चादुद्गीर्णवांश्च तम्।
भूमौ निपतितो गर्भस्ततो भीम इति स्मृतः॥
कर्तव्यं पूजन चास्य चतुष्यां भीमवासरे।
(३)
शिवपुराण (पार्वतीखण्ड १०) का कथन है कि एक बार शंकर का श्रमजन्य पसीना ललाट से भूमि पर गिर पड़ा और वह रक्तवर्ण, चतुर्भुज एवं सुन्दर शिशु होकर रोने लगा।
पृथ्वी देवो शंकर से डरती हुई कुछ सोचने के बाद सुन्दरी नारी का रूप धारण कर वहाँ आयीं और शिशु को गोद में लेकर स्तन पिलाने लगीं तथा उसका मुख चूमने लगीं।
शंकर की कृपा से वह बालक मंगल ग्रह हो गया और काशी में कुछ दिनों तक शिव की आराधना करने के बाद आकाश में शुक्र के ऊपर चला गया।
प्रभोलाटदेशात्तु यत्पृषत् श्रमसंभवम्।
पपात धरणी तत्र सम्बभूव शिशुर्द्रुतम्॥
चतुर्भुजोऽरुणाकारो रमणीयाकृतिर्मुने।
रुरोद हि शिशुस्तत्र धृत्वा सुस्वीत्तनुं क्षितिः॥
स्तन्यं सा पाययत्प्रीत्या क्रोडे च निदधे शिशुम्।
चुचुम्ब तन्मुखं स्नेहाद् ग्रहोऽभूत् शंकरेच्छया॥
काश्यां स शिवमाराध्य शुक्रादुपरि संस्थित:।
*वेद और ज्योतिष का मंगल*
पुराणों में मंगल ग्रह कहीं अशुभ नहीं है। इसका नाम हो मंगल है। वाजसनेयि संहिता का अग्रिम मन्त्र मंगल ग्रह का हो प्रतीत होता है।
लिखा है- यह सुमंगल है, ताम्रवर्ण है, अरुण है, बभ्रु है, अनेक रुद्रों से घिरा है, मृड (मंगलप्रद) है, इसकी ग्रीवा नील है, वर्ण लोहित है, यह आकाश में सरक रहा है और गोपालों एवं पानी भरने वाली नारियों से दृष्ट है। इस मंगल को नमस्कार है।
असौ यस्ताम्रो अरुण उतः बभ्रुः सुमंगलः।
ये चैनं रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रशो वैषां हेडईमहे।।
~यजुर्वेद (१६।६)
असौ योऽवसर्पति नीलग्रीवो विलोहित।
उतैनं गोपा अदृशन् अदृशन्नुदहार्यः स दृष्टो मूड याति नः।।
~यजुर्वेद (१६ । ७)
इससे सिद्ध है कि वेद में मंगल शुभ है पर आज के ज्योतिष में वह घोर पाप ग्रह है, क्रूर है और सब शुभ कर्मों में त्यान्य है। मंगली कन्या और मंगला वर से लोग घबरा जाते हैं। रवि मंगल वारों में कन्या की विदाई नहीं होती और महापात्र भी बिदा नहीं होता।
मुहूर्तचिन्तामणि का आदेश है कि मंगलवार को केवल घात, दाह, विषदान और शठों के कर्म करो। शुभ कर्म नहीं।
तस्मिन् घाताग्नि शाठ्यानि विषकर्मादि सिद्ध्यति॥

