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राष्ट्र चिंतन : बिजली संकट

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पुष्पा गुप्ता ——-_

   _एक ओर पूंजीवाद पूरी दुनिया को हर तरह के विनाश के मुहाने पर ला खडा कर रहा है तो यहां बहुत से लाल बुझक्कड़ वही तोतारटंत बोलते जा रहे हैं कि मजदूर काम नहीं करते इसलिए समस्या है, निजी क्षेत्र में दे दो, सब सही हो जायेगा। शासक वर्ग के 'विद्वान' तो यह भी बता रहे हैं कि पूरी कृषि इजारेदार पूंजीपतियों को सौंप दो मानवता का कल्याण ही हो जायेगा._
      *कोयला मंत्रालय ने राज्यों व निजी कंपनियों को कह दिया है कि कोयले की नियमित सप्लाई के लिए उन्हें खुद की मालगाड़ी खरीद लेनी चाहिए। रेलवे इसका इंतजाम नहीं कर सकता।*
    अभी 150 में से 8 बिजली संयंत्र कोयले की कमी से बंद हैं, और बहुतों में कोयला भंडार गंभीर रूप से कम है। मतलब निजीकरण से पैदा संकट से निपटने के लिए और निजीकरण!

पिछले तीस साल में इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार के बडे बडे ऐलान होते रहे हैं। देशी विदेशी निजी पूंजी निवेश, निजीकरण, आदि का भी बडा हल्ला मचा। ऐलानों का कुल हिसाब लगे तो संभवतः सैंकड़ों लाख करोड़ रुपये होगा। पर इंफ्रास्ट्रक्चर की हालत है कि हर बार और नया संकट, और नया निजीकरण, बस यही चलता रहता है।
खैर, इससे और कुछ हुआ हो या नहीं, अडानी-अंबानी वगैरह का इंफ्रास्ट्रक्चर तो जरूर बढिया हो गया है, एक दुनिया के अमीरों में 5वें तो दूसरा 8वें नंबर पर पहुंच गया है।
न तो अचानक से प्रकृति में कोयला इतना कम हो गया है, न कोई खान अचानक बंद हुई, न हाल फिलहाल कोई ऐसी प्राकृतिक आपदा आई। न कोयला निकालने वाले मजदूर कम पड गये हैं, न उन्होंने कोई हडताल ही की है। न कोयला लाने ले जाने वाले जहाज-रेल ही नष्ट हो गए हैं, न ही उन्हें चलाने वाले श्रमिकों ने मजदूरी बढवाने के लिए काम बंद किया है।

फिर अचानक ये ‘सप्लाई चेन डिसरप्शन’ क्यों? वो भी कहीं एक दो जगह नहीं, पूरी दुनिया में।
कोई सामान्य तौर पर समझ में आ सकने वाली वजह?
पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के आपसी टकराव और मुनाफे की लडाई के अलावा क्या हो सकता है? इजारेदार पूंजीपति पूरी दुनिया को ब्लैकमेल कर कीमतों को आसमान पर पहुंचा रहे हैं, सुपर मुनाफा लूट रहे हैं, और क्या?
या फिर उत्पादक शक्तियां और तकनीक विकसित हो जहां पहुंच गई है उसे समाज हित में चलाने में निजी मालिकान पर आधारित दिवालिया पूंजीवादी उत्पादन संबंध सक्षम नहीं?
पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था की अराजकता विकसित उत्पादक शक्तियों को संचालित नहीं कर सकती, उसके लिए सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु नियोजित उत्पादन व्यवस्था अर्थात समाजवादी व्यवस्था चाहिए।

एक ओर पूंजीवाद पूरी दुनिया को हर तरह के विनाश के मुहाने पर ला खडा कर रहा है तो यहां बहुत से लाल बुझक्कड़ वही तोतारटंत बोलते जा रहे हैं कि मजदूर काम नहीं करते इसलिए समस्या है, निजी क्षेत्र में दे दो, सब सही हो जायेगा। शासक वर्ग के 'विद्वान' तो यह भी बता रहे हैं कि पूरी कृषि इजारेदार पूंजीपतियों को सौंप दो मानवता का कल्याण ही हो जायेगा, खाद्य पदार्थ सस्ते हो जायेंगे।
   _अरे, ये अंतरराष्ट्रीय कोयला खनन, व्यापार और ढुलाई तो सारा निजी क्षेत्र में ही है न?_
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