पुष्पा गुप्ता
_पुल बनाने में दसियों साल लग गए थे। बेहिसाब पैसा खर्च हुआ था। बड़े-बड़े नेताओं ने पुल के बारे में बड़े-बड़े बयान दिए थे। कुछ ने पुल को जनता की जीत बताया था और कुछ ने इसे भारतीयता की पहचान कहा था। एक दो ने कहा था कि यह हमारे विश्व गुरु होने का प्रमाण है।_
कुछ ने दावा किया था कि यह हमारे अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ता है। कुछ ने कहा था कि पुल बनने के बाद ही देश आजाद हुआ है कुछ ने आशान्वित किया था कि आर्थिक प्रगति पुल बनने के बाद ही शुरू होगी।
बरहाल जितने मुंह थे, जिनकी कोई कमी नहीं थी, उतनी बातें थी। दसियों साल के बाद बनकर तैयार हुए पुल का, जैसा कि होता है उद्घाटन होना था।
एक बहुत बड़े नेता को पुल का उद्घाटन करने के लिए बुलाया गया। बहुत भव्य समारोह आयोजित किया गया जिसमें बड़े नेता ने जनता को बधाई दी।
नेता ने पुल जनता को समर्पित कर दिया। दूसरी ओर जनता ने बड़े नेता को सिर आंखों पर बिठा लिया। लाखों की भीड़ ने नेता की जय जय कार की। कहा गया कि नेता न होते तो यह पुल बन ही नहीं सकता था।
समारोह के बाद कार्यक्रम के अनुसार बड़े नेता की गाड़ी को पुल पर से गुजरना था। इस तरह पुल का विधिवत उद्घाटन होना था।
जब बड़े नेता से कहा गया कि अब वे अपनी गाड़ी पर बैठकर पुल पार करें नेता ने बड़ी विनम्रता से यह कहा की इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। पुल जनता के लिए बना है। जनता पुल को पार करेगी।
जनता नेता के विचार जान कर खुशी से झूमने लगी। नारे लगने लगे। नगाड़े बजने लगे। दीपक जलने लगे। जनता पुल की तरफ बढ़ी और धीरे धीरे पुल के ऊपर पहुंच गई।तब जाने अनजाने पता नहीं कैसे यह हुआ कि पुल टूट गया।
चूंकि जनता गर्त में चली गयी थी इसलिए यह मामला अदालत में पेश हुआ और छोटी बड़ी अदालतों से होता यह मामला देश की सब से बड़ी अदालत में पेश हुआ।
माननीय बेंच ने सहमति से फैसला दिया कि चूंकि पुल जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता के हित में बना था इसलिए दोषी जनता है। और जनता को सज़ा मिल ही चुकी है इसलिए उसे दोबारा सज़ा नहीं दी जा सकती।
….. हाँ इस घटना पर हर साल एक राष्ट्रीय शोक दिवस मनाया जाना चाहिए।
(चेतना विकास मिशन)

