शशिकांत गुप्ते
सन 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म बूट पॉलिश का यह गीत जिसे लिखा है, गीतकार शैलेंद्रजी ने।
यह गीत बच्चों की हौसलाअफजाई के लिए लिखा है। गीतकार ने गीत में बच्चों सुनहरे भविष्य को वर्णित किया है। गीत में सुनहरे भविष्य के साथ आत्मनिर्भरता की प्रेरणा भी है।
इस गीत में महत्वपूर्ण संदेश है। दूसरों पर अवलंबित नहीं रहना चाहिए। इस गीत में यह भी प्रेरक संदेश है कि, हरएक व्यक्ति में आत्मविश्वास जागृत होंना चाहिए।
वर्तमान राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक,आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में विकृतियां,विसंगतियां और विषमता परिलक्षित हो रही है। ऐसी स्थिति में उपर्युक्त गीत का स्मरण स्वाभविक और प्रासंगिक भी है।
राजनीति में एक लुभावना शब्द प्रचलित हुआ है,लाभार्थी। करोडो लाभार्थी मतलब करोड़ो लोग आय (Income) से वंचित होने पर उन्हें रोजगार मुहैया कराने बजाए, तात्कालिक राहत के रूप में राशन उपलब्ध कराया जाता है। व्यवहारिक भाषा में इसे अधिकारिक भिक्षा भी कह सकतें हैं?
इस संदर्भ गीत की इन पंक्तियों का स्मरण होता है।
भीख में जो मोती मिले, लोगे या न लोगे?
जिंदगी के आंसुओं का बोलों क्या करोगे?
जवाब भीख में जो मोती मिले तो भी हम ना लेंगे
जिंदगी के आंसुओं की माला पहनेंगे
इस गीत निम्न पंक्तिया संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती है।
मुश्किलों से लड़ते भिड़ते जीने का मजा है
भविष्य की काल्पनिक तस्वीर को गीत की इन पंक्तियों में रेखांकित है।
आने वाली दुनिया कैसी होगी समझाओ?
जवाब आनेवाली दुनिया में सब के सर पे ताज होगा
न भूखों की भीड़ होगी न दुःखों का राज होगा
वर्तमान राजनैतिक,धार्मिक,
सामाजिक,आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र बाजरवाद की गिरफ्त में आ गया है।
बाजरवाद के बढतें प्रभाव के कारण,गीत की पंकिया वादों की जगह जुमलों में परिवर्तित महसूस होती है।
बाजरवाद की मानसिकता से साहित्य भी अछूता नहीं रहा है?
इनदिनों मनोरंजन के नाम पर साहित्य की दुर्दशा प्रत्यक्ष दिखाई दे रही है। फूहड़ता को बेशर्मी के साथ प्रस्तुत कर बेंचा जा रहा है। आश्चर्य होता है कि बेशर्मी से परोसी जा रही फूहड़ता को देख,सुन कर प्रसंशा करने वालो की भी कमी नहीं है।
राजनेताओं की भाषा भी हायस्पद हो गई है। राजनेता चुनावी सभाओं में मुद्दों को दरकिनार कर स्तरहीन भाषा का उच्चारण करतें हैं। राजनीति में गम्भीरता गायब होकर मसखरापन दिखाई दे रहा है। मसखरापन गली मोहल्ले कोई अनपढ़ नादान कार्यकर्ता प्रस्तुत करें तो क्षम्य है। दुर्भाग्य से सर्वोच्च पद पर विराजित शख्स हास्यास्पद भाषा का प्रयोग कर रहें हैं।
पक्ष,विपक्ष के द्वारा एक दूसरें पर निम्नस्तर के अरोपप्रत्यारोप लगाए जा रहें हैं।
उपर्युक्त मुद्दों पर गम्भीरता से सोचने समझने पर गीत की अंतिम पंक्तियां पुनः दुहराने का मन करता है। मन करता है, मतलब मन की बात जैसा दिखावा नहीं,वास्तविकता में मन करता है।
काश यह पंक्तियां भविष्य में यथार्थ में परिवर्तित हो इन्ही कामनाओं के साथ पूर्ण विराम।
आने वाली दुनिया में सब के सर पे ताज होगा
न भूखों की भीड़ होगी न दुःखों का राज होगा
अंत में ईश्वर से मतलब सीधे सीधे राम भगवान से यही प्रार्थना है कि भारत का मूल स्वरूप मतलब लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता यथावत बनी रहे।
भारतीय भाई भाई का नारा बुलंद हो।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

