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वैदिक दर्शन में ब्रह्मविद्या का स्वरूप

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~ डॉ. विकास मानव

वेद-वाङ्मय का ज्ञानकाण्ड है वह उपनिषद साहित्य, जिस के बल पर अध्यात्म ने घोषणा की :
तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।
कर्म वह है जो बन्धन के लिये न हो और विद्या वह है जो बन्धन से मुक्त कर दे।
हमारे ऋषि पूर्वजों ने इसी विद्या के प्रकाश में अनन्त सच्चिदानन्द परब्रह्मका साक्षात्कार किया, कराया और इस विद्या को ब्रह्मविद्या कहकर परमतत्त्व (ब्रह्म) के साथ रहने वाले उसके सम्बन्ध को भी स्पष्ट कर दिया।
प्रतिपादन पद्धति, विशेष ज्ञातव्य, परम्परा, आदि के भेद से उसके अनेक रूप स्वाभाविक थे, जो विविध उपनिषदों में तथा एक ही उपनिषद् के विविध भागों में परिगृहीत होकर साधकों के लिये प्रत्यक्ष भी हुए. तथापि ब्रह्मविद्या के इन विविध रूपों के अन्तस्तल में रहने वाली स्वरूपगत एकता मिट न सकी, प्रत्युत सुस्थिर बनी रही.

इसका श्रेय था मीमांसा की उस पद्धति के लिये, जिसने इन सभी ब्रह्म विद्याओं का – ब्रह्म विद्याके विविध रूपों का समन्वय किया था। इसी पद्धति का आश्रय लेकर ब्रह्म-सूत्रकार ने प्रमुख मानी जाने वाली बत्तीसों ब्रह्म-विद्याओं की चर्चा की और उनके सामरस्य का विवेचन किया।
विहङ्गम दृष्टि से अवलोकन करने पर :
१ – सद्विद्या ( छान्दोग्य उपनिषद)
२ – आनन्दविद्या ( तैतरीय उपनिषद)
३- अन्तरादित्यविद्या ( छा० ) ४-आकाशविद्या ( छा०)
५- प्राणविद्या ( छा०)
६ – गायत्री – ज्योतिर्विद्या ( छा० )
७- इन्द्र- प्राणविद्या ( छा०)
८- शाण्डिल्यविद्या (बृ०)
९ – नाचिकेतसविद्या (कठोपनिषद )
१० – उप- कोसलविद्या ( छा०)
११ – अन्तर्यामिविद्या (बृह्दारण्य उपनिषद)
१२ – अक्षरविद्या (मुण्डकोपनिषद)
१३ – वैश्वानरविद्या (छा०)
१४ – भूमविद्या ( छा०)
१५ – गार्ग्यक्षरविद्या (बृ०)
१६–प्रणवोपास्य परमपुरुषविद्या (प्र०)
१७ – दहरविद्या (तै०)
१८– :- अङ्गुष्ठप्रमित विद्या (श्वेताश्वर उपनिषद )
१९–देवोपास्यज्योतिर्विद्या ( बृ०)
२० – मधुविद्या (छा०)
२१–संवर्गविद्या ( छा० )
२२ – अजाशरीरकविद्या (श्वे०)
२३ – बालाकिविद्या (बृ०)
२४ – मैत्रेयीविद्या (बृ०)
२५ – द्रुहिणरुद्रादिशरीरकविद्या
२६–पञ्चाग्निविद्या (छा०)
२७ – आदित्यस्थाहर्नामक विद्या (बृ०)
२८ – अक्षिस्थाहन्नामक विद्या ( बृ०)
२९ – पुरुषविद्या ( तै० )
३० –ईशावास्यविद्या (ईशोपनिषद)
३१-उषस्तिकहोलविद्या (बृ०)
३२ – व्याहृति (शरीरकविद्या)
ये बत्तीस विद्याएँ हैं।

◆ ये विद्याएँ क्रमशः बताती हैं :
(१) परब्रह्म अपने सङ्कल्पानुसार सबके कारण हैं
(२) वे कल्याणगुणाकर वैभवसम्पन्न आनन्दमय हैं
(३) उनका रूप दिव्य है
(४) उपाधिरहित होकर वे सबके प्रकाशक हैं
(५) वे चराचरके प्राण हैं
(६) वे प्रकाशमान हैं
(७) वे इन्द्र, प्राण आदि चेतनाचेतनोंके आत्मा हैं
(८) प्रत्येक पदार्थकी सत्ता, स्थिति एवं यत्न उनके ही अधीन हैं
(९) समस्त संसारको लीन कर लेनेकी सामर्थ्य उनमें है
(१०) उनकी नित्य स्थिति नेत्रमें है
(११) जगत् उनका शरीर है
(१२) उनके विराट् रूपकी कल्पनामें अग्नि आदि अङ्ग बनकर रहते हैं
(१३) स्वर्लोक, आदित्य आदिके अङ्गी बने हुए वे वैश्वानर हैं
(१४) वे अनन्त ऐश्वर्यसम्पन्न हैं
(१५) वे नियन्ता हैं
(१६) वे मुक्त पुरुषोंके भोग्य हैं
(१७) वे सबके आधार हैं
(१८) वे अन्तर्यामीरूपसे सबके हृदयमें विराजमान हैं
(१९) वे सभी देवताओंके उपास्य हैं
(२०) वे वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत् और साध्योंके आत्माके रूपमें उपास्य हैं
(२१) अधिकारानुसार वे सभीके उपासनीय हैं
(२२) वे प्रकृतितत्त्वके नियन्ता हैं
(२३) समस्त जगत् उनका कार्य है
(२४) उनका साक्षात्कार कर लेना मोक्षका साधन है
(२५) ब्रह्मा, रुद्र आदि-आदि देवताओंके अन्तर्यामी होनेके कारण उन-उन देवताओंकी उपासनाके द्वारा वे प्राप्त होते हैं
(२६) संसारके बन्धनसे मुक्ति उनके अधीन है
(२७) वे आदित्यमण्डलस्थ हैं
(२८) वे पुण्डरीकाक्ष हैं
(२९) वे परम पुरुष (पुरुषोत्तम) हैं
(३०) वे कर्मसहित उपासनात्मक ज्ञानके द्वारा प्राप्त होनेवाले हैं
(३१) उनके प्राप्त करनेमें अनिवार्य होते हैं अन्य भोजनादिविषयक नियम भी
(३२) व्याहतियोंकी आत्मा बनकर वे मन्त्रमय हैं।

यह हृदयङ्गम कर लेनेपर परब्रह्मके स्वरूप, रूप, गुण, विभव आदिके सम्बन्धमें उठ सकनेवाली सभी शङ्काओं का समाधान हो जाता है। सगुण-निर्गुण, भेद-अभेद, द्वैत-अद्वैत, नित्यविभूति – लीलाविभूतिकी उलझनें भी सुलझ जाती हैं; किंतु पृथक्-पृथक् ब्रह्मविद्याओंमें परब्रह्मके पृथक् पृथक् नामकरण तथा ब्रह्मविद्याओंके मौलिक स्वरूप संदेहके कारण बन सकते थे.
इसके लिये रामानुजमुनीन्द्र ने ब्रह्मसूत्र के लिङ्गभूयस्त्वाधिकरण में तैत्तिरीयोपनिषद् के नारायणानुवाक को उपस्थित करते हुए लिखा है :
परविद्यासु अक्षरशिवशम्भुपरब्रह्मपरज्योतिपरतत्त्व- परमात्मादिशब्दनिर्दिष्टम् उपास्यं वस्तु इह एव शब्दैः अनूद्य तस्य नारायणत्वं विधीयते।
(श्रीभाष्य)
ब्रह्मविद्याओं में जो शिव शम्भु, परब्रह्म, परज्योति, परतत्त्व, परमात्मा आदि शब्द आये हैं, उन्हीं शब्दों में यहाँ (नारायणानुवाक में) उपास्य परमतत्त्व का निर्देश करते उनके नारायण होने का विधान किया गया है।
अतो वाक्यार्थज्ञानादन्यदेव ध्यानोपासनादिशब्दवाच्यं ज्ञानं वेदान्तवाक्यैर्विधित्सितम्।
यह लिखकर ब्रह्मविद्या से होने वाले ज्ञान को वाक्यार्थ- ज्ञान तक सीमित न कर उसे ध्यान, उपासना आदि शब्दों का वाच्य ठहराया है। इस प्रकार निर्णय करने में श्रीभाष्यकार को पाञ्चरात्र आगम और भगवद्गीता का समर्थन तथा बोधायन, टङ्क, द्रमिडाचार्य की परम्परा का बल भी प्राप्त हुआ है।
कहना न होगा कि जहाँ पाञ्चरात्र आगमने ज्ञान-काण्ड को आराध्य परक और कर्मकाण्ड को आराधन परक बताकर भगवदाराधन में सम्पूर्ण वेदवाङ्मय का विनियोग किया तथा गीताचार्य ने ज्ञान-कर्मानुगृहीत भक्तियोग का उपदेश देकर ज्ञानकाण्ड के उपासनात्मक स्वरूप को जाग्रत् किया; वहाँ महर्षि बोधायन की परम्परा ने कर्ममीमांसा, दैतमीमांसा और ब्रह्ममीमांसा का सम्मेलन कर सर्वकर्मसमाराध्य सर्वदेवान्तर्यामी परब्रह्म की उपासना को परमपुरुषार्थ का साधन स्थिर करके ब्रह्ममीमांसा की प्रधानता स्थापित की।
इस प्रकार ब्रह्मविद्याओं का जो मौलिक उपासनात्मक स्वरूप सामने आता है, उसको साध्यभक्ति समझ लेने पर यह भी कह देना आवश्यक हो जाता है कि ब्रह्मविद्याओं के मौलिक स्वरूप के अन्तर्भूत सिद्धभक्ति का संदेश भी रामानुजमुनीन्द्र ने दिया है।
शरण्य-परमतत्त्व के माहात्म्य के रूप में यद्यपि प्रत्येक ब्रह्मविद्या में इस सिद्ध-भक्त की झाँकी दिखायी देती है, तथापि पृथक् न्यासविद्या ( तै०- श्वे०) के रूप में उसे वह स्वतन्त्र स्थान भी मिला है, जो बत्तीसों ब्रह्मविद्याओं से समानता ही नहीं करता, अपितु विशेषता भी ग्रहण करता है। यही ‘न्यासविद्या’ है।
परम गुह्यतम वह शरणागति-मार्ग जिसमें परमपुरुष की कृपा के सहारे साधक कृतार्थ और कृतकृत्य हो जाता है। अन्य विद्याओं के रूप में ब्रह्मविद्या ब्रह्म को प्राप्त कराने वाली विद्या है; परंतु न्यास विद्या के रूप में वह परब्रह्म की अपनी दयामयी विद्या है, जो साधन की सारी कठिनाइयों को दूरकर और सारी बाधाओं को मिटाकर अकिञ्चन अनन्यगति साधक को स्वयं परब्रह्म तक पहुँचा देती है।

विद्या जिसके ज्ञान के माध्यम से उस निर्गुण निराकार ब्रह्म को जानकर सभी बंधनों से मुक्त हुआ जा सके उसे ' ब्रह्मविद्या ' कहते हैं। ब्रह्मा ही उस ब्रह्म के प्रथम सगुण स्वरूप थे जिसके माध्यम से ब्रह्मविद्या का ज्ञान ऋषियों को प्राप्त हुआ। उपनिषद् वो आध्यात्मिक ज्ञान है जिसके माध्यम से जिवात्मा के अंदर समाहित आत्म (आत्मा) ब्रह्म को जाना जा सकता है।

मुण्डकोपनिषद् अथर्ववेद के मंत्रभाग के अंतर्गत आता है। अथर्ववेद का एक नाम है ‘ ब्रह्मवेद ‘ है। अथर्ववेद के ज्ञाता को ‘ ब्रह्मा ‘ कहा जाता है। वैदिक यज्ञों में सर्वोच्च आचार्य के पद को ‘ ब्रह्मा ‘ ही कहा जाता है। ये ब्रह्मा ही सृष्टि के निर्माणकर्ता विश्वकर्मा कहलाते हैं उन्हीं को पुरोहित एवं देवतागण मुख्यरूप से यज्ञ के हवि को अर्पण करते हुये अपनी मुक्ति की याचना करते हैं ;
एतं भागं परि ददामि विद्वन् विश्वकर्मन् प्रथमजा ऋतस्य। अस्माभिर्दत्तं जरसः परस्तादच्छिन्नं तन्तुमनु सं तरेम॥
– (अथर्ववेद -कांड -६, सूक्त – १२२, मंत्र – १)
अर्थात – हे समस्त जगत् का निर्माण करने वाले विश्वकर्मा ! आप सर्वप्रथम प्रकट हुए हैं। हम आपकी महिमा को जानते हुए, इस पक्व हवि को अपनी रक्षा के लिए आपको अर्पित करते हैं। यज्ञीय प्रक्रिया के इस अविच्छिन्न सूत्र का अनुसरण करके हम वृद्धावस्था के पश्चात् भी पार हो जाएँगे सद्गति पा जाएँगे।
मुण्डकोपनिषद् द्वारा ब्रह्मविद्या के संदर्भ में जान सकते हैं , जिसमें सर्वप्रथम इस सृष्टि में प्रकट आदि ब्रह्मा (विश्वकर्मा, त्वष्टा) ही उस ब्रह्मविद्या के ज्ञाता एवं वाहक थे उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को सर्वप्रथम इस विद्या ज्ञान दिया ;
ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता।
स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह॥
– (मुण्डकोपनिषद् – १-१-१)
अर्थात – सम्पूर्ण देवताओं में पहले ब्रह्मा (त्वष्टा, विश्वकर्मा) उत्पन्न (प्रकट) हुये। वह विश्वका रचयिता और त्रिभुवन का रक्षक थे। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को समस्त विद्याओं की आश्रयभूत ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया।
ब्रह्मऋषि अथर्वा को ब्रह्मविद्या प्राप्त होने के उपरांत उन्होंने अन्य ऋषियों को भी इस विद्या का ज्ञान दिया ;
अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माथर्वा तं पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम्‌।
स भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम्‌॥
– (मुण्डकोपनिषद् १-१-२)
अर्थात – अथर्वा को ब्रह्मा ने जिसका उपदेश किया था वह ब्रह्मविद्या पूर्वकाल में अथर्वा ने अङ्गी को बताई । अङ्गी ने उसे भरद्वाज के पुत्र सत्यवह से कहा तथा भरद्वाज पुत्र (सत्यवह) ने इस प्रकार श्रेष्ठ से कनिष्ठ को प्राप्त होती हुई वह विद्या ब्रह्मर्षि अङ्गिरा से कही।
ब्रह्मर्षि अंगिरा को प्राप्त ब्रह्मविद्या का ज्ञान के संदर्भ में शौनक ऋषि ने जब उनसे पूँछा तो ब्रह्मर्षि अंगिरा ने ब्रह्मविद्या का वर्णन करते हुये कहा कि ब्रह्मविद्या के दो भाग होते हैं एक परा दूसरी अपरा।
शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ।
कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति॥
– (मुण्डकोपनिषद् – १-१-३)
अर्थात – शौनक नामक प्रसिद्ध महागृहस्थ ने ब्रह्मर्षि अङ्गिरा के पास विधिपूर्वक जाकर पूछा- ‘भगवन् ! किसके जान लिये जाने पर यह सब कुछ जान लिया जाता है।

तस्मै स होवाच ।
द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च॥ – (मुण्डकोपनिषद् – १-१-४)
अर्थात – उससे (शौनक) उसने (ब्रह्मर्षि अंगिरा) कहा – ‘ ब्रह्मवेत्ताओं ने कहा कि दो विद्याएँ जानने योग्य हैं – एक परा और दूसरी अपरा ‘।

आत्म (आत्मा) के अंदर निहित परमात्म (परमात्मा) को जानकर जीव और ब्रह्म को एक अनुभव करना ही ‘ परा विद्या ‘ कहलाती है। ‘ अहं ब्रह्मास्मि , तत्वमसि ‘ अर्थात मैं ब्रह्म हूँ और वह ब्रह्म तुम ही हो। इसका आभास होने पर जीव मुक्त हो जाता है यही ‘ परा ‘ (परा विद्या) है।
जो विद्या परा ना होकर मात्र उस तक पहुँचने का माध्यम बनकर उस निराकार ब्रह्म को जानने का मार्ग प्रशस्त करती हो वो ‘ अपरा विद्या ‘ कहलाती है। सनातनी शास्त्रों में मूलरूप से मुण्डकोपनिषद् में दस अपरा विद्या का उल्लेख है जो इसप्रकार है ;
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते॥
– (मुण्डकोपनिषद् १-१-५)
अर्थात – उनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष – यह अपरा है तथा जिससे उस अक्षर परमात्मा का ज्ञान होता है वह परा है।

स्कंदपुराण में गायत्री रूपी ॐकार ब्रह्म की बहुत सुंदर विवेचना करते हुये ब्रह्म के माहात्म की सुंदर विवेचना की गई है ;
यः कालः स स्वयं ब्रह्मा यो रुद्रः स च भास्करः।
एवं शक्तिविशेषेण परं ब्रह्म स्थितं प्रिये॥
ॐकारस्तत्परं ब्रह्म गायत्री प्रकृतिः परा।
उभावेतौ नरो ज्ञात्वा न विच्यवति मुच्यते॥

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