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*आपातकाल के नायक की उपेक्षा !* 

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सवाल यह है कि आखिर क्यों भुला दिए गए राजनारायण?

राजनीतिक समझ में अनुपात के असंतुलन ने एक महान सत्याग्रही , जीवट भरे समाजवादी और अपरिग्रही राजनीतिज्ञ को जीते जी भुला दिया !

समय बडा ही निर्मम होता है और इतिहास कभी भी निष्पक्षता से दर्ज नहीं हुआ है । राजनारायण राजनीतिक इतिहास  के जिस महत्वपूर्ण अध्याय पर अपना हक रखते थे वह भी उनको नहीं दिया गया कि इंदिरा गाधी का  हारना , आपातकाल और जनता पार्टी का समूचा प्रहसन जिसने रचा वह ही भुला दिया गया !

रमाशंकर सिंह, पूर्व मंत्री मध्यप्रदेश 

आपातकाल के नायक की उपेक्षा ! 

राजनारायण क्यों याद नहीं आए, आपातकाल के 50 साल होने पर राजनारायण को आखिर क्यो  भुला दिया गया ? 

देश में आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर हलचल मची हुई है। बीजेपी इसे जोर-शोर से उठा रही है। पीएम मोदी भी ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 123वें एपिसोड में इसे लोकतंत्र का काला अध्याय बता रहे हैं ।

जयप्रकाश नारायण, जॉर्ज फर्नांडिस, मधु लिमये, आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी  जैसो की चर्चा तो खूब हो रही है। लेकिन उस शख्स को याद करने में कंजूसी हो रही है, जिसने इंदिरा गांधी जैसे ताकतवर नेता को घुटनों के बल पर ला दिया। हम बात कर रहे हैं उस राजनारायण की, जिसने लोहिया के समाजवादी सिद्धांतों को न केवल सड़कों पर उतारा बल्कि आपातकाल का असली धूमकेतु कहें तो गलत नहीं होगा । 

1917 में वाराणसी में जन्मे राजनारायण भोजपुरी-अवधी की मिट्टी से निकले जन-नेता थे । भूमिहार ब्राह्मण जाति से आने वाले राजनारायण एक जुझारु नेता थे। राजनारायण एक स्वतंत्रता सेनानी भी रहे थे। स्कूल के दौर में ही वह स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में जेल भी गए थे । उन्होंने डॉ. राममनोहर लोहिया के समाजवादी सिद्धांतों को दिल से अपनाया । उनकी सादगी, हास्य और निडरता ऐसी थी कि लोग उन्हें सुनने के लिए टूट पड़ते थे। 

सवाल यह है कि आखिर क्यों भुला दिए गए राजनारायण?

लोहिया के सपनों सामाजिक न्याय, समता, और लोकतंत्र को वे सड़क से संसद तक ले गए । 1971 में जब कोई भी इंदिरा गांधी के खिलाफ रायबरेली से चुनाव लड़ने को तैयार नहीं था, राजनारायण ने लड़ने का हां भरी । हालांकि वे हार गए, लेकिन हार कहां मानने वाले थे? उन्होंने कोर्ट में याचिका दायर की और 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा का चुनाव रद्द कर दिया । बस, यहीं से शुरू हुआ वो तूफान, जिसने 13 दिन बाद आपातकाल को जन्म दिया । 

2025 में आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर बीजेपी और कई नेता उस दौर को याद कर रहे हैं, जब प्रेस की आजादी छिनी, विपक्षी नेता जेलों में ठूंसे गए और लोक अधिकार निलंबित कर दिए गए । 

लेकिन आपातकाल के नायक रहे राजनारायण को याद करने में कंजूसी दिखाई जा रही है । उनकी याचिका की वजह ही से तो इंदिरा गांधी ने आपातकाल थोप दिया था । 

हालाँकि सोशल मीडिया पर कुछ लोग उन्हें “लोकतंत्र का शेर” बता रहे हैं तो कुछ कहते हैं कि अगर राजनारायण न होते, तो शायद आपातकाल का इतिहास ही अलग होता । 1977 में तो उन्होंने कमाल ही कर दिया था । चुनावो में रायबरेली से इंदिरा गांधी को धूल चटाकर इतिहास रच दिया था जबकि ये किसी मौजूदा प्रधानमंत्री की पहली चुनावी हार थी । 

न्यूयॉर्क टाइम्स ने उनके निधन पर बाद में लिखा था , ‘ महात्मा गांधी के विचारों का कट्टर समर्थक, एक शेरदिल इंसान.’ फिर भी, उन्हें वो सम्मान क्यों नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे?

ये सवाल गूढ़ है की क्या बिना राजनारायण के आपातकाल आता ? 

राजनारायण की याचिका ने ही इंदिरा गांधी पर इस्तीफे का दबाव बनाया, ये सच है । लेकिन क्या आपातकाल सिर्फ उनकी वजह से आया? शायद नहीं ।

जयप्रकाश नारायण का असहयोग आंदोलन, जनता का असंतोष और सेना के तख्ता पलट को उकसाने जैसी अफवाहें भी माहौल गरमा रही थीं।

राजनारायण की याचिका ने आग में घी का काम जरूर किया था । अगर वो याचिका न होती, तो शायद आपातकाल का समय या रूप अलग होता, लेकिन इसे पूरी तरह टालना मुश्किल था । 

बीजेपी के लिए राजनारायण की समाजवादी विरासत शायद उनके लिए असहज है । उनकी निडरता, लोहिया के सिद्धांतों को जमीनी स्तर पर लागू करने की जिद, और तानाशाही को ललकारने का जज्बा आज भी प्रासंगिक है । 

आपातकाल के 50वें साल में उनकी अनदेखी अफसोसजनक है क्योंकि वे सिर्फ इंदिरा गांधी को हराने वाले नेता नहीं थे वे लोकतंत्र के उस जुनून का प्रतीक थे, जो सत्ता को चुनौती देता है । राजनारायण की कहानी समाजवाद, साहस, और लोकतंत्र की जीत की कहानी है । आपातकाल के 50वें साल में उनकी चर्चा हमें याद दिलाती है कि एक अकेला शख्स भी सत्ता के तूफान को रोक सकता है । 

क्या अब समय नहीं कि इस धूमकेतु को वो सम्मान मिले, जिसका वो हकदार है ? बीजेपी के द्वारा राजनारायण जी की उपेक्षा करना तो समझ में आता है पर अन्य गैर कांग्रेसी दलो द्वारा उनकी उपेक्षा करना समझ से परे है  ? यह राजनारायण ही थे , जिन्होंने चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनवाने मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी  ।

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