शशिकांत गुप्ते
चुनाव की नाव में सवार सभी उम्मीदवार विभिन्न आकर प्रकार की राजनैतिक कश्तियों में उम्मीद लगाए खड़े हैं।
बहुत से अनुभवी हैं। बहुत से पूर्ण रूप से खेनवहारो पर निर्भर है। बहुत से आश्वस्त है कि जाति बिरादरी के बल पर ही अपनी नय्या पार लगा लेंगे।
एक कश्ती तो विश्वभर की सबसे बड़ी कश्ती हो का दम्भ भरती है।
इस कश्ती की विशेषता है कि, इस कश्ती के सारे के सारे खेवनहार आस्थावान लोग हैं। यह कश्ती पूर्ण रूप से पवित्र रंग में रंगी है।
इस कश्ती के खेवनहरों ने गणवेश बदल दिया है। लेकिन अपनी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता को प्रमाणित करने के लिए कश्ती को चलाने का पाठ्यक्रम नहीं बदला है।
इस कश्ती में सवार अनुशासित अनुयायिओं का दावा है कि,जो भी कुछ हुआ,हो रहा है, और होगा,इसका सारा श्रेय इन्हें ही है।कारण इनके पूर्व तो भारत भूमि की धरा पर किसी ने कुछ किया धरा ही नहीं था।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि, यह एक मात्र ईमानदार लोगों की कश्ती है। इनकी रणनीति यह होती है कि,हर कार्य प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए।
सबसे बड़ी प्राथमिकता देश की सुरक्षा के लिए महंगे विमान खरीदना। दूसरी प्राथमिकता यदि कोई खाद्य पदार्थ महंगा हो जाए तो वित्त मंत्री का प्रामाणिकता के साथ आमजन को व्यवहारिक उपदेशात्मक वक्तव्य देना कि,मै प्याज नहीं खाती हूँ। इतना ईमानदाराना साहसिक वक्तव्य आज तक किसी भी वित्तमंत्री ने नहीं दिया है?
पूर्व में कोई भी प्रधानमंत्री रसायनशास्त्र का विशेषज्ञ नहीं था। देश के बेरोजगरों का सौभग्य है कि, पहली बार रसायनशास्त्र में निपुण व्यक्ति मिला है। पूर्व में किसी ने भी सड़क किनारे बहने वाले गटर मतलब नाले की गैस का ईंधन के रूप से उपयोग कर पकौड़े तल कर स्वरोजगार की महत्वपूर्ण योजना बताई हो?
प्रधानमंत्री जिस प्रदेश से निर्वाचित हुए हैं।उस प्रदेश की बागडोर भी एक योगी के पवित्र हाथों में है।
जब से इस महापुरुष ने प्रदेश की बाग डोर संभाली है। प्रदेश की जनता का दिल बाग बाग हो गया है। प्रदेश में प्राथमिकता के अधार पर सबसे पहले यहाँ की क़ानूनव्यवस्था सुदृढ़ की गई। अब कोई भी असामाजिक तत्व प्रदेश में दिखाई नहीं देता है?
हॉ उनलोगों को कानून की अवहेलना करने की छूट है जो स्वयंभू संत है?पवित्र वस्त्र धारण करतें हैं? ऐसा आरोप है?
इनलोगों ने प्राथमिकता के आधार पर शहरों,नगरों के नाम बदल का अतिमहत्वपूर्ण कार्य किया। यह कार्य आगे भी जारी रहेगा। ऐसे कार्य पर भी यदि विपक्षी इनपर नाम रखतें है, मतलब आलोचना करतें हैं, तो करने दो? विपक्ष की आवाज तो आवाम तक पहुँच ही नहीं पाती है।
इन्होंने प्राथमिकता के आधार पर कालाधन समाप्त कर दिया है? आतंकवाद का खात्मा हो गया है?
महामारी के लिए इन्होंने स्लोगन दिया ही है। लड़ना है डरना नहीं है।
ये आस्थावान लोग हैं। महामारी पर भी महामृत्युंज जैसे किसी मंत्र का सामूहिक जाप कर महामारी को भी भगा ही देंगे।
वर्तमान में अहम सवाल है। चुनाव की नाव में सवार उम्मीदवारो की नय्या पर लगती है या नहीं?
चुनावी मौसम में प्रचार की हवा किसको कितना सहयोग करती है यह समय पर निर्भर है?
चुनाव की नाव खेने के लिए विभिन्न तरह के लोकलुभावन वादों के घोषणाएं की पतवार कितनी कारगर सिद्ध होती है? यह तो नतीजों के बाद स्पष्ट होगा?
कितनी कश्तियां पार होती है। कितनी मझदार में ही गोता खा कर डूब जाती है। कितनी साहिल पर ही अटक कर रह जाती है। चुनाव समर में बहुत सी कश्तियों में सवार लोगों के समर्थक खुद ही स्वयं की कश्ती में छेद कर डुबोने की कोशिश करतें हैं?
बहुत सी कश्तियां चुनाव के बाद रंग बदलती है। यह सारी बातें नतीजों पर ही निर्भर है।
बहुत से लोगों की स्थिति अति उत्साह में कहीं ऐसी ना हो जाए।
दिखला के किनारा मुझे मल्लाह ने लूटा
कश्ती भी गई, हाथ से, पतवार भी छूटा
ऐसी स्थिति उन लोगों की ज्यादा होने की सम्भवना है, जो जुमलों पर भी विश्वास कर लेतें हैं।
अच्छेदिन के इंतजार जो लोग अभी भी आस लगाए बैठे हैं। ऐसे लोगों को यह शेर पढ़ना पड़ेगा।
हमें तो अपनों ने लूटा
गैरो में कहां दम था
अपनी कश्ती वहीँ डूबी
जहाँ पानी कम था
इसीलिए हर किसी ऐरे-गैर नत्थू खैरे को चाणक्य की उपाधि नहीं देनी चाहिए।
यदि भगवान पर विश्वास रखने पूर्व स्वयं को स्वयं पर विश्वास होना चाहिए।
जागरूक नागरिक के लिए प्रख्यात शायर स्व.राहत इंदौरी का यह शेर प्रासंगिक है। जो सिर्फ आस्था का दम्भ भरते है उनके लिए है।
समन्दरों में मुआफिक हवा चलाता है
जहाज़ खुद नहीं चलते खुदा चलाता है
ये जा के मील के पत्थर पे कोई लिख आए
वो हम नहीं हैं, जिन्हें रास्ता चलाता है
किसी ने बहुत सच कहा है। जब जागो तब सवेरा।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

