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NDTV: जब सच को घुटनों पर लाने की साज़िश रची गई

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छापे पड़े। ईडी लगी। सीबीआई आई। मुकदमे चले। फाइलें खुलीं।
सुर्खियाँ बनीं। और सालों तक एक ही तमाशा दोहराया गया—
डराओ, थकाओ, बदनाम करो।

प्रणव रॉय और राधिका रॉय पर इतने आरोप लगाए गए कि जैसे वे कोई अपराधी हों, जैसे NDTV कोई देशविरोधी साजिश हो।

लेकिन आज दिल्ली हाईकोर्ट ने उन सभी आयकर नोटिसों को रद्द कर दिया, और आयकर विभाग पर ₹2 लाख का जुर्माना भी ठोक दिया।

अदालत ने साफ कहा— कानून का दुरुपयोग हुआ। नोटिस गलत थे। कार्रवाई अनुचित थी।

अब सवाल सीधा है—

अगर नोटिस गलत थे, तो सालों की बदनामी किसने लौटाई?
अगर आरोप झूठे थे, तो NDTV को आर्थिक रूप से तोड़ने की कीमत कौन चुकाएगा?

सच यह है कि NDTV को अदालत में नहीं, सत्ता की मशीनरी से हराया गया।

लगातार दबाव, निरंतर जांच, अनंत मुकदमे— आखिरकार NDTV
कर्ज के जाल में फंसा और वही हुआ
जो सत्ता चाहती थी— NDTV अडानी के हाथों चला गया।

आज अदालत ने रॉय दंपत्ति को राहत दी, लेकिन एक स्वतंत्र न्यूज़ चैनल हमेशा के लिए बर्बाद कर दिया गया।

यह सिर्फ एक चैनल की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जहां सवाल पूछना अपराध बन गया, और सच दिखाना सजा।

आज गोदी मीडिया जश्न में है, लेकिन कल जब सत्ता बदलेगी, तो इतिहास यही पूछेगा—

NDTV को झुकाने वालों को सज़ा क्यों नहीं मिली?
लोकतंत्र के इस अपराध का हिसाब कौन देगा?

न्याय सिर्फ अदालत में नहीं होता, न्याय तब पूरा होता है
जब अपराध करने वालों की पहचान हो और उन्हें जवाबदेह ठहराया जाए।

आज फैसला आया है। सच सामने आया है। अब बारी जनता की है—
यह तय करने की कि क्या मीडिया की आज़ादी कुछ कॉरपोरेट और सत्ता गठजोड़ के हवाले कर दी जाएगी?
हनी श्रीवास्तव ✍️

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