शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी मिलने आए,और आते ही सन 1961 में प्रदर्शित फिल्म अमर रहे ये प्यार का गीत सुनाने लगे।
इस गीत को लिखा और गाया है,गीतकार प्रदीपजी ने।
कवि,गीतकार गायक प्रदीपजी मूल नाम है। रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी
मैने पूछा आज इस गीत का स्मरण करने का कोई खास कारण है?
सीतारामजी कहा आज इस धरा पर यत्र,यत्र और सर्वत्र मानवीय संवेदनाएं क्षीण होते देख,उक्त गीत का स्मरण हुआ।
इस गीत को जस का तस लिख दो तो,प्रासंगिक,सटीक व्यंग्य हो जाता है। लेख में गीत की कुछ ही पंक्तियां
उद्धृत की है।
आज के इस इंसान को यह क्या हो गया
इसका पुराना प्यार कहाँ पर खो गया
कैसी यह मनहूस घडी है, भाईओं में जंग छिड़ी है
कहीं पे खून कहीं पर ज्वाला, जाने क्या है होने वाला
चरों और दगा ही दगा है, हर छुरे पर खून लगा है
आज दुखी है जनता सारी, रोते हैं लाखों नर नारी
रोती सलमा रोती है सीता, रोते हैं कुरान और गीता
दस लिया सारे देश को जेहरी नागो ने,
घर को लगादी आग घर के चिरागों ने
अपने देश था वो देश था भाई
लाखों बार मुसीबत आई
इंसानों ने जान गवाई, पर बहनों की लाज बचाई
लेकिन अब वो बात कहाँ है, अब तो केवल घात यहाँ है
हमने अपने वतन को देखा
आदमी के पतन को देखा
सब के सब हैं यहाँ अपराधी, हाय मोहोब्बत सबने भुलादी
आज बही जो खून की धारा, दोषी उसका समाज है सारा
लेकिन इस इंसान को देखो, धरती की संतान को देखो
कितना है यह हाय कमीना, इसने लाखों का सुख छीना
कैसा यह खतरे का पहर है, आज हवाओं में भी ज़हर है
इनदिनों ये कहावत चिरितार्थ हो रही है।
अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान
जिस पर सत्ता का वरद हस्त है
वह जंघन्य अपराधी भी समाज में मदमस्त है
गीत की उक्त पंक्तियां लेखक ने सिर्फ उध्दृत की है। गीतकार और गायक का नाम पहले ही लिख दिया है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

