शशिकांत गुप्ते
हरएक व्यक्ति चाहे वह,आयु में छोटा हो बड़ा हो,जब वह किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है तो, उसे अपने स्नेहियों से आशीर्वाद की अभिलाषा रहती है।शिक्षा क्षेत्र में परीक्षा उतीर्ण होने पर।हरतरह के रचनात्मक क्षेत्र में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त करने पर,विधिवत धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न होने पर, घर के बड़े बुजुर्गों से आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।बड़े बुजुर्ग सिर पर हाथ रख कर आशीष देतें हैं।
आशीर्वाद का आध्यात्मिक महत्व है।आध्यात्मिक सद्गुरु के शिष्य जब चरणस्पर्श करता है,और सद्गुरु शिष्य के सिर पर हाथ रखता तब शिष्य के शरीर में सद्गुरु की सात्विक ऊर्जा का संचार होता है।
आशीर्वाद का इतना बड़ा,महत्वपूर्ण और व्यापक अर्थ है।
भौतिकवाद और पूंजीवाद से ग्रस्त राजनीति ने आशीर्वाद को सड़क पर लाकर प्रदर्शन का विषय बना दिया है।यह बाजरवाद में लिप्त राजनीति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
आशीर्वाद बहुमूल्य सम्मान है।सम्मान आज्ञा से मिलता है,निवेदन से नहीं।
Respect is Commanded not Demanded.
इनदिनों आशीर्वाद मांगने के पीछे नीतिविहीन राज छिपा है।
आमजन से आशीर्वाद मांगा जा रहा है।आमजन महंगाई, बेरोजगारी और अपनी नदारद होती आर्थिक आय से परेशान हैं और दूसरी ओर बेशकीमती विज्ञापनों द्वारा आशीर्वाद मांग कर आमजन के जले पर नमक छिड़कने की हास्यास्पद कौशिश की जा रही है।
महंगे विज्ञापनों और अपने लावलश्कर के साथ कोरोना की तीसरी लहर को अप्रत्यक्ष रूप से आमंत्रित करते हुए अपने स्वार्थ को साधने हेतु आशीर्वाद की नुमाइश की जा रही है।
आशीर्वाद मांगने के पूर्व की पृष्ठभूमि में स्पस्ट रूप से योग्यताएं दृष्टिगोचर हो रही है?
पारस्परिक लेन देन को विधिवत पूर्ण कर वर्षो पुराने हाथ को झटक ने का कमाल कर दिखाया है।यह कमाल दिखाने के लिए कमाल शब्द में सिर्फ एक आ की मात्रा को ही हटाया है।
हाथ को झटकने का पारितोषिक प्राप्त होने पर आशीर्वाद मांगने निकल पड़े हैं।
आशीर्वाद यात्रा का सत्य यह है कि,यात्रा में सलग्न वाहनों में महंगा ईंधन भरवा कर सस्ती लोकप्रियता का ही तो प्रदर्शन होगा? ऐसा आरोप विपक्षी लगा सकतें हैं?विपक्ष की सुनता कौन है?
समाचार माध्यमों में आमजन, विशालकाय विज्ञापन देखेगा या दो चार लाइनों में छपी विपक्ष की आलोचनात्मक प्रेस विज्ञप्ति पढ़ेगा?
हम भारतवासी आदर्श के साथ संस्कारो और संस्कृति पले बढ़े हैं।हम तो अतिथि देवो भवः के सिद्धान्त को मानने वाले लोग हैं।अतिथि का रूप,रंग,आचार विचार,नहीं देखतें हैं।आशिर्वाद देने की क्रिया वर्तमान में ही होती है।इसीलिए इतिहास में जाकर दिमाग को ज़हमत देने की जरूरत नहीं है।इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो बात बहुत दूर तक जाएगी।इसीलिए यहीँ पूर्ण विराम।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

