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सरहदों की स्याही मिटाने,एक साझा संघीय ढांचे में जोड़ने की जरूरत

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मनोज अभिज्ञान

दुनिया में बहुत कम क्षेत्र ऐसे हैं जिनकी भौगोलिक निकटता, सांस्कृतिक समानता, भाषाई विविधता और साझा इतिहास एक साथ इतने गहरे जुड़े हों, जितना भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और म्यांमार के मामले में है। सदियों तक यह भूभाग व्यापार, परिवहन, कला, साहित्य, धर्म और सामाजिक आदान-प्रदान का निरंतर प्रवाह रहा है, जिसे आधुनिक सीमाओं ने कृत्रिम रूप से अलग कर दिया। आज जब वैश्विक चुनौतियां सीमाओं को नकारते हुए सामने खड़ी हैं, चाहे वह जलवायु संकट हो, आर्थिक प्रतिस्पर्धा हो या सुरक्षा खतरे, इस पूरे क्षेत्र को एक साझा संघीय ढांचे में जोड़ने का विचार केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता बनता जा रहा है।इस संघ को ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया’ जैसा स्वरूप दिया जा सकता है, जिसमें लगभग 100 छोटे-छोटे स्वायत्त राज्य हों। ये राज्य भाषाई, सांस्कृतिक और भौगोलिक आधार पर बने हों, ताकि प्रत्येक की अपनी पहचान, प्रशासन और स्थानीय कानून हों, लेकिन रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा, जल और ऊर्जा जैसे मुद्दे साझा हों। यह ढांचा यूरोपीय संघ या अमेरिका के संघीय मॉडल से प्रेरित हो सकता है, लेकिन इसमें स्थानीय स्वशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। इससे क्षेत्रीय असंतोष कम होगा, और लोग अपनी स्थानीय संस्कृति और संसाधनों पर नियंत्रण बनाए रखते हुए बड़े संघ के लाभ भी उठा सकेंगे।

भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, नेपाल, भूटान और मालदीव का एकीकरण महज़ भू-राजनीतिक कल्पना नहीं है, बल्कि ऐसा विचार है जिसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जड़ें गहरी हैं। यह वह भूभाग है जो कभी न केवल भौगोलिक रूप से जुड़ा था, बल्कि प्रशासन, व्यापार, संस्कृति और जीवनशैली के स्तर पर भी विशाल साझा इकाई की तरह काम करता था। औपनिवेशिक काल से पहले और उसके दौरान, इस पूरे क्षेत्र में आपसी आवाजाही, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान सहज था। सीमाएं राजनीतिक समझौतों और संघर्षों के कारण खींची गईं, लेकिन समाज का ताना-बाना आज भी उन सीमाओं से बड़ा है।

भौगोलिक दृष्टि से यह क्षेत्र अद्वितीय है। हिमालय की बर्फीली चोटियों से निकलने वाली नदियां नेपाल, भूटान, भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान को जोड़ती हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियां इस पूरे उपमहाद्वीप की जीवनरेखा हैं। म्यांमार भारत के उत्तर-पूर्व से जुड़ा है और सांस्कृतिक रूप से असम, मणिपुर और नागालैंड के साथ जीवंत रिश्ता रखता है। श्रीलंका और मालदीव समुद्री व्यापार और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इस पूरे क्षेत्र में जल, खनिज, कृषि भूमि, वनों और समुद्री संसाधनों का ऐसा संयोजन है जो मिलकर इसे दुनिया का सबसे आत्मनिर्भर और संसाधन-संपन्न क्षेत्र बना सकता है।

सांस्कृतिक स्तर पर चाहे भाषाएं अलग हों या धर्म, लेकिन लोक-संस्कृति, संगीत, परिधान, भोजन और त्यौहारों में गहरी समानताएं हैं। दीपावली, ईद, पोंगल, पोहेला बोइशाख, बैसाखी, बौद्ध पर्व – ये सब सीमाओं के पार मनाए जाते हैं। विवाह परंपराएं, सामाजिक मूल्य और पारिवारिक ढांचा लगभग एक जैसा है। इन सांस्कृतिक धागों को अगर राजनीतिक और आर्थिक ढांचे से जोड़ा जाए, तो यह ऐसी मजबूती पैदा करेगा जो केवल कागज़ी समझौतों पर आधारित न होकर, लोगों के दिलों में बसे रिश्तों पर टिकी होगी।

आर्थिक दृष्टि से यह एकीकरण लगभग 2.1 अरब की आबादी को विशाल साझा बाजार में बदल देगा। भारत की आईटी और दवा उद्योग, पाकिस्तान का कृषि और वस्त्र उत्पादन, बांग्लादेश का तैयार कपड़ा क्षेत्र, श्रीलंका का पर्यटन, म्यांमार के खनिज, भूटान की जलविद्युत, नेपाल का पर्वतीय पर्यटन और जल संसाधन, तथा मालदीव का समुद्री पर्यटन आदि सब मिलकर आर्थिक महासत्ता का निर्माण कर सकते हैं। साझा मुद्रा, मुक्त व्यापार और एकीकृत बुनियादी ढांचा परियोजनाएं इसे वैश्विक आर्थिक ब्लॉकों के बराबर ला खड़ा करेंगी।

इस संघ को ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया’ जैसा स्वरूप दिया जा सकता है, जिसमें लगभग 100 छोटे-छोटे स्वायत्त राज्य हों। ये राज्य भाषाई, सांस्कृतिक और भौगोलिक आधार पर बने हों, ताकि प्रत्येक की अपनी पहचान, प्रशासन और स्थानीय कानून हों, लेकिन रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा, जल और ऊर्जा जैसे मुद्दे साझा हों। यह ढांचा यूरोपीय संघ या अमेरिका के संघीय मॉडल से प्रेरित हो सकता है, लेकिन इसमें स्थानीय स्वशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। इससे क्षेत्रीय असंतोष कम होगा, और लोग अपनी स्थानीय संस्कृति और संसाधनों पर नियंत्रण बनाए रखते हुए बड़े संघ के लाभ भी उठा सकेंगे।

ऐसा संघ सीमाओं पर होने वाले संघर्षों, जल बंटवारे के विवादों, व्यापारिक अवरोधों और सामरिक असुरक्षाओं को कम कर सकता है। एक साझा रक्षा तंत्र चीन, अमेरिका या किसी भी बाहरी शक्ति के दबाव का संतुलित जवाब दे सकेगा। यह संघ वैश्विक जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा संकट जैसे मुद्दों पर भी संयुक्त रूप से बेहतर रणनीति बना सकेगा।

सबसे बड़ी चुनौती आपसी अविश्वास, धार्मिक और जातीय तनाव, तथा राजनीतिक नेतृत्व की संकीर्ण सोच है। अतीत की कुछ घटनाओं ने गहरे घाव दिए हैं, और बाहरी शक्तियां इस क्षेत्र को विभाजित रखने में रुचि रखती हैं। फिर भी, नागरिक समाज, व्यापारिक वर्ग, अकादमिक जगत और युवा पीढ़ी इस विचार को छोटे-छोटे सहयोगात्मक कदमों से आगे बढ़ा सकते हैं, जैसे क्षेत्रीय व्यापार समझौते, साझा पर्यावरणीय परियोजनाएं और सांस्कृतिक आदान-प्रदान।

शुरुआत भरोसा बनाने से होगी। पहले 12 से 18 महीनों में मौजूदा मंचों पर ठोस, मापने योग्य काम तय किए जाएं। सीमा पार चिकित्सकीय ई-वीज़ा, छात्रों के लिए बहुराष्ट्रीय स्कॉलरशिप, शोधकर्ताओं के लिए मल्टी-एंट्री परमिट, बुनियादी दवाओं पर साझा खरीद जैसी चीजें सबसे कम विवाद पैदा करती हैं और सीधे लोगों को फायदा देती हैं। कांसुलर एक्सेस, मछुआरों की रिहाई, और अनजाने सीमा उल्लंघनों पर फास्ट-ट्रैक तंत्र लागू किया जाए। मीडिया में कटु बहस कम करने के लिए संपादकों की वार्षिक गोलमेज और फेक न्यूज़ पर साझा फैक्ट-चेक कंसोर्टियम बनाया जाए। आर्मी-टू-आर्मी हॉटलाइन और सीमा सुरक्षा बलों का द्वि-मासिक समन्वय मीटिंग कैलेंडर तय हो। अभी कोई बड़ी राजनीतिक घोषणा नहीं, बस छोटे व ठोस परिणाम।

दूसरा चरण 2 से 3 साल का होगा जिसमें व्यापार और ढांचे पर जोर रहेगा। एक ‘साउथ एशियन कस्टम्स ट्रैक’ बनाई जाए जो संवेदनशील सामान छोड़कर 80 से 90 प्रतिशत वस्तुओं पर टैरिफ 5 प्रतिशत से नीचे लाए। बंगलौर से कराची, ढाका से कोलकाता, काठमांडू से पटना, थिंपू से गुवाहाटी, कोलंबो से चेन्नई, माले से तिरुवनंतपुरम तक कंटेनर गलियारों की समयबद्ध सूची बने। सीमा पर एकीकृत चेकपोस्ट, एक समान कार्गो फॉर्म और ड्राइवरों के लिए क्षेत्रीय परमिट लागू किए जाएं। बिजली के लिए क्रॉस-बॉर्डर ग्रिड एक्सचेंज बढ़े। नेपाल और भूटान की जलविद्युत, उत्तर-पूर्व और म्यांमार की गैस, भारत और पाकिस्तान की ट्रांसमिशन क्षमता, श्रीलंका की विंड-पावर, मालदीव की सोलर-स्टोरेज को जोड़ने के लिए एक बहु-पक्षीय पावर-पूल बनाया जाए ताकि पीक-डिमांड का बोझ साझा हो।

तीसरा कदम लोगों की आवाजाही का सुरक्षित विस्तार है। 3 से 5 साल में एक ‘रीजनल ट्रैवल कार्ड’ बने जो छात्रों, शोधकर्ताओं, स्वास्थ्य-उपचार और खेल टीमों के लिए बहु-प्रवेश सुविधा दे। वर्क परमिट के लिए प्वाइंट-आधारित प्रणाली अपनाई जाए, ताकि उच्च कौशल, शिक्षण-चिकित्सा और कमी वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता मिले। अवैध प्रवासन रोकने के लिए बायोमेट्रिक एग्रीमेंट और डेटा-प्रोटेक्शन कानून साथ-साथ आएं, ताकि सुरक्षा भी बनी रहे और निजता भी। भारत-नेपाल जैसी खुली या सरल सीमाओं के लिए ‘बफर-ज़ोन’ रोजगार बाजार बनाए जाएं, जहां स्थानीय नियोक्ताओं को कम कागजों में भर्ती की सुविधा मिले, पर श्रमिकों का शोषण रोकने के लिए न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा अनिवार्य हो।

चौथा चरण साझा नियमों और विवाद निपटारे की नींव डालता है। 5 से 7 साल में एक ‘रीजनल चार्टर ऑफ राइट्स’ अपनाया जाए जिसमें भाषाई, सांस्कृतिक, धार्मिक और प्रेस स्वतंत्रता के न्यूनतम मानक तय हों। निवेश सुरक्षा, उपभोक्ता अधिकार, प्रतिस्पर्धा नीति, डेटा संरक्षण और साइबर अपराध पर मॉडल कानून तैयार हों। जल बंटवारे पर ‘हिमालयन-बेसिन कॉम्पैक्ट’ जैसा ढांचा बने जिसमें गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु और सहायक नदियों के लिए संयुक्त वैज्ञानिक प्राधिकरण, रियल टाइम डेटा साझाकरण और सूखा-बाढ़ के समय स्वचालित रिलीज प्रोटोकॉल हों। मत्स्य संसाधन, ट्रांस-बाउंड्री वन्यजीव और आपदा प्रबंधन के लिए भी संयुक्त कमांड सेंटर हों जो सालाना अभ्यास करें।

पांचवां चरण सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग का है। 5 से 8 साल में गृह और रक्षा मंत्रालयों की ‘जॉइंट टास्किंग’ शुरू हो। वॉचलिस्ट और वित्तीय खुफिया पर प्रोटोकॉल बने। सीमा पर चरणबद्ध डिमिलिट्रीकरण नहीं, लेकिन ‘रिस्क-रिडक्शन’ कदम जैसे संयुक्त पेट्रोलिंग, बॉर्डर फेंसिंग की पारदर्शी मैपिंग, और शिकायतों का 30 दिन में निपटारा। समुद्री सुरक्षा के लिए अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में तट रक्षक बलों का साझा सूचना तंत्र और पाइरेसी-एंटी-नार्कोटिक्स पेट्रोलिंग प्लान लागू हो। संयुक्त मानवीय मिशन और यूएन पीसकीपिंग प्रशिक्षण केंद्र इस भरोसे को मजबूत करेंगे।

छठा चरण शासन की रूपरेखा तय करता है। 7 से 10 साल में एक ‘दक्षिण एशिया परिषद’ बने जिसमें सभी सदस्य देशों के निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल हों। दो सदनीय ढांचा कारगर रहेगा। निचला सदन आबादी-आधारित होगा ताकि बड़े देश प्रतिनिधि भार उठाएं। ऊपरी सदन समान प्रतिनिधित्व देगा ताकि छोटे देशों की आवाज सुरक्षित रहे। परिषद शुरू में सिफारिशी भूमिका निभाए, पर व्यापार, ऊर्जा और परिवहन पर बाध्यकारी क्षमता धीरे-धीरे मिले। न्याय के लिए एक क्षेत्रीय अपीली अदालत हो जो केवल संघ-संबंधी मामलों को सुने। अलग-अलग देशों की संप्रभुता जहाँ है, वहीं रहे, पर साझा विषयों पर विवाद का अंतिम निपटारा इसी मंच पर हो।

सातवां कदम 100 स्वायत्त राज्यों की दिशा में है। यह सबसे संवेदनशील काम है, इसलिए इसे आंतरिक सहमति और जनमत के बिना आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। पहले एक ‘रीजनल डिलिमिटेशन एंड रीऑर्गनाइजेशन कमीशन’ बने जिसमें जनसांख्यिकी, भाषाई-सांस्कृतिक पहचान, आर्थिक व्यवहार्यता, प्राकृतिक संसाधन और प्रशासनिक पहुँच जैसे मानदंड तय हों। बड़े प्रांतों को छोटे, कार्यक्षम राज्यों में बांटने का उद्देश्य यह नहीं कि किसी की पहचान मिटे, बल्कि प्रशासन नज़दीक आए और विकास असमानता घटे। हर राज्य की अपनी विधानसभा, पुलिस, स्थानीय कर संग्रह और शिक्षा-संस्कृति पर नियंत्रण हो।

रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा, अंतर-राज्य व्यापार, बड़े जल-ऊर्जा, मानक निर्धारण और अंतर-सूचना ढांचा संघ के पास रहे। वित्तीय संघवाद के लिए ‘डिवोल्यूशन फॉर्मूला’ बने जिसमें कर-संग्रह का पारदर्शी बँटवारा, कम विकसित राज्यों के लिए समता-अनुदान और आपदा-निधि हो। अल्पसंख्यक संरक्षण के लिए राज्य-स्तरीय भाषा आयोग और लोकायुक्त अनिवार्य हों। किसी भी सीमा-विवाद पर बाध्यकारी मध्यस्थता 90 दिनों में हो।

आठवां चरण मुद्रा और भुगतान प्रणाली का है। सीधा करेंसी यूनियन जल्दबाजी होगी। पहले 3 साल इंटरऑपरेबल भुगतान प्रणाली और रेमिटेंस की लागत घटाने पर काम हो। उसके बाद 5 से 7 साल एक ‘एक्सचेंज-रेट कोऑपरेशन बैंड’ चले, जहां मुद्राएं सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव करें। 8 से 10 साल में एक ‘रीजनल मॉनेटरी इंस्टिट्यूट’ बने जो महंगाई लक्ष्य, चालू खाते और राजकोषीय घाटे की सीमाएं सुझाए। पूरी मुद्रा संघ की ओर तभी बढ़ें जब तीन साल तक महंगाई, घाटा और ऋण अनुपात सहमत दायरे में रहें। छोटे देशों के लिए सेफ्टी-नेट क्रेडिट लाइन और संकट प्रबंधन ढांचा जरूरी होगा ताकि वे झटकों से सुरक्षित रहें।

नौवां चरण साझा डिजिटल और मानकीकरण का है। शिक्षा प्रमाण पत्र, मेडिकल रिकॉर्ड, कंपनियों का रजिस्ट्रेशन, सीमा शुल्क और अदालतों की स्थिति के लिए एक इंटरऑपरेबल डिजिटल लेजर बन सकता है जो केवल अधिकृत एजेंसियों को सीमित पहुँच दे। खुले मानक अपनाए जाएं ताकि किसी एक देश की तकनीक पर निर्भरता न रहे। साइबर सुरक्षा ऑडिट पारस्परिक रूप से मान्य हों। 5जी और फाइबर गलियारों के साथ डेटा सेंटर के लिए हर मौसम अनुकूल, कम-जोखिम वाले स्थान चुने जाएं। नागरिक गोपनीयता के लिए डेटा-मिनिमाइजेशन, स्वतंत्र नियामक और न्यायिक निगरानी अनिवार्य हो।

दसवां चरण सामाजिक-सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करता है। क्षेत्रीय विश्वविद्यालय नेटवर्क, इतिहास और भाषा के संयुक्त शोध, छात्र विनिमय, खेल लीग, फिल्म सह-निर्माण, और साहित्य महोत्सव सालाना कैलेंडर में दर्ज हों। स्कूली पाठ्यक्रमों में पड़ोसी देशों के योगदान पर संतुलित अध्याय जोड़े जाएं ताकि आने वाली पीढ़ी सीमाओं से पहले की साझा स्मृतियां समझ सके। धार्मिक और समुदायों के बीच संवाद के लिए सिविल सोसाइटी फोरम को संस्थागत समर्थन मिले।

ग्यारहवां कदम संवेदनशील मुद्दों के लिए विशेष प्रोटोकॉल रखता है। म्यांमार की आंतरिक स्थिति, पाकिस्तान-भारत के विवाद, तमिल समुदाय से जुड़े सवाल, बांग्लादेश में जलवायु-प्रेरित विस्थापन, या कश्मीर और बलूचिस्तान जैसी जटिलताएं सीधे संघीय अजेंडा में शामिल करने से पहले शांति और विकास पैकेजों के जरिए चरणबद्ध तरीके से संबोधित हों। मानवाधिकार और राजनीतिक समावेशन पर न्यूनतम मानक तय हों और उनकी वार्षिक समीक्षा एक स्वतंत्र ऑडिटर करे। किसी भी देश को असाधारण परिस्थितियों में ‘ऑप्ट-आउट’ का सीमित अधिकार हो, ताकि लचीलापन बना रहे।

बारहवां चरण संस्थाओं की राजधानी और प्रतीकों पर है। एक ही राजधानी पर जोर से तनाव बढ़ता है। बेहतर है कि न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका अलग-अलग शहरों में हों। उदाहरण के लिए न्याय की सीट एक शांत, भूकंपीय रूप से सुरक्षित पहाड़ी नगर में, विधायिका किसी ऐसे शहर में जहां अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी मजबूत हो, और कार्यपालिका किसी ऐसे स्थान पर जो लॉजिस्टिक केंद्र हो। ध्वज, मुद्रा के चिह्न और पासपोर्ट पर साझा प्रतीक विविधता को दर्शाएं। आधिकारिक भाषाओं का पैनल हो जिसमें सभी प्रमुख भाषाएं सूचीबद्ध रहें, और कामकाज के लिए 2 या 3 लिंक-लैंग्वेज चुनी जाएं। अनुवाद और दुभाषिया सेवाओं को तकनीक से मजबूत किया जाए।

तेरहवां कदम वैधता और जनमत का है। हर देश में जनमत संग्रह तभी, जब शुरुआती 5 से 7 साल के सहयोग से लोगों को वास्तविक लाभ दिखने लगें। पहले चरण के चुनाव घोषणापत्रों में ‘संघ के लिए बातचीत’ को जनादेश बनाया जाए। इसके बाद एक अंतर-सरकारी संधि पर संसदों की पुष्टि हो। जनमत संग्रह प्रश्न को सरल रखा जाए ताकि लोग भ्रमित न हों। निगरानी के लिए अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय पर्यवेक्षक बुलाए जाएं। नतीजों को समयबद्ध तरीके से लागू करने का रोडमैप साथ ही प्रकाशित हो।

चौदहवां कदम जोखिम प्रबंधन है। विफलता की स्थिति में ‘सेफ एग्जिट’ क्लॉज, आर्थिक झटकों पर स्थिरता कोष, खाद्य और ईंधन के लिए साझा रणनीतिक भंडार, और आपदा के समय स्वत: सक्रिय होने वाले राहत-कोर स्थापित हों। जो देश छोटे हैं, जैसे भूटान और मालदीव, उन्हें शुरुआती वर्षों में ज्यादा वित्तीय और तकनीकी मदद मिले और जटिल नीतियों से आंशिक छूट मिले। बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अधिक योगदान दें, बदले में निर्णय प्रक्रिया में जिम्मेदारी भी अधिक लें।

पंद्रहवां कदम समय-सारणी का यथार्थवाद है। पहले 2 साल भरोसा और छोटे समझौते। 3 से 5 साल व्यापार, ऊर्जा, परिवहन और वीजा सहूलियतें। 5 से 8 साल कानून, जल, सुरक्षा और डिजिटल इंटरऑपरेबिलिटी। 7 से 10 साल परिषद, अपीली अदालत, सीमित बाध्यकारी अधिकार और 100 स्वायत्त राज्यों की आंतरिक रूपरेखा पर राष्ट्रीय बहस। 10 से 15 साल में, यदि सूचकांक स्थिर रहें, करेंसी समन्वय गहरा करना, सीमित मुद्रा-संघ पर विचार और जनमत-संग्रह। यह धीमा दिखेगा, पर टिकाऊ होगा क्योंकि हर कदम ठोस लाभ देगा और पीछे लौटे बिना आगे बढ़ेगा।

इस सबकी शर्त दो हैं। पहली, हर चरण में नागरिक को प्रत्यक्ष फायदा दिखे, तभी राजनीति साथ आएगी। दूसरी, विविधता को संघ की शक्ति माना जाए, बोझ नहीं। 100 स्वायत्त राज्यों की संरचना स्थानीय पहचान और शासन को नजदीक लाएगी, जबकि संघीय स्तर पर रक्षा, विदेश नीति, ऊर्जा, जल, व्यापार और मानक निर्धारण जैसी साझा चुनौतियों का समाधान होगा। अगर यह क्रमबद्धता और धैर्य बना रहे, तो ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया’ भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनने वाली ठोस हकीकत बन सकता है।

यह विचार केवल अतीत की एकता की पुनर्स्थापना नहीं होगा, बल्कि भविष्य की चुनौतियों का मिलकर समाधान खोजने का तरीका होगा। ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया’ के रूप में यह पूरा क्षेत्र न केवल आर्थिक और सामरिक रूप से शक्तिशाली बनेगा, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी अपनी विविधता को संरक्षित करते हुए साझा पहचान गढ़ेगा। यह ऐसा सपना है जो अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनसमर्थन से जुड़ जाए, तो आने वाले दशकों में एशिया ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन सकता है।

(सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और दार्शनिक विषयों पर लेखन करने वाले मनोज अभिज्ञान पेशे से अधिवक्ता हैं, जो व्यवस्था के परे जाकर सोचने और लेखन को प्रतिरोध का माध्यम मानने में विश्वास रखते हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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