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न बिजली, न पानी; बड़वानी में टापू पर बसे 17 परिवार ऐसे भी हैं, जहां रोशनी कल्पना

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बड़वानी\भोपाल

एक तरफ पूरी दुनिया दिवाली मना रही है, लेकिन बड़वानी में टापू पर बसे 17 परिवार ऐसे भी हैं, जहां रोशनी कल्पना ही है। शाम ढलते ही यह टापू अंधेरे में डूब जाता है। नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर डैम के बैक वाटर में घिरा कुकरा राजघाट गांव। बैक वाटर में आ जाने से यहां 17 परिवारों की जिंदगी कैद होकर रह गई। यहां अतीत की सुनहरी यादें हैं, तो दर्द और विस्थापन की टीस भी है। आधी-अधूरी पुनर्वास नीति ने जख्म भरने नहीं दिए। अब तो यहां के लोगों के दर्द से किसी को वास्ता ही नहीं।

अफसरों से लेकर नेताओं की चौखट तक चप्पलें घिसट चुके इन गांव वालों की अब कोई नहीं सुनता। आखिर, इस हालात में भी वे क्यों गांव छोड़ने को तैयार नहीं, पढ़िए ये खास रिपोर्ट…

हमारी जमीन सोना उगलती थी, हमें पथरीली जमीन दे दी…

टापू पर रह रहे कनक सिंह बोले- हमारी यहां की जमीन सोना उगलती थी। केले, पपीते, कपास, मक्का, सब्जी समेत कई फसलें होती थीं।

हमारी आधी जमीन मध्यप्रदेश में है। डूब क्षेत्र में आने वाली जमीन के बदले में 300 किमी दूर गुजरात में मुआवजा दिया। बताइए- यहां की 8 एकड़ जमीन कैसे छोड़ दें? 300 किमी दूर से क्या हम यहां खेती करने आ पाएंगे? सरकार उस जमीन को भी लेकर पूरा मुआवजा एक ही प्रदेश में दे देती। हमारी मांग है कि हमें घर और जमीन का मुआवजा एमपी में मिले।

नाव से दो किमी दूर चलने पर आता है कुकरा राजघाट

बड़वानी जिला मुख्यालय से 8 किमी दूर राजघाट है। ये दूरी हमने सड़क मार्ग से तय की। यहां नाविक पवन केवट से मुलाकात होती है। हम उनकी नाव में सवार होते हैं। इंजन वाली इस नाव से राजघाट कुकरा गांव पहुंचने में करीब 15 मिनट लगे। इस दौरान गांधी सागर के बैक वाटर में डूबे बिजली के पोल और सूखे पेड़ यहां की अंतहीन तबाही को बयां करते दिखे। चारों तरफ फैले पानी को देखकर समुद्र सा एहसास हो रहा था। दूर से एक घर की मटमैली सफेदी दिखी। नाविक पवन केवट बोला- साहब, वही है कुकरा राजघाट। हम विस्मित थे कि आखिर चारों ओर पानी से घिरे इस टापू में कैसे कोई रह सकता है?

कुकरा घाट गांव बांध के डूब में चला गया। यहां बिजली के पोल आज भी हैं, लेकिन बिजली नहीं है। बीच टापू में रहने वाले लोगों ने मवेशी भी पाल रखे हैं।

17 परिवार और उनके मवेशी रह रहे साथ

चारों ओर बैक वाटर में कई घर डूबे नजर आए। घरों के पास गाय-भैंस चारा खाते हुए तो मुर्गे-मुर्गी दाना चुनते नजर आए। घरों के बाहर बोरियों पर कपास सूख रहा था। यहां हमारी मुलाकात देवेंद्र सिंह से हुई। 30 साल के इस युवक के चेहरे पर विस्थापन का दर्द साफ झलक रहा था। उसने बताया- हमारी जिंदगी तो इस टापू पर कैद होकर रह गई है। रात, बेवक्त कोई बीमार पड़ जाए तो अस्पताल पहुंचाना ही सबसे बड़ी चुनौती है। पानी के बीच रहते हैं, लेकिन पानी को तरसते हैं।

प्लास्टिक के दो ड्रमों की ओर इशारा करते हुए कहा कि इसी से हम गांव वाले नर्मदा के बीच धारा तक जाते हैं। पीने का साफ पानी लाते हैं। लेकिन, इसमें खतरा बहुत है। कभी भी हम नर्मदा में समा सकते हैं। गांव के किनारे का गंदा पानी पीने लायक नहीं है। सांप, बिच्छू के साथ मगरमच्छ का भी खतरा है। हमें प्रशासन ने अपने हाल पर छोड़ दिया है। अब तो कोई हमारी पीड़ा सुनना तक नहीं चाहता।

टापू पर रह रहे लोगों के लिए आने-जाने के लिए नाव ही सहारा है। यहां रहने वाले लोगों ने प्लास्टिक के दो ड्रमों की नाव बना रखी है। इसी से नर्मदा के बीच धारा तक जाते हैं। पीने का साफ पानी लाते हैं।

गांव में कोई हमारे बेटों को अपनी बेटी नहीं ब्याहना चाहता…

65 की उम्र पार कर चुके नटवर सिंह की पीड़ा जुबान पर आ गई। बोले- सोचा नहीं था कि हमारी ही आंखों के सामने बच्चे बेघर हो जाएंगे। अब तो कोई बेटी भी हमारे बच्चों को नहीं देना चाहता है। 2017 से पहले सब कुछ ठीक था।

अब तो इसी को अपनी किस्मत मान चुके हैं। दो प्रदेश की सरकारों के बीच हमारा मुआवजा भी बंदर बांट हो गया। हमारे हाथ में ये रूठी किस्मत थमा दी। किसके सामने दर्द कहें, कोई सुनने को तैयार तो हो।

इस टापू पर नटवर, कनक और देवेंद्र के अलावा बहादुर सिंह, राजेंद्र सिंह, लोकेंद्र सिंह, संतोष सिंह, यशवंत सिंह, बाबू सिंह, दशरथ सिंह, प्रेमभुवन सिंह, सुमित्रा बाई, प्रभाबाई, बिन्नू, देवो बाई, छाया, धन कुंवर का परिवार रह रहा है। दो घरों के लोग बच्चों के साथ बड़वानी में रहते हैं। इन परिवारों की कुछ महिलाएं भी बच्चों की पढ़ाई के लिए बड़वानी में रह रही हैं। वहीं, कुछ बड़े बच्चे यहीं रहकर नाव से स्कूल-कॉलेज आते-जाते हैं।

34 एकड़ जमीन छोड़कर 300 किमी भरुच में दे रहे मुआवजा

17 परिवारों की करीब 34 एकड़ जमीन इस टापू से दो किमी दूर है। ऊंचाई पर होने से वो डूब क्षेत्र में नहीं आया है। इस बार डैम 138 मीटर तक भरा है। इसकी वजह से बैक वाटर में खेती वाली बड़ी जमीन डूब क्षेत्र में समा गई है। इन परिवारों की बाकी की और जमीन डूब क्षेत्र में चली गई है। इसके एवज में 2017 में हर परिवार को गुजरात के भरुच कैसरोल गांव के समुद्री इलाके में पांच-पांच एकड़ जमीन दी गई थी। पांच लाख का मुआवजा भी मिला था। आधी रकम ढाई लाख मध्यप्रदेश सरकार ने दी और आधी रकम गुजरात सरकार के पास जमा है, बोलकर टाल दिया। ये रकम आज तक इन पीड़ितों को नहीं मिली।

आधा किमी पुल बनाने की बजाए, 11 किमी दूर का रास्ता दे रहे

कुकरा राजघाट डूब क्षेत्र के इस टापू पर रह रहे परिवार के खेत की दूरी अगर पुल बन जाए, तो महज आधा किमी ही रह जाएगा। इसके लिए प्रशासन तैयार नहीं है। वह जो रास्ता दे रहा है, उससे 11 किमी दूर से घूम कर खेत तक आना होगा। यहां के लोगों को खेतों तक जाने के लिए भी नाव की मदद लेनी होती है। अभी उनके खेतों में कपास तैयार है। इस बार बैक वाटर लेवल अधिक होने से खेतों का कुछ हिस्सा पानी में डूबा है। जिला प्रशासन का कहना है कि पुल तो संभव नहीं है। रोड से उनके खेतों को जोड़ने की कार्ययोजना जारी है।

हम गुजरात की जमीन को सरकार से लेने से मना कर चुके हैं

कुकरा राजघाट के डूब में आने के बाद यहां के कई परिवारों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा। बड़वानी के कुकरा बसाहट में शिफ्ट कर दिया गया। प्रशासन की तरफ से यहां हर परिवार को 120 वर्ग फीट का टीन शेड दिया गया है। इसी प्लाॅट में परिवार सहित रहना, खाना आदि सब कुछ करना होता है।

टापू पर रह रहे देवेंद्र ने बताया कि 2019 में प्रशासन ने मवेशियों समेत हम परिवारों को जबरन निकाल कर कुकरा बसाहट पुनर्वास केंद्र में शिफ्ट किया था। जब वहां की नरक भरी जिंदगी से हम घरों को लौटे, तो 130 मवेशियों में 99 ही बचे थे। कई आवेदनों के बाद प्रशासन ने 1800 वर्ग फीट के 21 प्लाॅट दिए। हमें ये भी नहीं मिला, जबकि हम गुजरात की जमीन को सरकार से लेने से मना कर चुके हैं।

प्रशासन ने आखिरी बार 2018 में की थी बात

इस टापू पर रह रहे लोगों ने बताया कि 2018 में आयुक्त पुनर्वास पवन कुमार से हम लोगों की बात हुई थी। हम लोगों ने साफ कह दिया था कि हमें एमपी से उजाड़ा गया है। एमपी में ही जमीन सहित मकान का आवंटन होना चाहिए। सभी परिवारों का पंचनामा भी बना था। ये आश्वासन भी पूरा नहीं हुआ। या तो हम यहां की 34 एकड़ खेती की जमीन छोड़कर 300 किमी दूर गुजरात के भरुच जाएं, या फिर इसी टापू पर रहें।

प्रशासन की ओर से डूब क्षेत्र में आने वाले खेतों तक जाने के लिए नाव की व्यवस्था की गई है। इसी से हम भी आ-जा रहे हैं। बारिश और उसके बाद के चार महीने इसी तरह के हालात में हमें रहना पड़ता है। गर्मी में जरूर पानी सूखने पर हम पैदल आ-जा सकते हैं, लेकिन कब तक इस तरह टापू पर जिंदगी गुजरेगी?

तेज बारिश होती है, तो दिल कांप जाता है

इस टापूनुमा गांव में ज्यादा पानी गिरने से यहां रहने वाले लोगों की परेशानी बढ़ जाती है।

टीम जब कुकरा राजघाट पहुंची, तो मौसम साफ था, लेकिन कुछ देर बाद बादल छा गए। फिर हवा के साथ तेज बारिश होने लगी। बारिश में मवेशियों सहित यहां रह रहे परिवार डर कर सहम जाते हैं। अधिक देर बारिश होने पर घरों तक पानी बढ़ने का खतरा रहता है। बिजली है नहीं। कुछ घरों में सोलर लाइट और टॉर्च से रोशनी का इंतजाम है।

यहां रह रहे अधिकतर परिवार शाम ढलते ही सो जाते हैं। सुबह-शाम का सूर्योदय और सूर्यास्त बैक वाटर में देखते ही बनता है, लेकिन यहां के लोगों की जिंदगी में कब उजाला आएगा, ये किसी को नहीं पता।

बड़वानी में है महात्मा गांधी का दूसरा समाधि स्थल

बड़वानी के राजघाट का भी एक इतिहास है। शायद, आप दिल्ली स्थित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि स्थल राजघाट को ही जानते हों, लेकिन बड़वानी में भी उनका समाधि स्थल है। इसी कारण इसे भी राजघाट कहा जाता है। ये बड़वानी जिला मुख्यालय से 5 किमी दूर नर्मदा किनारे बना था। नर्मदा किनारे बसे कुकरा गांव में जनवरी 1965 में गांधी-वादी काशीनाथ त्रिवेदी ने गांधी जी, उनकी पत्नी कस्तूरबा और सचिव रहे महादेव भाई देसाई की अस्थियां लाकर इस ऐतिहासिक समाधि की नींव रखी थी। ये 12 फरवरी 1965 को तैयार हुआ था।

2017 में इसके डूब क्षेत्र में आने के बाद 2019 में इसे कुकरा बसाहट में शिफ्ट कर दिया गया। प्रशासन ने इसके लिए रात के दो बजे का वक्त चुना था। गांव वाले शिफ्टिंग के विरोध में थे।

कुकरा राजघाट गांव के चारों ओर नर्मदा का पानी है। नजारा समुद्र जैसा नजर आता है। बारिश होने पर यहां समस्या और बढ़ जाती है।

राजघाट पुल भी बैक वाटर में डूब चुका है

कुकरा राजघाट गांव के पास मौसम विभाग का एक टावर भी बना था। अब इस टावर का ऊपर का हिस्सा ही दिखता है। वहीं, नर्मदा पर राजघाट पुल भी बना था। इस पुल का शिलान्यास देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने एक फरवरी 1955 में किया था। लगभग नौ वर्ष बाद 29 फरवरी 1964 को एमपी के तत्कालीन सीएम पं. द्वारका प्रसाद मिश्र ने उद्घाटन किया।

इस पुल के निर्माण में 38 लाख रुपए का खर्च आया था। 709 मीटर लंबे और 36 पिलर पर तैयार इस पुल को बनाने में लगभग 80 हजार बोरी सीमेंट, 900 टन सरिया लगा था। बैक वाटर बढ़ने पर 14 सितंबर 2017 को इस पुल से आवाजाही बंद कर दिया गया है। अब ये पुल साल में 8 महीने पानी में डूबा रहता है।

कलेक्टर बोले, शासन का पूरा लाभ दे दिया है

टापू पर रह रहे परिवारों को लेकर बड़वानी कलेक्टर शिवराज सिंह वर्मा से बात की। बोले- कुकरा राजघाट में डूब क्षेत्र में कुछ कृषि क्षेत्र आते हैं, उसके लिए नाव की व्यवस्था की गई है। अभी रोड बनने का काम होना है, जबकि दूसरे लोग, जो वहां रह रहे हैं। उनके लिए अस्थाई व्यवस्था की गई थी। कुछ लोग वहां रह रहे हैं और अन्य लोग चले गए हैं। उन लोगों का हमेशा ये रहता है कि हमें कुछ दिया जाए, लेकिन शासन का जो भी लाभ था, उन्हें दे दिया गया है।

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