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मेरी कलम से: न, आशा न, अपेक्षा तथापि हरते तापम , लोकम उन्नतौ घन:।।

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श्रीमती पूजा अग्निहोत्री दुबे 

 अर्थात बादल को ना किसी से आशा है ना अपेक्षा है उस पर भी वह पृथ्वी के ताप का हरण करता है ।। हे बादल इसलिए तो तेरा स्थान ऊंचा है ।।सत्य यही है जिसकी प्रवृत्ति सदैव देने की है वह किसी से क्या ले सकता है वह तो सूर्य का प्रचंड तेज विवश कर देता है समंदर को वाष्पित होने के लिए और वायु प्रचंड आवेग से पुनः उस वाष्पन को बादलों के स्वरूप में आकाश में स्थापित कर देती हैं यहां पर मैथिलीशरण गुप्त जी की यह पंक्तियां स्मरण में आती है।।है बिखेर देती वसुंधरा मोती सबके सोने पर, रवि बटोर लेता है उनको सदा सवेरा होने पर।। यही प्रकृति का नियम है। पर्याय यही है कि जब हम कुछ देते हैं तब समूचा ब्रह्मांड हमें देने के लिए संलग्न हो जाता है हां यह बात अलग है की बादल समान रूप से ही बरसता है परंतु पात्रता ही निश्चित करती है कि दिया हुआ जल किसके लिए कितना कल्याणकारी हुआ। फसलों को उन्नत करने के लिए प्रार्थना रत, किसान को अथवा सूर्य के ताप के लिए प्रार्थनारत, कुम्हार को कथन स्पष्ट है।अभिप्राय हमारे अध्ययन काल में सिखाए गए इस श्लोक को ईश्वर की शरण में रहते हुए सदैव स्मरण होना चाहिए ।।

विद्या ददाति विनयम , विनया ददाति पात्रताम, पात्रत्वाधनमापनोति धनाद, धर्मस्तत, सुखम।।।।

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