अजय असुर
ऐसी धारणा बनायी गयी है कि औरत की ना ही में हाँ छिपी होती है। पुरुष की ना का मतलब ना ही हो या है जब कि औरत की ना का मतलब हाँ। ये हमारे इस पुरुषप्रधान समाज की एक धारणा है। वर्ग विभाजित समाज में शोषक वर्ग अपने वर्गीय हितों के अनुसार नैतिकता की धारणा को भी गढ़कर समाज पर थोप देता है।
आभा शुक्ला जी का एक हमने पढ़ा लेख कई मायनों में महत्वपूर्ण है। महिलाओं के दर्द को बहुत अच्छी तरह से समाज के सामने रखने की कला उनमें है।
आभा शुक्ला जी का कहना है कि “पुरुषों के लिए और खासकर पति के लिए अक्सर पत्नी की ना का कोई अर्थ नही होता… विवाह नामक सामाजिक समझौता होते ही औरत की देह उसकी नहीं रह जाती… बीबी चाहें थकी हो या बीमार… लेकिन पति को खुश रखना उसका फ़र्ज़ होता है… पति जब चाहे उसकी देह को रौंद सकता है… बिना उसके इंकार पर गौर किये… यही हाल समाज खुली सोच और खुलकर जीने वाली लड़की का करता है… यदि बलात्कार हुआ तो दोष लड़की के छोटे कपड़ों को, रात मे चलने को दिया जायेगा…. अरे भाई, लड़की अगर कम कपड़े पहने है तो उसके कपड़े नोच लेने का हक आपको किसने दिया…? लेकिन सच ये है कि समाज ने यदि आपको तथाकथित ऐसी वैसी लड़की समझ लिया तो आपके इंकार का समाज के लिए फिर कोई महत्व नही रह जाता… यदि पति के अलावा औरत किसी गैर मर्द के साथ एक बार अपनी सहमति से सोई है तो उसके साथ यदि कोई मर्द जबरन भी सोना चाहे तो लोग ये कह कर उसको जस्टीफाई करते हैं कि अरे वो तो लड़की ही ऐसी थी… सुनो… औरत कोई रिमोट या चाभी वाला खिलौना नही है… उसकी ना की कद्र करना सीखें… फिर चाहें उससे आपका रिश्ता कुछ भी हो…”
आभा जी के इस लेख को पढ़ने के बाद लगता है कि औरतों को पुरुषों के विरुद्ध बगावत कर देनी चाहिए। मगर बगावत से पहले जरा ठहरिए और सोचिए, महिला तो मायावती भी हैं, सोनिया गाँधी, प्रियंका गांधी, अनुप्रिया पटेल, स्मृति ईरानी, नीता अम्बानी, शिल्पा शेट्टी, ऐश्वर्या राय, माधुरी दीक्षित…. भी हैं! पर क्या इनका शोषण कोई गरीब पुरुष कर पाता है? ये तो खुद ही अनेकों गरीब पुरुषों वे गरीब महिलाओं का शोषण करने में सक्षम हैं।
तो फिर लड़ाई किसके खिलाफ होनी चाहिए? महिलाओं के?
नहीं, नहीं।
हमको हमेशा यह ध्यान रखना चाहिये कि हम वर्गों में बँटे समाज में रह रहे हैं। यहाँ सिर्फ महिला पुरुष का ही विभाजन नहीं है। यहाँ अमीर और गरीब, शोषक और शोषित, उत्पीड़क और उत्पीड़ित नाम के दो परस्परविरोधी वर्गों में समाज बँटा हुआ है। महिलाओं में भी अमीर और गरीब हैं। इनमें भी शोषक और शोषित हैं।
महिला हो या पुरुष, जो भी सम्पत्ति वान है वह सम्पत्ति विहीन वर्गों का शोषण करता है। महिलाएँ वहीं तक शोषित हैं जहां तक वे सम्पत्तिविहीन हैं। चूँकि अधिकांश महिलाएँ सम्पत्ति विहीन और अधिकांश पुरुष सम्पत्तिशाली हैं इसी लिए अधिकांश महिलाएँ पुरुषों की गुलामी करने के लिए बाध्य हैं। सम्पत्ति वान महिलाएँ और सम्पत्तिवान पुरुष एक साथ मिलकर सम्पत्ति विहीन पुरुषों वे सम्पत्ति विहीन महिलाओं का शोषण कर रहे हैं। अत: सम्पत्ति वान वर्गों के खिलाफ लड़कर ही महिलाएँ मुक्त हो सकती हैं। इसके लिए गरीब महिलाओं को गरीबपुरुषों के साथ मिलकर अपने हक सम्मान की लड़ाई लड़ना होगा। मर्दवाद और नारीवाद दोनों को हराकर समाजवाद लाना होगा।
अजय असुर
रास्ट्रीय जनवादी मोर्चा

