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ना राम के, ना ही देश के

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मुनेश त्यागी

जो कर रहे हैं अलग, राम को सियाराम से
जो छोड़कर सियाराम को, कर रहे हैं श्रीराम
वे हो सकते हैं ना देश के, ना पुरुषोंत्तम राम के।

जिन्होंने हथिया ली है सत्ता, मर्यादा छोड़कर
और हो गये हैं, पूंजीपतियों के पिछलग्गू
वे हो सकते हैं ना जनता के, ना ही जहान के।

जो बेच रहे हैं देश को, गद्दी पर बैठकर
जो फैला रहे हैं धर्मांधता, सारे दिन और रात
वे हो सकते हैं ना मजदूर के, ना ही किसान के।

जो बो रहे हैं हिंसा और नफ़रत लगातार
जो ठग रहे हैं हिंदुओं को, मुसलमानों के नाम पर
वे हो सकते हैं ना जवान के,ना ही गरीब नवाज के

जिनको चिंता है नहीं, मंहगाई की बेरोजगारी की
जिन्हें चिंता सता रही बस, पैसों की और गद्दी की
वे हो सकते हैं ना देश के, ना ही अवाम के।

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