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*न्यूरिसर्च : सूंघने की क्षमता घटने से बढ़ती हैं ब्रेन संबंधी समस्याएं*

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           ~ डॉ. प्रिया

    स्मैल के ज़रिए हम अपने आसपास की दुनिया से कनैक्ट हो पाते हैं। खाने के अरोमा से लेकर गंदगी तक हर चीज़ की जांच उसकी गंध से करते हैं। न्यू रिसर्च में ऐसा पाया गया है कि जिन लोगों की स्मैल करने की क्षमता यानी घ्राण-शक्ति कम होती है, वे तनावग्रस्त (Depres) होने लगते हैं। नाक बंद होने पर अक्सर घुटन का अनुभव करने लगते हैं। रिसर्च में सामने आया है कि सूंघने की शक्ति का कम होते जाना, मस्तिष्क संबंधी विकारों की ओर संकेत करता है।

        आमतौर पर सर्दी-खांसी के समय नाक का पूरी तरह से न खुल पाना हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करने लगता है। ब्रेन धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगता है।

     जाॅल हाॅपकिन्स मेंडिसिन के वैज्ञानिकों के किए शोध से इस बात का पता चला है कि हायपोस्मिया (hyposmia) यानि स्मैल न आने की समस्या का संबध तनाव से है। अगर आप लंबे वक्त तक इस समस्या से जूझ रहे हैं, तो आप डिप्रेशन का शिकार हो सकते हैं।

      इंटरनेशनल काउंसिल ऑन एक्टिव एजिंग के अनुसार गंध का उचित प्रकार से अनुमान न लगा पाना अल्जाइमर रोग और पार्किंसंस रोग जैसे न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों के जोखिम का प्राथमिक संकेत हो सकता है।

      इस रिसर्च के तहत जब लोगों की स्मैल पावर को चेक किया गया, तो पाया गया कि इनमें से 48 फीसदी लोगों को स्मैल संबधी किसी भी समस्या से जूझना नहीं पड़ रहा था। वहीं 28 फीसदी लोगों में स्मैल सेंस कम पाई गई, जिसे हायपोस्मिया कहा जाता है। शोध में 24 फीसदी पार्टिसिपेंटस में स्मैल सेंस न के बराबर आंकी गई। वे लोग एनोस्मिया से ग्रस्त थे।

*कैसे प्रभावित होती है सूंघने की क्षमता?*

      जाॅन हापकिन्स मेडिसिन के शोध से इस बात का पता लगाया गया है कि मनुष्य की स्मैल करने की क्षमता दो कैमिकल सेंसिज़ में से एक है। ये सेंसरी सेल्स के माध्यम से काम करता है। इन्हें आलफैक्टरी न्यूराॅंस कहा जाता है।

    इनमें गंध रिसेप्टर मौजूद होता है। इनकी मदद से आसपास के सब्सटांस की ओर से जारी किए गए माॅलीक्यूल्स को पिक करता है। उन्हें बाद में इंटरप्रेट करने के लिए ब्रेन में रिले किया जाता है। स्मैल माॅलिक्यूल्स जितने हाई होते हैं, स्मैल उतनी ही तेज़ी से हम तक पहुंचती है।

*स्मैल और डिप्रेशन में क्या है संबध?*

   शोधकर्ताओं का कहना है ओल्फैक्शन और तनाव दोनों ही बायोलाॅजिकल एक दूसरे से से जुड़े हो सकते हैं।

     पिरिफॉर्म कॉर्टेक्स ब्रेन का वो पार्ट, जो स्मैल को प्रोसेसे करता है। यह न्यूरॉन्स का कलेक्शन है जो स्मैल को पहचानने और हमारे अंदर स्मैल सेंस को प्रोडयूस करने में भी मददगार साबित होता है।

     ये हमारे ब्रेन के टेम्पोरल लोब में मौजूद होता है। जो सेरेब्रम और सेरेब्रल कॉर्टेक्स का हिस्सा है। ये लिम्बिक सिस्टम का एक ऐसा काॅम्पोनेंट है, जो इमोशंस और मेमोरी को प्रभावित करता है।

*हेल्थ और बिहेवियर पर प्रभाव :*

      स्मैल की कमी का असर हमारी हेल्थ और बिहेवियर पर भी दिखने लगता है। इसके चलते न तो आप खाने के स्वाद का आंनद ले पाते हैं आरै न ही उसे महसूस कर सकते हैं।

     इसका असर ओवरआल हेल्थ पर भी दिखने लगता है। दरअसल, स्मैल के ज़रिए हम आस पास की दुनिया के संपर्क में रहते हैं। अगर आप के साथ लगातार ये समस्या बनी हुई है, तो ये लेट लाइफ डिप्रेशन का कारण बनन लगता है।

*मनोस्वास्थ्य पर सूंघने की कम क्षमता का प्रभाव :*

   यादाश्त पर इसका प्रभाव दिखने लगता है। आप बातों को भूलने लगते हैं।

  बहुत जल्दी तनाव में आ जाते हैं और परेशान रहने लगते हैं।

  घुटन का अनुभव करने लगते हैं और एकाग्रता भी कम हो जाती है।

   व्यवहार में चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है।

*समस्या से निपटने के उपाय :*

    चीजों को स्मैल करन की कोशिश करें। अपनी नाक पर अपना ध्यान क्रद्रित करें। आवजेक्टस को स्मैल करने क प्रयास लगातार करें।

     इससे आपकी समस्या धीरे धीरे कम होने लगेगी। साथ ही तनाव का लेवल भी कम होता चला जाएगा। अगर स्थिति गंभीर हो रही है, तो अपने हेल्थ केयर विशेषज्ञ से तुरंत संपर्क करें।

सोते समय नाक में शुद्ध सरसों के तेल की दो-दो बुँदे डाल लिया करें.

बार – बार शर्दीजुकाम नहीं होने दें. कोरोना जैसे वायरस से तो बिल्कुल बचें.

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