सलमान अरशद
स्त्री और पुरुष के सम्बंध जितने कटुतापूर्ण, पीड़ादायक और रहस्यमय हैं, शायद ही प्रकृति में किसी और जीव के मेल फीमेल के सम्बंध ऐसे हों !
स्त्रियों पर पुरुषों के जोक्स देखिये तो लगता है कि पुरुष बेचारा कितना निरीह प्राणी है, जो एक स्त्री के अत्याचार सह रहा है लेकिन इससे निकलने की उसकी तमाम कोशिशें नाकाम साबित हो रही हैं। स्त्री को भी वो सब फलाना फलाना करना है जो पुरुष अब तक करता रहा है। स्त्रियों का एक समूह ऐसा भी है जिसके लिए पुरुष कोई खउरहा कूकुर है जिससे हर हाल में दूर रहना है।
स्त्री पुरुष सम्बन्धों में इस रस्साकशी को समझने के लिए ज़रूरी है कि उस सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को समझा जाये जिसमें स्त्री हो या पुरुष दोनों ही कमोडिटी हैं, मुनाफ़े का हिस्सा भी और मुनाफ़े का जरिया भी।
जब स्त्री बनाम पुरुष की बहस को देखता सुनता हूँ, लोगों के विचार पढ़ता हूं, तो ये पहलू अक्सर नदारत मिलता है। ये पहले ही बता दूं कि इस विषय पर मेरा बहुत ज़्यादा अध्ययन नहीं है और मैं ख़ुद भी सिंगल हूँ। तो आप चाहें तो ताना मार सकते हैं कि जाके पैर न फटी ……!
लेकिन जो सोचता हूँ, उसे आपसे साझा करना चाहता हूं। हर मनुष्य विशिष्ट है, परवरिश, हालात, तालीम आदि में चाहे जितनी समानताएं हों, हर इंसान बाकी लोगों से अलग है। यही नहीं प्राकृतिक रूप से बनी चीजों में समरूपता नहीं होती। आप किसी पेड़ से दो फल या दो पत्ते लीजिये, उनकी सघन पड़ताल कीजिये, वो एक जैसे नहीं होंगे।
किसी नदी की तलहटी से कोई पत्थर उठा लीजिये, उसके जैसा दूसरा पत्थर ढूढिये शायद ही ऐसा दूसरा पत्थर आपको मिले।
आपकी बनाई हज़ार मशीनें एक जैसी हो सकती हैं, बल्कि होती ही हैं, लेकिन प्रकृति आपसे भी विशिष्ट है। अब दो इन्सान, स्त्री और पुरुष मिलते हैं, आकर्षण की वजहों में सेक्स प्रमुख होता है, थोड़े परिपक्व हुए तो विचार भी आकर्षण का कारण बनते हैं, लेकिन साथ होने की बुनियाद में सेक्स और प्रेम ही होता है। भले ही हमारा समाज सेक्स और प्रेम के नाम पर नाक भौं सिकोड़े लेकिन उसे पैदा इसी से होना है।
आपको सेक्स और प्रेम, दोनों के लिए “दूसरा” चाहिए। इस दूसरे के बिना इस आवश्यकता को पूरा करने के सभी तरीके आज तक आपको संतुष्ट नहीं कर पाए हैं। प्रेम सिर्फ पाना ही नहीं देना भी है। प्रेम देने की बात पर बहुत कम लोग ध्यान देते हैं। आप जब किसी बच्चे का गाल चूमते हैं, उसके सिर पर हाथ रखते हैं, कुत्ते, बकरी, मेमने के बच्चे को उठाकर चूमते हैं, तब दरअसल आप अपनी इसी ज़रूरत को पूरा कर रहे होते हैं।
इसी तरह जब किसी स्त्री/ पुरुष की उंगलियां आपके बालों में टहल रही होती हैं, तब एक बच्चे की तरह साथी की गोद में सिर रख कर आप प्रेम पाने की ज़रूरत पूरी कर रहे होते हैं। इंसान ने इन ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अब तक जितने साधन ईजाद किये हैं, वो आपकी ज़रूरत पूरी नहीं कर पाए हैं।
ये दोनों अकेली ऐसी ज़रूरतें हैं, जिनके पूरा न होने पर आपका जीवन कुंठाओं से भर सकता है, फिर इन कुंठा का बाज़ार कैसे आपका इस्तेमाल करता है, इस पर आप सोचिये। ध्यान देंगे तो पाएंगे कि इन कुंठाओं के सहारे अरबों का कारोबार चल रहा है। जाहिर सी बात है कि पूंजीवादी निजाम कभी नहीं चाहेगा कि इस बाज़ार का खात्मा हो।
अब दूसरे पहलू पर सोचते हैं। सेक्स और प्रेम मूलतः आपको साथ लाने का काम करते हैं। प्रकृति में दूसरे जीव सेक्स और सुरक्षा के लिए जुड़ते हैं, बाकी के धंधे उनकी दुनिया में नहीं हैं। लेकिन मनुष्य ने सभ्यता और संस्कृति भी पैदा की है। इन्हीं दो चीजों ने दरअसल मनुष्यों को विशिष्ट बनाया है, वरना मनुष्य को बाकी जीवों से अलग नहीं होना था। अब जब आप साथ होते हैं, तो आपकी ज़रूरतों, शौक़ और विलासिता के लिए बहुत से काम निकल आते हैं। ये काम कौन करे, इस पर विवाद होता है। काम को जेंडर, जाति और नस्ली बुनियादों पर मैनेज करने की कोशिशें हो चुकी हैं। लेकिन हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जिसमें समानता, स्वतंत्रता और बंधुता उच्चतम नैतिक आदर्श हैं, ऐसे में श्रम के प्रबंधन में भी इसका दिखना ज़रूरी है।
अब स्त्री पुरुष मिलकर काम बांट लें, उसे निर्धारित समय पर पूरा करें, बच्चे भी अपनी अवस्था के अनुसार मदद करें। आप ऐसा नहीं करेंगे तो विवाद होगा।
आप साथ रहते हैं तो एक दूसरे के विचार भी सामने आते हैं, एक दूसरे पर अपने विचार थोपेगा तो विवाद होगा, तो लोकतांत्रिक बनिये, अपने साथी के विचारों को भले ही न अपनाइये पर साथी को उसके विचारों के साथ स्वीकार तो कीजिये !
एक और पहलू विवाद का कारण बनता है। लगभग हर परिवार में बच्चे और बुज़ुर्ग भी होते हैं, अक्सर बुज़ुर्ग विवाद का कारण बनते हैं। एक तो बुज़ुर्ग आपकी ज़िन्दगी में दखल देते रहते हैं, ये अक्सर इतना बड़ा मसला नहीं होता कि इन्हें मैनेज़ न किया जा सके, दूसरा बुज़ुर्ग युवा लोगों पर आश्रित होते हैं, अब जबकि बुजुर्गों का कोई और आश्रय नहीं है तो उनकी जिम्मेदारी से भागना आपकी मनुष्यता पर सवाल होगा। एक तीसरा मसला और आता है, स्त्री को अक्सर कहा जाता है कि वो सास ससुर की सेवा नहीं करती है। सेवा का ठेका सिर्फ स्त्री के पास नहीं है, दूसरे अगर दोनों काम करते हैं तो घर के सभी काम भी दोनों को ही करने होंगे। यहाँ पुरुष, पुरुष होने का लाभ लेता ही रहता है।
अगर स्त्री नोकरी नहीं करती तो आज के दौर में घर के सारे काम मिलाकर (अगर 4-5 लोगों का परिवार है)6 घंटे से ज़्यादा के काम नहीं निकलते। ये अनुमान मध्यवर्गीय परिवारों पर आधारित है। अब एक स्त्री अगर इतना भी न करना चाहे तो फिर उसे अकेले ही रहना चाहिए, हलांकि अकेले रहने के दूसरे संकट हैं जो साथ रहने वालों से कहीं से भी कम नहीं हैं।
मूल मुद्दे पर आते हैं, स्त्री पुरुष सम्बन्धों में कड़वाहटों की बुनियाद क्या है !
सबसे प्रमुख तो अहंकार, जिससे अन्याय पैदा होता है। अगर आप अपने साथी के विचार, समझ, जिम्मेदारी लेने की स्थिति आदि के प्रति लचक नहीं दिखाते तो फिर साथ रहना मुमकिन नहीं है।
बाकी आप स्त्री या पुरुष के रूप में अकेले रहने की वक़ालत चाहे जितनी कर लें, ये है तो अप्राकृतिक। बहुत कम ऐसा होता है कि अकेले रहने वाला अकेलेपन का शिकार न हो।
हां ये हो सकता है कि आप अस्थाई संबंधों में रहें तो अकेलेपन से निजात मिलेगी और जिम्मेदारी भी नहीं उठानी पड़ेगी, लेकिन ये ऐसे ही है जैसे प्यासे को पानी पिलाने के बजाय उसके होंठ गीले किये जायें !
आपके विचार आमंत्रित हैं, मैंने एक वर्जित एरिया में छलांग तो लगा दी है, लेकिन उम्मीद है कि आपके हमले घातक नहीं होंगे
सलमान अरशद

