विजय दलाल
विकास जिसका आंकड़ों की बाजीगरी और गोदी मीडिया और सोशल मीडिया पर अंधभक्तों द्वारा किस प्रकार से पेश किया जा रहा है उसकी बानगी को समझिए। बात के संदर्भ में
खाली छोटी सी दो बातों के उदाहरण लीजिए।
अभी केवल एक कार्पोरेट रिलायंस ग्रुप की संपत्तियों पर नजर भर डालते हैं 2014 में 1,67,000 करोड़ रुपए थी जो 2023 में बढ़कर 8,03,000 करोड़ हो गई। ये तो 25 – 50 देशी – विदेशी कार्पोरेट्स में से एक है।
दूसरी ओर 80 करोड़ लोग सस्ते श्रम के लिए सिर्फ जिंदा भर रहे उन्हें 5 किलो अनाज फ्री में भविष्य में भी मिलता रहेगा मोदीजी अपने भाषणों में रोज इसकी ग्यारंटी दे रहे हैं।
और देश की भ्रमित जनता इस पर तालियां बजा रही है।
*कार्पोरेट समर्थक (क्या कह लो सरकार ही उन्हीं की है ये सरकार के मंत्री तो उनके प्यादे हैं)सरकार
हर सार्वजनिक संस्थान के उद्देश्य और भूमिका किस चतुराई से बदल रही है और बड़ी पूंजी के हित में किस तरह से उपयोग कर रही है।
1. बीमा व्यवसाय के मुनाफे का लायन्स शेयर जिसका कुछ वर्षों पहले तक देश के इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए इस्तेमाल होता था उसे नीतिगत पूंजी बाजार की ओर मोड़ दिया।
अ. कमाई का तगड़ा डिविडेंड पहले सरकार को ही दिया जाता था।. लेकिन उस समय उपभोक्ता/ग्राहक को सस्ती प्रीमियम और उस पर मिलने वाला अच्छा बोनस उसका धीरे धीरे फायदा कम करते जा रहे हैं।
ये बात कोई भी तुलनात्मक अध्ययन कर समझ सकता है।
ब. आम जनता के रूप में बीमा बहुत बड़ा सामाजिक सुरक्षा का साधन है इसी धारणा से इस पर कर ना लगाकर आयकर के प्रावधानों में अच्छी खासी छूट दी गई थी।
धीरे-धीरे इन्फ्लेशन और बढ़ती हुई आय की तुलना में आयकर के प्रावधानों में कर छूट भी कम होती गई और ऊपर से प्रीमियम पर 18 % जीएसटी भी लगा दिया गया।
स. एलआईसी के बढ़ते मुनाफे के साथ कर्मचारियों को कितना फायदा मिला उसकी बात ही छोड़ दीजिए।
द. ये भ्रम भी तोड़ लीजिए कि एलआईसी सरकार की सद्भावना से सार्वजनिक क्षेत्र में बचा हुआ है भारत का कार्पोरेट्स और विदेशी पूंजी जीवन बीमा जैसे लांग टर्म और कम मार्जिन प्राफिट वाले व्यवसाय में अपनी पूंजी नहीं लगाना चाहता है। इसलिए एलआईसी बचा हुआ है।
कार्पोरेट्स और उनका बाजार एलआईसी के धन को बैंकों के नान पर्फामिंग एसेट्स और उनके राइट ऑफ की तरह तो लूट नहीं सकता था। इसलिए एलआईसी का निवेश और शेयर बाजार और कार्पोरेट्स की मोहरा सरकार द्वारा और उनके अंधभक्तों के गुणगान चल रहे हैं।
कार्पोरेट और विदेशी पूंजी जनरल इंश्योरेंस में आ रही है और टर्म इंश्योरेन्स को प्रोत्साहन और विज्ञापित कर रही है।
आज ये बात इन संस्थानों के ट्रेड यूनियन के सक्रिय कार्यकर्ताओं तक को समझ नहीं आ रही है।
यह दौर जारी रहा तो देश फिर से काले फिरंगियों के हाथ गुलाम हो जाएगा।

