,मुनेश त्यागी
रावण तो मरकर अमर हो गया। वह हर साल जल भुन कर भी दुबारा से जलने फुंकने के लिए तैयार कर दिया जाता है। हमारी जनता का अंधविश्वासी बडा हिस्सा, हर साल जला दिए गए रावण को फिर से जलाता है, फूंकता है। यह सब कितना अंधविश्वासी, धर्मांध, अविश्वसनीय और अविवेकपूर्ण और कष्टकारी लगता है।
बहुत आश्चर्य की बात है कि रावण को फूंकने जलाने के बाद भी, हमारे यहां भांति भांति के आधुनिक रावण उग आए हैं। पता नहीं हमारे लोग इन आधुनिक रावणों को, सचमुच में जिंदे रावणों को, कब जलाएंगे? हमारे समय में उग आए ये जिंदा रावण इस प्रकार हैं,,,,,,,,
कमरतोड़ महंगाई,
ऊंच नीच की सोच,
आदमखोर जातिवाद,
अनियंत्रित बेरोजगारी,
लगातार बढ़ते दुष्कर्म,
कुलांचे भरते पाप कर्म,
लगातार बढ़ता शोषण,
अनियंत्रित बढ़ती कीमतें,
छोटे बड़े की मानसिकता,
लाइलाज दहेज का कैंसर,
काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह,
अबाध गति से बढ़ती गरीबी,
बढ़ती असमानता का साम्राज्य,
संविधान पर बढ़ते मनुवादी हमले,
कुलांचे भरती आर्थिक गैरबराबरी,
सर्वग्राही और सर्वव्यापी भ्रष्टाचार,
कुलांचे भरती आर्थिक गैर बराबरी,
आदमी को लीलती साम्प्रदायिकता,
लगातार बढ़ते अन्याओं के साम्राज्य,
बज बजाते हुए भेदभाव और छुआछूत,
लगातार बढ़ रही प्रभुत्व की मानसिकता,
पांच करोड़ मुकदमों का बढ़ता हुआ अम्बार,
अंधविश्वास धर्मांता अज्ञानता का घनघोर अंधेरा,
लगातार बढ़ती सांप्रदायिक नफरत की राजनीति,
निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण की लगातार बढ़ती गुलामी।
दशहरे के अवसर पर, पढ़े लिखे लोगों की प्रतिक्रियाएं देखकर लगता है कि क्या हिंदू? क्या मुसलमान?, सब के सब इन अंधविश्वासों, धर्मांधताओं, अज्ञानताओं और विवेकहीनताओं के साम्राज्य में डूब गए हैं। बहुत कम लोग हैं जो इस सब से बच पाए हैं।
अगर कोई इन नए उग आए रावणों का दहन करेगा, तो हम उस रावण दहन में जरूर शिरकत करेंगे।

