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आज के युग में न्यूज़ पोर्टल की आवश्यकता

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आज के आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के समय में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का चलन बढ़ चुका है ऐसे में पहले की तरह लोग अब अखबार ना पढ़कर मोबाइल के जरिए खबरों को पढ़ना पसंद करते है और जम कर एक दूसरे को खबरों का आदान प्रदान त्वरित करते हैं। इस आधुनिक युग में हर कार्य मोबाइल  की सहायता से किए जा रहे हैं सरकार भी ऑनलाइन का सपोर्ट करती नजर आती है जैसे आपको बिजली का बिल भरना है तो अब उसके लिए आपको लंबी लाइन में नहीं लगना होता है वो भी आपके मोबाइल के द्वारा ही भर दिया जाता है मोबाइल का रिचार्ज हो या ट्रेन का टिकट हो ऑनलाइन शॉपिंग करना हो, मूवी का टिकट बुक करना है,  बस का टिकट बुक करना हूं, किसी धार्मिक स्थान पर दान करना हो ऐसे अनगिनत कार्य अब मोबाइल  की सहायता से किए जा रहे हैं मोबाइल अब मनुष्य का एक अभिन्न अंग बन गया है इसी कारण अब लोग खबरें भी पोर्टल के माध्यम से पढ़ना पसंद कर रहे हैं पोर्टल पर बढ़ते विवर्स से बड़े बड़े अखबारों और प्रतिष्ठानों में खलबली सी मच गई है जबसे पोर्टल का चलन बढ़ा है  इन बड़े प्रतिष्ठानों की टीआरपी  बेतहाशा  गिर रही है तभी यह लोग यहां वहां कहते नजर आते हैं कि हजार ₹500 में पोर्टल बन जाता है क्या केवल पोर्टल बनाने से ही खबरें लग जाती है क्या पोर्टल संचालित करने वाले को मेहनत नहीं लगती क्या उसको लिखना नहीं पड़ता 

*क्यों आ गए हैं बड़े-बड़े प्रतिष्ठान भी पोर्टल और यूट्यूब पर*

प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में कुछ वर्षों में देखा जाए तो क्रांतिकारी बदलाव देखा गया है बड़े-बड़े देश के प्रतिष्ठित अखबार व चैनल की टीआरपी गिरती नजर आ रही है तो उन्होंने  पोर्टल एवं यूट्यूब का सहारा लेना चालू कर दिया है जब उन्हें  पोर्टल संचालित करने वालों  से परेशानी है तो वह खुद क्यों इन का सहारा ले रहे हैं

 *आवश्यकता है सोच बदलने की*

 आज की खबर के माध्यम से हम उन सभी प्रतिष्ठित अखबारों एवं संस्थानों को या बताना चाहते हैं कि किसी को छोटा या बड़ा कहने से वह बड़े नहीं हो  जाएंगे दुनिया सब जानती है दुनिया को सब दिखता है वर्तमान समय मे बड़े बड़े नामचीन अखबार घराने भी पोर्टल बनाकर अपनी खबरें पाठकों तक जल्द से जल्द पहुचा रहे हैं। तो जॉब पोर्टल संचालित करने वाले छोटे होते हैं तो वहां क्यों बड़े से छोटे बन रहे हैं वो अपने प्रतिष्ठित संस्थानों पर पहले जैसे ही कार्य क्यों नहीं करते हैं वह क्यों जमाने के हिसाब से बदल रहे हैं

 *कड़वी है पर सत्य है*

             हम हमारे पाठकों को बता दें कि जितनी मेहनत एक अखबार को प्रकाशित करने में लगती है उतनी ही मेहनत न्यूज पोर्टल वाले भी करते हैं। अखबारी दुनिया के संसार मे जब वास्तविक धरातल पर देखा जाता है तो पता चलता है की इन अखबारों की प्रतियां कागजो पर तो अधिक संख्या में छपना दर्शाई जाती है लेकिन वास्तविकता में उससे आधी भी प्रेस में नही छपती है। अखबारों की कितनी प्रकाशित होती है यह तथ्य समझना बहुत जरूरी है क्योकि ये लोग शासन को अखबारों का ज्यादा सरकुलेशन दिखाकर विज्ञापन के नाम पर सरकार से मोटी रकम एठने का काम करते है। कई सारे अखबार तो मात्र पीडीएफ फाइल तैयार करके व्हाट्सएप ओर शेयर कर चल रहे है वे आज तक छपे ही नही। 

           देखने में यह भी आ रहा है कि कई जिले के कुछ लोगो ने स्वयं के नाम पर तो नाम पर अपने पत्नी बेटा बहू भाई के नाम से अखबारों के टाइटल बनाकर या फिर पेपर में संवादाता आदि बनाकर सरकारी कार्यालयो में सांठगांठ कर वहां से निविदा / विज्ञापन की उगाही का काम जोर शोर से चला रहे है। विशेष बात यह है कि इन लोगों के अखबार विशेष समय पर प्रकाशित होता है जैसे 15 अगस्त 26 जनवरी दशहरा दिवाली पर यह लोग अखबार प्रकाशित कर उनमें विज्ञापन के जरिए लोगों से मोटी रकम कमाते है। वैसे साल भर इनके अखबार कहीं देखने को भी नहीं मिलते हैं। बिना अनुमति के अखबारों में विज्ञापन छापने के बाद जिलेभर की पंचायतों से वसूली करते घूमते हैं। यहां तक कि पंचायतों द्वारा पैसा नहीं दिए जाने पर सूचना के अधिकार के तहत आरटीआई लगाकर पंचायत कर्मियों को परेशान किया जाता है.

अब सोचने वाली बात यह है कि जिन लोगों के अखबार विशेष समय पर प्रकाशित होते हैं वह लोग साप्ताहिक अखबार का टाइटल लेकर अपने आप को पत्रकार बताते हैं और पोर्टल चलाने वाले लोगो के लिए अच्छी मानसिकता नही रखते।

*अखबारों को तो सरकार भी विज्ञापन के माध्यम से करती है भारी मदद*

 जैसा कि अखबारों को तो शासन के द्वारा भी विज्ञापन भारी मात्रा में मिलते रहते हैं जोकि काफी अच्छे दामों पर प्रकाशित किए जाते हैं पर क्या पोर्टल को संचालित करने के लिए शासन से इस प्रकार के विज्ञापन मिलते हैं क्या नहीं पोर्टल तो केवल जन्मदिन एवं बधाई के विज्ञापनों पर ही अपने पोर्टल का पालन पोषण कर रहे हैं क्योंकि पोर्टल को संचालित करने में वास्तव में खर्च कम आता है और इसी कारण पोर्टल संचालित करने वाले को किसी को परेशान करने की आवश्यकता नहीं पड़ती उसके बाद भी यदि पोर्टल संचालन करने वालों पर उंगलियां उठती है तो पहले उंगली उठाने वाले संस्थान वही उंगली अपनी और करके देखें उसके बाद किसी को भला बुरा कहे।

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