डॉ. गीता
_अपनी ताज़ा रिपोर्ट में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एंटीबायोटिक प्रतिरोध को कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर एक सहयोगात्मक रणनीतिक ढांचे का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस रणनीतिक ढांचे का उद्देश्य एंटीबायोटिक प्रतिरोध को कम करना और मानव, पशु और पौधों में एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करना है।_
1928 में ब्रिटिश विज्ञानी अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने पेनिसिलिन नामक पहले एंटीबायोटिक की खोज करके संक्रामक रोगों से लड़ने और उन पर काबू पाने का रास्ता दिखाया था।
आगे चलकर एंटीबायोटिक दवाएं संक्रामक रोगों के उपचार में रामबाण साबित हुईं। इन चमत्कारिक दवाइयों की खोज की बदौलत दुनिया के कई देशों के लोगों का औसत जीवन काल लगभग 60-65 वर्ष हो गया, साथ ही बैक्टीरिया की वजह से होने वाली कई बीमारियों का कारगर इलाज भी संभव हुआ।
इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद एक वास्तविकता यह सामने आ रही है कि ये जीवनरक्षक दवाएं अब तेजी से बेअसर हो रही हैं, जिसकी वजह से मानव जाति इस चमत्कारिक देन को गंवा देने के कगार पर खड़ी है।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, पिछले एक दशक के दौरान एंटीबायोटिक दवाओं का इतना दुरुपयोग और बेजा इस्तेमाल हुआ है कि अब यह वरदान से श्राप में तब्दील होता जा रहा है।
तमाम बैक्टीरिया तेजी से एंटीबायोटिक दवाइयों के प्रतिरोधी होते जा रहे हैं। डब्ल्यूएचओ ने इसे ‘एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस’ का नाम दिया है।
अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने 1945 में चेतावनी देते हुए कहा था कि ‘ऐसा वक्त भी आ सकता है, जब कोई भी व्यक्ति दुकान से पेनिसिलिन खरीद सकेगा।
इसमें खतरा यह होगा कि इंसान खुद को इसका अंडरडोज या ओवरडोज देगा। ऐसे में इसका सेवन बैक्टीरिया को इस दवा को लेकर प्रतिरोधी बना देगा, जिससे दवा का असर खत्म हो जाएगा।’ फ्लेमिंग की यह चिंता सही निकली।
भारत सहित पूरी दुनिया में एंटीबायोटिक दवाओं का इतना दुरुपयोग और बेजा इस्तेमाल हुआ है और अभी भी हो रहा है कि उनका प्रभाव खत्म हो रहा है।
आज स्थिति यह है कि बैक्टीरिया से लड़ने के लिए हम जितनी नई दवाएं खोजते हैं, म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) के ज़रिए उतनी ही तेज़ी से बैक्टीरिया की आनुवांशिक संरचना बदल जाती है और बैक्टीरिया उस एंटीबायोटिक के विरुद्ध प्रतिरोध कायम कर लेते हैं।
नए बैक्टीरिया जिन्हें आम बोलचाल की भाषा ‘सुपर बग्स’ कहा जाता है, उन पर एंटिबायोटिक दवाएं असर खो रहे हैं। ये सुपर बग मनुष्यों के लिए घातक बनते जा रहे हैं, एक से दूसरे में फैल रहे हैं और हमें पोस्ट एंटीबायोटिक युग में ले जाने के लिए आतुर हैं।
यह वह दौर होगा जब छोटी-छोटी बीमारियों से पहले की तरह लोग मरने लगेंगे और किसी धातु के खरोच या मामूली समझे जाने वाले संक्रमण भी मौत की वजह बन जाएंगे!
द लैंसेट जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक एंटीबायोटिक प्रतिरोध की वजह से 2019 में दुनियाभर में 12 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हुई। डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि 2050 तक एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस की वजह से दुनियाभर में एक करोड़ मौतें होंगी।
इसको रोकने के लिए डब्ल्यूएचओ के रणनीतिक ढांचे में अनुसंधान और विकास से लेकर निपटान तक की पूरी प्रक्रिया में एंटीबायोटिक के उत्पादन और उपयोग का अनुकूलन और मनुष्यों, जानवरों और पौधों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध के विकास और प्रसार को कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
[चेतना विकास मिशन)

