ग्रेटर नोएडा में निक्की दहेज हत्या मामला देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। उत्पीड़िता पर हो रही बहशियाना हिंसा का एक वीडियो सामने आया। महिला को बाल पकड़कर खींचा गया, उस पर ज्वलनशील तेल डाला गया और उसके 6 वर्षीय बेटे के सामने उसे ज़िंदा जलाया दिया गया। वह अर्धजली अवस्था में सीढ़ी से उतरते समय ढेर हो गयी। अस्पताल में वह मृत घोषित की जाती है। पर लोगों के दिमाग में कई सवाल हैं।फासीवाद मानव मस्तिष्क के भीतर छिपी गंदगी पर पलता है; फलता-फूलता है!” इसलिये 2014 के बाद के दौर को देखें, तो ऐसी घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है, इनको सामान्य बनाया जा रहा है, यहां तक कि समाज का एक हिस्सा इनपर जश्न मना रहा है! एक अध्ययन के अनुसार औरतों के भीतर भी इसकी प्रतिक्रिया दिख रही है और 2030 तक लगभग 45% महिलाएं अविवाहित रहना पसंद करेंगी। कोई आश्चर्य की बात नहीं! पर नारीवादियों को इन प्रश्नों का गहरा विश्लेषण करते हुए आंदोलन के ठोस मुद्दे तय करने होंगे। सबसे पहले, प्रशासन सहित न्यायालयों के उत्तरदायित्व व जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी और दक्षिणपंथ के विरुद्ध वैचारिक जंग छेड़नी होगी।
कुमुदिनी पति
7 साल बाद भी दहेज की मांग क्यों? निक्की के ब्यूटी पार्लर को बंद कराया गया और दोबारा खोलने के प्रस्ताव पर कहर क्यों बरपा, जबकि उसका पति घर पर निठल्ला बैठा था? पार्लर से पैसे ही आते जो वह अक्सर चुराता भी था। निक्की के पिता यह जानते हुए कि बेटी हिंसा की शिकार है, उसे बार-बार उसी घर में क्यों धकेल देते थे, और ससुराल के दहेज की मांग को क्यों पूरा करते रहे?
राजस्थान के जोधपुर जिले का मामला और भी वीभत्स है; यहां एक मां संजू अपनी 3-वर्षीय बेटी को गोदी में लेकर खुद को पेट्रोल डालकर आग लगा लेती है, जबकि वह एक स्कूल की अध्यापिका थी और पूरी तरह स्वावलम्बी थी। वह दहेज के लिये प्रताड़ना सहन नहीं कर सकी। पर क्या वह स्कूल से सीधे मायके नहीं जा सकती थी? निक्की और संजू विश्नोई दोनों ने कभी पुलिस में शिकायत नहीं दर्ज़ की….आखिर क्यों? दोनों को क्या अपनी काबिलियत और कानून पर ज़रा भी भरोसा नहीं था? या वे लोकलाज के चलते सब झेलती रहीं? अब अमरोहा की गुल्फिज़ा को दहेज के लिये तेज़ाब पिलाकर मार डाला गया। वह अस्पताल में 17 दिन जीवन के लिये संघर्ष कर दम तोड़ दी। फिर एक टेकी ने फांसी लगा ली दहेज प्रताड़ना के चलते। क्या आर्थिक स्वावलम्बन कोई मायने नहीं रखता।
इससे पहले राधिका यादव नाम की एक टेनिस खिलाड़ी की उसके पिता द्वारा घर में ही गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। वह एक एकैडमी चलाती थी, खेल को अपना कैरियर बनाना चाहती थी; शायद संगीत में रुचि होने के कारण रील बनाकर इन्स्टाग्राम पर पोस्ट करती थी और अपने तरीके से अपना जीवन जीना चाहती थी। पर 21वीं सदी में भी उसके पिता को उसका स्वतंत्र होकर जीना अच्छा न लगा। उनका कहना था कि पड़ोसी उनका मज़ाक बनाते हैं…कि वह अपनी बेटी के पैसों पर जी रहे थे। राधिका का इंस्टा अकाउंट बंद कर दिया गया था। आखिर लाखों खर्च करके बेटी को खिलाड़ी बनाने का सपना देख रहा पिता क्यों बेटी का हत्यारा बन गया? क्या वह उसकी हुनर का मालिक बना रहना चाहता था?
तीन मामलों में एक बात समान है, महिला अपने दम पर कुछ करना चाहती थी; वह आर्थिक रूप से स्वावलम्बी थी। वह अपने जीवन के फैसले खुद लेना चाहती थी। पर परिवार वालों को यह मंज़ूर नहीं था। वे इनको सोने के अंडे देने वाली मुर्गी के रूप में रखना तो चाहते थे, पर पिंजड़े में कैद!
एक साफ्टवेयर इंजीनियर, सोनम कहती हैं, “लड़कियां बहुत आगे बढ़ गयी हैं; वे सब कुछ कर रही हैं-ऐसे काम भी, जो मर्दों के माने जाते थे-और वे अव्वल आ रही हैं। पर लड़के अपनी पुरानी सोच को बदल नहीं पा रहे। अब बेटी या पत्नी बराबरी, आज़ादी और इज्ज़त चाहती है; वह किसी की पैर की जूती बनकर नहीं रह सकती। तो उस पर काबू करने के लिये हिंसा का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह परिपाटी युगों से चली आ रही है। बस रूप और क्रूरता बढ़ गयी है, क्योंकि औरतें डर नहीं रहीं”
और आगे देखिये….
गुजरात में वनासकांठा की एक 18-वर्षीय नीट क्वालिफाइड लड़की को उसके पिता और चाचा गला घोंटकर मार डालते हैं-इस डर से कि मेडिकल कालेज में पढ़ने के बाद वह अपनी मर्ज़ी से अपने प्रेमी से शादी कर लेगी, क्योंकि वह उसके साथ लिव-इन संबंध बना चुकी थी। पुलिस के अनुसार पिता और चाचा ने झूठी शान के लिये लड़की की हत्या की थी। इन सभी मामलों में देखा गया कि हत्यारों को अपने किये पर ज़रा भी पछतावा नहीं था। बल्कि वे अपने किये को सही ठहराने के लिये तर्क गढ़ रहे थे।
यह इसलिये भी संभव हो पाता है कि पितृसत्तात्मक समाज का एक बड़ा हिस्सा इन तर्कों को जायज़ समझता है, उनसे सहमत होता है! हमारी जाति-व्यवस्था में लड़की-लड़का बालिग भी हो जाएं, उन्हें अपने पसंद से शादी करने नहीं दिया जाता। परिवार और समुदाय की नाक का सवाल बन जाता है। और, यह हम 21वीं सदी में बात कर रहे हैं-कहीं जबरदस्ती विवाह है तो कहीं ऑनर किलिंग। तो अब छिट-पुट घटनाओं में औरत को पति की हत्या करने के अलावा कोई चारा ही नहीं समझ आता, भले ही वह गलत हो।
दूसरी ओर हमारा ऐसे मामलों से साबका पड़ता है, जहां महिला अधिक उम्र की होने के बावजूद, कम उम्र के युवक पितृसत्ता के दम्भ में उनसे बदला लेते हैं। उनका तरीका क्रूर है, और वे अपने किये पर गर्व महसूस करते हैं। ये घटनाएं पारंपरिक सामाजिक मूल्यों को भी धता बताती हैं…समाज के एक विकृत विकास की ओर इशारा करती हैं। मसलन, मध्य प्रदेश के भोपाल से एक ऐसी घटना सामने आती है, जहां एक छात्र अपनी पूर्व शिक्षिका को, जो उम्र में उससे 8 साल बड़ी थी, पेट्रोल डालकर जलाने का प्रयास करता है। बताया जाता है कि उसे टीचर से एकतरफा लगाव (obsession) हो गया था, और उसने एक बार उन पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, जिसके चलते उन्होंने छात्र को स्कूल से निकलवा दिया। उसने बदले में यह कार्यवाही की।
दूसरी ओर दिल्ली के हौज काजी इलाके में एक 39 वर्षीय युवक अपनी 65 वर्षीय मां को तथाकथित “पुराने समय के विवाहेतर सम्बंध” की सज़ा के रूप में दो बार बलात्कार का शिकार बनाता है। फिर फोकस हैदराबाद के उस पति पर शिफ्ट होता है, जिसने प्रेम विवाह के बावजूद अपनी 5 मांह की गर्भवती पत्नी का गला घोंटकर उसकी हत्या की, फिर हैक सा ब्लेड से बोटी बोटी काटकर कुछ अंग नदी में डाल दिया। महिला एक काल सेंटर में काम करती थी और पति को उस पर शक था, इसलिये जब उसने मायके जाने की बात कही, पति ने बवाल खड़ा कर दिया और उसकी हत्या कर दी।
आखिर पुरुष इतने असुरक्षाबोध से ग्रस्त क्यों हैं? इस खबर के बाद नज़र मैसुरु की एक और दर्दनाक घटना पर जा टिकती है…एक प्रेमी अपनी पहले से विवाहित प्रेमिका से एक लाज में झगड़ा करता है; वह उसके 80,000 रुपये लौटाने में आना-कानी करता है, जिस पर महिला आपत्ति जताती है। वह उसके मुंह में विस्फोटक ठूंसकर ट्रिगर दबाकर उसके चेहरे को क्षत-विक्षत कर देता है। महिला की तत्काल मौत हो जाती है। आखिर छोटी सी बात पर इतनी क्रूरता क्यों? इतनी घृणा कहां से आती है? यह पितृसत्तात्मक सोच की चरम अवस्था है-मिसोजिनी-औरत जात से घृणा। पुराने समय में औरतों को कुलटा या डायन कहकर जब जलाया जाता था, समाज का एक हिस्सा सहमति जताता और जश्न मनाता था। आज भी एक हिस्सा औरत पर दमन देखकर खुश है-“अच्छा हुआ, बहुत उड़ रही थी!”
इलाहाबाद के महिला अध्ययन केंद्र की पूर्व निर्देशक प्रो. सुमिता परमार कहती हैं कि ऐसी क्रूर व हिंसक कार्यवाही के लिये बहुत से कारण हैं- सबसे बड़ा तो यह की महिलायें स्वावलम्बी हो गयी हैं और उनको दबाना आसान नहीं है। पर पुरुष पितृसात्मक सोच से मुक्त नहीं हो पाए हैं। दूसरी बात यह कि उपभोक्तावाद (consumerism) बहुत बढ़ा है, सो दहेज की मांग भी बढ़ी है। सोशल मीडिया ने भी बहुत सारी समस्याएं पैदा कर दी हैं-खासकर ऐसे एक देश में जो विकास के मामले में संक्रमण (transition) के दौर से गुज़र रहा है। मसलन लड़कियों और लड़कों को डेटिंग ऐप और चैट रूम मिल गये हैं, पर हमारे देश में लड़कियां इनके संभावित दुरुपयोग से अधिक परिचित नहीं हैं। वीडियो लड़कियों को ब्लैकमेल करने के लिये बनाए जा रहे हैं। फिर, जाति-संप्रदाय के आधार पर ब्याह और दहेज की परम्परा आज भी जारी है। पूरी व्यवस्था पितृसत्तात्मक सोच पर चल रही है। तो ऐसे समाज में महिलाओं को बराबरी और इज्ज़त कैसे मिले?”
सुमिता जी की बात सही लगती है- साइबर स्टाकिंग से लेकर एआई से महिलाओं की अश्लील तस्वीर बनाने तक….कितना पतन हो रहा है आज के युवकों का। ऐसी घटनाएं सिलसिलेवार हो रहीं….थमने का नाम नहीं ले रही हैं, और हर घटना पहली से ज़्यादा वीभत्स व रोंगटे खड़ा कर देने वाली होती है। अगर आप बलात्कार की घटनाओं को देखेंगे, तो पश्चिम बंगाल के बाद ओडिशा सुर्खियों में है। क्या यह सब अकस्मात ही हो रहा है? या कि इसके पीछे कोई ऐसी सच्चाई है, जिसे हम समझ नहीं रहे।
कोलकाता के आरजी कार अस्पताल में क्रूर बलात्कार व हत्या का मामला आज भी न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है- कार्यस्थल पर यौन हिंसा निरोधक कानून बनने पर भी क्या एक अस्पताल में तक सुरक्षा की न्यूनतम व्यवस्था नहीं हो सकती? शायद सबसे सशक्त व लम्बे आंदोलन के बाद भी सर्वोच्च न्यायालय में सरकार ने जो कुछ माना था-कार्यस्थल पर शिकायत समितियों का निर्माण होगा, महिला शौचालय और रेस्टरूम बनेंगे, सीसीटीवी कैमरे लगेंगे, सुरक्षाकर्मियों की नियुक्ति होगी, अस्पतालों और कार्यस्थलों की नियमित चेकिंग होगी-उसका 10% तक लागू नहीं हुआ है!
और जहां तक मेडिकल कालेजों को अपने शिकंजे में कसकर रखने वाले नेक्सस की बात है-जिसे सिंडिकेट राज के रूप में जाना जाता है-उसका तो बाल भी बांका न हुआ। एक साल भी पूरा नहीं हुआ था कि साउथ कोलकाता लॉ कालेज से एक और सामूहिक बलात्कार की घटना सामने आई। यहां तो आरोपी सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद का नेता है और वारदात में कालेज सुरक्षा गार्ड तक शामिल पाए गये हैं। आरोपी छात्र मोनोज मिश्र की गुंडागर्दी की वजह से पहले भी कई छात्राएं कालेज छोड़ने पर मजबूर हुई थीं, पर कालेज प्रशासन तटस्थ रहा। पढ़ाई हो या काम-औरतों की असुरक्षा बनी रहती है। सरकार बेपरवाह ही नहीं है, अपराध का माहौल मुहैय्या कराती है।
इससे पहले उड़ीसा की एक युवती के साथ बालासोर के कालेज टीचर द्वारा लगातार यौन उत्पीड़न के बाद उसके द्वारा आत्मदाह की घटना सामने आयी थी…पता चला कि छात्रा ने कई बार शिकायत की थी, यहां तक कि आईसीसी में भी शिकायत दर्ज़ कराई, पर कोई कदम नहीं उठाया गया। बाद में बीजेडी द्वारा विरोध प्रदर्शन की खबरें आईं। राष्ट्रपति भी दौरा कीं। पर उसके बाद ही 3 और आत्मदाह की घटनाएं सामने आईं-जैसे कोई ट्रेंड शुरू हो गया हो। ऐसी घटनाएं अगर नार्मल बना दी जाएंगी तो महिलाएं कैसे पढ़ेंगी, कैसे बाहर निकलेंगी? “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” पर देश के मुखिया कुछ कहेंगे? गजपति ज़िले में 8 गरीब आदिवासी औरतों ने लम्बे समय से यौन अत्याचार करने वाले एक तांत्रिक को मार डाला, तो वे जेल में हैं। महिलाओं को कानून पर भरोसा नहीं रह गया है, पर उन्हें आत्मरक्षा के लिये सज़ा दी जा रही, क्यों?
2022 के आंकड़े ही चौंकाने वाले थे, पर सरकारों ने दिखाई बेरुखी
2022 के एनसीआरबी डाटा उठाकर देखें तो हम हतप्रभ रह जाते हैं। हमारे देश का विकास आखिर किस दिशा में हो रहा है? क्या 21वीं सदी में हम अपने आप को विश्वगुरू तो दूर, एक सभ्य-सुसंस्कृत देश कह सकते हैं? एक तरफ दावा किया जा रहा है कि अर्थव्यवस्था के मामले में भारत विश्व में चौथे स्थान पर पहुंच रहा है और जापान तक को पीछे छोड़ चुका है। दूसरी ओर एनसीआरबी 2022 के आंकड़े बोल रहे हैं कि हमारी बेटियां, बहनें, माताएं और दादी-नानियां तक इस देश में सुरक्षित नहीं हैं…चाहे वे घर पर रहती हों या बाहर काम करने जाती हों।
हालात इतने बुरे हैं कि अमेरिकी विदेश विभाग ने यौन उत्पीड़न का हवाला देते हुए भारत के लिए लेवल 2 यात्रा परामर्श फिर से जारी किया है—खासकर महिलाओं को अकेले यात्रा न करने की चेतावनी दी है। क्या भारत सरकार को इस बात का इल्म है कि बाहर उसकी छवि तार-तार हो गयी है। यही नहीं, दूसरे देशों में भी भारतीय पुरुषों की छवि अच्छी नहीं है-विदेशी महिलाओं को घूरने, उन पर भद्दे कमेंट करने या उनका पीछा करने की अनगिनत रिपोर्टें आती हैं।
2022 में भारत में महिलाओं पर 4.45 लाख अपराध की घटनाएं दर्ज़ हुईं, यानि हर घंटे 51 घटनाएं, या प्रति 72 सेकेंड एक अपराध की घटना! जहां तक दहेज प्रताड़ना की बात है, शायद हम समझ ही नहीं रहे की हमारे पितृसत्तात्मक ताने-बाने के कारण ये घटनाएं बहुत कम रिपोर्ट की जाती हैं…या तब तक नहीं जब तक डोली में सजकर ससुराल गयी लड़की की ‘अर्थी’ उसके ससुराल से नहीं निकलती…पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है….कुछ करने को नहीं रहता।
इसलिये 2022 में 6,516 दहेज हत्याओं का आंकड़ा अंडर रिपोर्टिंग ही है। जहां तक बलात्कार के आंकड़ों की बात है तो ये दहेज उत्पीड़न से कई गुना कम बताए जाते हैं। पर साल 2022 में औसतन हर दिन रेप के करीब 87 मामले दर्ज किए गए। इस साल 31,516 बलात्कार – 3,288 बलात्कार के प्रयास और 83,344 मामले महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से किए गए हमले के बतौर दर्ज किए गए। 248 रेप या गैंगरेप के साथ हत्या की घटनाएं भी दर्ज़ हुईं, पर कितने ही ऐसे मामले भी होंगे जिनके बारे में रिपोर्ट नहीं किया गया होगा, क्योंकि हमारे देश में उत्पीड़ित महिलाओं को ही दोषी ठहराया जाता है और बात-बात पर समुदाय की नाक कट जाती है!
LGBTQ+ पर हिंसा की घटनाओं की रिपोर्टें बहुत कम
आंकड़े बताते हैं कि भारत में LGBTQ+ समुदाय पर मौखिक, शारीरिक तथा यौन हिंसा का काफी उच्च दर है, तथा शहरी क्षेत्रों में समलैंगिक व उभयलिंगी पुरुषों जैसे विशिष्ट जनसांख्यिकी समूहों को भयानक यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। इस मुद्दे को संबोधित करने के कुछ प्रयास सामने आ रहे हैं, जिनमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम 2019 और धारा 377 को अपराधमुक्त करना शामिल है, लेकिन हिंसा के संपूर्ण दायरे का अभी तक पूरी तरह से अध्ययन नहीं किया गया है। सरकार ने पुरानी आपराधिक न्याय प्रणाली को एक नए कोड, भारतीय न्याय संहिता से बदल दिया है, जिसमें ट्रांस समुदाय को यौन हिंसा से बचाने के लिए कानूनी सुरक्षा उपायों को हटा दिया गया है।
क्यों इतने कानून बनने के बाद भी स्थिति बद से बदतर होती गयी?
हमें आज समझने की ज़रूरत है कि महिलाओं व LGBTQ+ समुदाय पर हिंसा की घटनाएं आकस्मिक नहीं है। इनके पीछे एक पैटर्न दिखता है, एक विचार है, एक लम्बी पृष्टभूमि भी है। और आज के दौर को अगर देखा जाए, तो एक खास किस्म का राजनीतिक व विचार्धारात्मक महौल भी है, जो ऐसी हिंसा के कृत्यों को वैधता प्रदान करता है और अपराधी दोषमुक्त हो जाते हैं या महिमामंडित किये जाते हैं…फेहरिस्त लम्बी है….स्वामी चिन्मयानंद, आसाराम बापू से लेकर गुरमीत राम रहीम, बृजभूषण शरण सिंह से लेकर कुल्दीप सिंह सेंगर, येडियुरप्पा और प्रज्वल रेवन्ना तक, बिलकिस बानो के अपराधियों से लेकर जस्टिस गोगोई तक -हम कह सकते हैं कि एक ऐसा पैटर्न बन गया है कि बड़ा हो या छोटा, कोई अछूता नहीं है।
वामपंथ का इकलौते गढ़ केरल तक में हेमा कमेटी बनने के बावजूद उसकी रिपोर्ट को 7 बरस तक दबाकर रखा गया, क्योंकि नामचीन प्रोड्यूसर, निर्देशक और एक्टर घेरे में आ गये थे। महिला की तौहीन, उसपर हिंसा, उसका यौन उत्पीड़न, उसका बलात्कार व बरबर हत्या हमारे देश की नयी संस्कृति बन गयी है। इस दिशा में हमारा ‘विकास’ भयावह है! और सरकारों की बात करें तो हमाम में सब नंगे हैं! क्यों कोइ राज्य एक मॉडल स्थापित नहीं करता?
औरत पर ज़ुल्म, पर औरत ही दोषी
औरत पर हिंसा अक्सर लोगों को या तो आम बात, यानि नार्मल लगती है, या फिर औरत की ही गलती मालूम पड़ती है।।।वह गलत समय पर बाहर निकली होगी, वह छोटे कपड़े पहनी होगी, वह गलत जगह अकेली बैठी-लेटी होगी, उसने रात के समय स्कूटर या कैब की सवारी की होगी, वह अकेले किसी फ्लैट में रहती होगी, वह मर्दों के साथ बैठकर सिगरेट या शराब पीती होगी इत्यादि। कोई यह नहीं बताएगा कि दुधमुही बच्चियों और बूढ़ी पर्दानशीं औरतें क्यों शिकार बनती हैं।
और, आपने कम ही सुना होगा कि यह चर्चा का विषय बना हो कि कैसे कोई कानून बनाने वाला, कद्दावर नेता, नामचीन पत्रकार, महान धर्मगुरू, पुलिस या सेना का अफसर, मंदिर का पुजारी, स्कूल का प्रिंसिपल या अध्यापक…यहां तक कि बेटी का पिता बलात्कारी बन गया। शायद मान लिया गया है कि यौन अपराध पुरुष के स्वभाव में ही निहित है…उसका विशेषाधिकार है! इसलिये अच्छे आचरण सम्बंधी सारी हिदायत लड़कियों और महिलाओं को दी जाती है। बचना उनकी ज़िम्मेदारी है; वरना खत्म हो जाना उनकी नियति है।
यौन हिंसा क्यों बढ़ रही है?
टीवी मीडियाकर्मी रूमा पाल का कहना है कि “पूरे माहौल में एक किस्म की नकारात्मकता है-एक दूसरे के प्रति घृणा, ईर्षा, नकारात्मक प्रतिस्पर्धा, अवसाद…यह पूंजीवाद की देन हैं…और इसे इंटरनेट ने कई गुना बढ़ा दिया है। सोशल मीडिया में घटिया कमेंट्स (ट्रोलिंग) पढ़ने को मिलते हैं। मीडिया भी मामलों को सनसनीखेज़ बनाकर टीआरपी बढ़ाती है; हिंसा तो बढ़ेगी ही!” दूसरी ओर सामाजिक कार्यकर्ता और अध्यापिका पद्मा सिंह का मानना है कि लोगों की मानसिकता सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक माहौल से प्रभावित होती है। कहीं-न-कहीं आर्थिक विपन्नता और विषमता, बेरोज़गारी, जीवन का कष्टकारी होता जाना, शिक्षा का स्तर गिरता जाना, जाति व सम्प्रदाय के आधार पर विद्वेष और उपभोक्तावाद, -इन सब की वजह से लोगों में जो गुस्सा भरता है और हताशा जन्म लेती है, वह उन्हें हिंसक बनाती है; और यह हिंसा कमज़ोर पर टार्गेट की जाती है।”
पर क्या हम इस बात को नज़रंदाज़ कर सकते हैं कि अपराध न घटने का एक कारण हमारे देश में कन्विक्शन रेट बहुत कम होना है-केवल 27%। अपराधी इसलिये भी बरी हो जाते हैं कि जांच प्रक्रिया पहले से ही बेहद लचर होती है।।।अक्सर तो साक्ष्य नष्ट कर दिये जाते हैं या उनसे छेड़-छाड़ की जाती है, जैसा कि हमने सिंगूर की तापसी मल्लिक या आरजी कार अस्पताल केस में देखा; या फिर शासन तंत्र द्वारा ऊपर से दबाव बनाया जाता है कि अपराधी को दोषमुक्त कर दिया जाये, जैसा कि बिलकिस बानो के मामले में या हाथरस केस में देखा गया था। कई बार क्योंकि अपराधी जाना-माना धार्मिक गुरू है और उसके लाखों भक्त होते हैं, जो बड़े वोट बैंक में तब्दील हो सकते हैं, उन्हें हिरासत से छुट्टी मिल जाती है अथवा वे अग्रिम जमानत या पेरोल पर छूट जाते हैं।
अब लाशों (महिलाओं व नाबालिगों की) को दफनाने के कई विवादास्पद मामले कर्नाटक के धर्मस्थल मंदिर में सामने आए थे, जिसके बारे में एक सफाई कर्मी ने खुलासा किया; पर उसकी गिरफ्तारी के बाद पूरा मामला पलट गया है- सत्र न्यायालय ने आदेश दिया है कि मंदिर सम्बंधित समस्त आपत्तिजनक सामग्री को तत्काल हटाया जाए। क्या सच है, पता चलना मुश्किल है, क्योंकि मंदिर का राज्य में भारी दबदबा है, और पक्ष-विपक्ष मंदिर की बदनामी को लेकर जितने चिंतित हैं, उतने शायद महिलाओं के यौन उत्पीड़न को लेकर नहीं। क्या हड्डियों को ह्टा दिया गया है? क्या मंदिर प्रांगण से गायब हुई लड़कियों और महिलाओं की गुमशुदगी की रिपोर्टें कभी लिखी गयीं? यदि नहीं तो निश्चित मामला दबा दिया जायेगा।
प्रख्यात चित्रकार और समीक्षक अशोक भौमिक के अनुसार, हमारे देश में जिन मिथकों को धर्मग्रंथों में शामिल किया गया, वे अधिकतर पुरुषप्रधान हैं-“आज जब किसी औरत के शव को बोटी-बोटी काट दिया जाता है, हम क्यों चौकते हैं? इसका मेल सती के शरीर को भगवान विष्णु द्वारा 51 टुकड़े करने में मिलता है….और हम इन्हीं शक्तिपीठों को पूजते हैं…इसमें हमें कुछ गलत नहीं लगता। फिर गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी को श्राप देकर पत्थर में तब्दील कर दिया था, जबकि अहिल्या का कोई दोष न था। उसे श्राप से मुक्त होने के लिये श्रीराम की प्रतीक्षा करनी पड़ी, जिनके पैर से छुलाकर वह जीवित हुईं। अहिल्या की कहानी शुरू से अंत तक पुरुष प्रधानता की कथा है। ये सारी बातें हर त्योहार में पुनर्स्थापित होती हैं, नवीनीकृत होती हैं, तो हमारे मानस में रच-बस गयी हैं।”
धर्म के अलावा आधुनिक समाज औरत को उपभोक्ता सामग्री बना रहा है। हर कुछ औरत के जिस्म के सहारे बेचा जा रहा है, वह पॉर्न हो, फिल्म हो, उपभोक्ता सामग्री हो या धार्मिक पाखंड। और इसको सत्ता चलाने वाले प्रश्रय दे रहे हैं, राजस्व कमा रहे हैं। दूसरी ओर न्यायालय गैरजिम्मेदाराना संवेदनहीन, महिला-विरोधी फैसले सुना रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार जलेश्वर का कहना है कि “फासीवाद के उदय व विकास के साथ समाज में ऐसी विकृतियां सामान्य हो जाती हैं। ये एक “मास साइकोलाजी” के रूप में अभिव्यक्त होती हैं….और बर्बरता, क्रूर यौन हिंसा, भीड़ हिंसा इसके रूप हैं।
फासीवाद मानव मस्तिष्क के भीतर छिपी गंदगी पर पलता है; फलता-फूलता है!” इसलिये 2014 के बाद के दौर को देखें, तो ऐसी घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है, इनको सामान्य बनाया जा रहा है, यहां तक कि समाज का एक हिस्सा इनपर जश्न मना रहा है! एक अध्ययन के अनुसार औरतों के भीतर भी इसकी प्रतिक्रिया दिख रही है और 2030 तक लगभग 45% महिलाएं अविवाहित रहना पसंद करेंगी। कोई आश्चर्य की बात नहीं! पर नारीवादियों को इन प्रश्नों का गहरा विश्लेषण करते हुए आंदोलन के ठोस मुद्दे तय करने होंगे। सबसे पहले, प्रशासन सहित न्यायालयों के उत्तरदायित्व व जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी और दक्षिणपंथ के विरुद्ध वैचारिक जंग छेड़नी होगी।

