सुसंस्कृति परिहार
पिछले दिनों एक बहुत ही महत्वपूर्ण ख़बर से दो-चार हुई जब पता चला कि इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति महोदया संगीता श्रीवास्तव जी को सुबह पांच बजे होने वाली अज़ान से नींद में खल़ल पड़ता है वे सो नहीं पातीं और दिन भर सिर दर्द से परेशान रहती हैं ।जिसकी शिकायत उन्होंने जिला मजिस्ट्रेट के साथ ही और कई जगह की है। मुझे माननीय की नींद के बारे में सिर्फ एक बात जाननी है कि वे पांच के बाद सोती ही क्यों हैं वह अजान तो आम लोगों के लिए अलार्म का काम करती है कुछलोग इसे सुनकर तफरी करने निकल जाते हैं कुछ योगासन करने बैठ जाते हैं ,कुछ पढ़ने बैठ जाते हैं ।अधिकांश महिलाएं अपने दैनंदिन कामों में जुट जाती हैं।नलों में पानी आ जाता है,दूध और अख़बार वाला भी दस्तक देने आ जाता है।फिर कैसी नींद ,वे तो अजान का शुक्रिया अदा करते हैं ।रही बात माईक से अजान की वह गलत है पर मंदिरों, आदि में होने वाला जयकारा और प्रार्थनाओं ,भजनों हेतु लगे माइकों पर भी अंकुश की बात होनी चाहिए ।अजान का वक्त तो लगभग निर्धारित होता है पर अन्य पूजा स्थलों में किसी भी समय कार्यक्रम होने लगते है। शोरगुल कोई भी हो बंद होना चाहिए। मुझे लगता है-
तुम्हें नींद नहीं आती तो कोई और वजह होगी
अब हर ऐब के लिए कसूरवार अजान तो नहीं ।इधर,डी एम से आपकी शिकायत करने को लेकर उलमा ने सख्त नराजगी जाहिर की है। इस्लामिक सेंटर ऑफ इंडिया के अध्यक्ष एवं ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा कि कुलपति के इस कदम का कोई मतलब नहीं है क्योंकि हाईकोर्ट का लाउडस्पीकरों को लेकर जारी आदेश का पहले से ही सब जगह अमल हो रहा है लिहाजा जनता को बेमतलब बातों में न उलझाएं। वहीं नींद में अजान से खलल पड़ती है। इसको लेकर भारतीय सुहेलदेव समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रदेश अध्यक्ष सुनील अर्कवंशी ने कुलपति को नसीहत देते हुए कहा कि वह देश में नफरत का बीज न बोयें और माफी मांगें। उन्होंने कहा कि कुलपति का यह बयान कुंठित मानसिकता को दर्शाता है। भारत सभी धर्मों का देश है। हमें आजादी है, अपने धर्म के तौर तरीके से रहने की। इसका अधिकार हमें हमारा संविधान भी देता है। इसलिए सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी मांग करती है कि इसके लिए कुलपति प्रो संगीता श्रीवास्तव महोदया माफी मांगे । हालांकि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 6 मई 2020 में मस्जिद से अजान मामले में एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा था कि लाउड स्पीकर से अजान देना इस्लाम का धार्मिक भाग नहीं है. तबसे यह कुछ नियमों के तहत ही उपयोग हो रहे हैं। पत्र में कुलपति महोदया नेआगे कहा है कि एक पुरानी कहावत, ‘आपकी स्वतंत्रता वहीं खत्म हो जाती है जहां से मेरी नाक शुरू होती है’, यहां बिल्कुल सटीक बैठती है। उन्होने पत्र में यह भी स्पष्ट किया है कि वह किसी सम्प्रदाय, जाति या वर्ग के खिलाफ नहीं हैं। वह अपनी अजान लाउडस्पीकर के बगैर कर सकते हैं जिससे दूसरों की दिनचर्या प्रभावित न हो। आगे ईद से पहले सहरी की घोषणा भी सुबह चार बजे होगी। यह भी उनके और दूसरों की परेशानी की वजह बनेगा।ये सब चिंताए उनकी सीधे उसी विचारधारा से उन्हें जोड़ रहीं हैं जो कुलपति जैसे पद पर शोभा नहीं देता हां ये बात और है आप किसी खास वाद से प्रभावित हों और इस बहाने कहीं और अपना उज्जवल भविष्य तलाश रहीं हों ।नींद में ख़लल एक बहाना हो ।सोने वाले लोग तो धड़धड़ाती रेल,भीषण सड़कों पर शोर और कारखानों के कोहराम के बीच भी सो लेते हैं ।

