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पक्का गिरगिट है नीतीश कुमार  

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 सुसंस्कृति परिहार

बिहार के रामविलास पासवान की कमी बहुत दिनों से खल रही थी इसकी पूर्ति सत्ता लोलुप नीतीश ने कर दी बधाई। हमेशा जेडीयू सत्ता के पूर्णांक से दूर रही है पर जुगाड़मेंट में उनसा माहिर कोई दूसरा नज़र नहीं आता।इसके साथ ही झूठ के पायदान पर वह  दो नंबरी है।पहले नंबर वाले को तो दुनिया जानती ही है।

उधर भाजपा का चाल चरित्र और चेहरा किसी से छुपा नहीं है। चुनाव जब करीब आते हैं तो वह बड़े बड़ों को अपने जाल में ऐसा फंसाता है कि उसे भागते भूत की लंगोटी ही अच्छी लगती है।ये कायर और निडर लोग हैं जिनका अपना ज़मीर नहीं होता । ख़ैर यह अच्छा ही हुआ।चाचा भतीजा का खेल ख़त्म हुआ। जैसे मध्यप्रदेश में मामा का। मध्यप्रदेश में तो महराज ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसी पार्टी कहीं नहीं मारी गई।वे मुख्यमंत्री का ख़्वाब पाले ही रह गए।आज शिवराज मामा के साथ उल्टी सांसें ले रहे हैं।

समझा जा सकता है भाजपा के साथ मुख्यमंत्री बनकर नीतीश कुमार के भविष्य का भुर्ता बनने वाला है। लोकसभा चुनाव में काम निकल जाने के बाद संघ का कोई युवा बिहार का मुख्यमंत्री बन जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।हम सभी जानते हैं कि जब से इंडिया गठबंधन बना है तबसे नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनने की पूरी तैयारी में लगे रहे। उन्हें संयोजक पद का आफर दिया गया उन्होंने मना कर दिया शायद उनको भाजपा से आने है वाले संकट से अवगत करा दिया गया होगा। इसलिए उन्होंने इसे ठुकराया तब सर्वसम्मति से खड़गे जी संयोजक नियुक्त हुए।

वैसे भी नितीश का इतिहास गिरगिट रहा है बिहार की राजनीति पिछले 3 दशक से अधिक समय से नीतीश कुमारऔर लालू यादव  के ही इर्द गिर्द घूमती रही है. दोनों ही नेताओं की 1974 के बिहार छात्र आंदोलन के दौरान राजनीति में एंट्री हुई थी. लालू प्रसाद 1977 में ही सांसद बन गए थे लेकिन नीतीश कुमार को विधायक बनने के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ा था और वो 1985 में पहली बार विधायक बने थे. हालांकि नीतीश कुमार की बिहार की राजनीति में अच्छी पकड़ रही थी. ऐसा माना जाता है कि 1990 में जब लालू प्रसाद पहली बार सीएम बने थे उस दौरान नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद को सीएम बनने में मदद की थी. हालांकि बाद के दिनों में दोनों के रिश्ते बनते बिगड़ते रहे हैं. कई दफा दोनों नेता एक दूसरे को अपना भाई भी बता चनीतीश कुमार की मदद से लालू प्रसाद ने राम सुंदर दास को पछाड़ कर पहली बार 1990 में मुख्यमंत्री का पद हासिल किया था. हालांकि बाद के दिनों में दोनों के रिश्ते खराब होते चले गए. नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए पटना के गांधी मैदान में ‘कुर्मी अधिकार रैली’ का आयोजन 1994 में किया था और उसके कुछ दिनों के बाद वो तत्कालिन जनता दल से अलग हो गए थे.  साल 1994 में ही नीतीश कुमार ने समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस, ललन सिंह के साथ मिलकर समता पार्टी का गठन किया था. 1995 के चुनाव में उन्होंने वामदलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें अच्छी सफलता नहीं मिली. इसके बाद उन्होंने सीपीआई से गठबंधन तोड़ कर एनडीए से हाथ मिला लिया.

1996 के लोकसभा चुनाव से कुछ पहले नीतीश एनडीए का हिस्सा बन गए और भाजपा के साथ उनका यह रिश्ता 2010 के विधानसभा चुनाव तक चलता रहा. इस चुनाव में एनडीए को बड़ी जीत मिली थी. साल 2012 में बीजेपी में नरेंद्र मोदी के कद बढ़ने के बाद नीतीश कुमार एनडीए में असहज होने लगे और 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अकेले चुनाव लड़ने के ऐलान कर दिया. लोकसभा चुनाव में जदयू को महज 2 सीटों पर जीत मिली जिसके बाद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद भी छोड़ दिया. बाद में लालू प्रसाद के मिलकर उन्होंने महागठबंधन बनाया और 2015 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सीएम बने. विधानसभा चुनाव में इस गठबंधन को बड़ी सफलता मिली।

इसके करीब ढाई साल बाद साल 2017 में नीतीश कुमार ने फिर से चौंकाया. अब उन्हें महागठबंधन में ही खामी दिखने लगी. डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव का IRCTC घोटाले में नाम आया, जिसके बाद नीतीश कुमार ‘अंतरआत्मा’ की आवाज सुनते हुए महागठबंधन खत्म कर दिया और सीएम पद से इस्तीफा दे दिया. इस्तीफा देने के तुरंत बाद वो बीजेपी में शामिल हो गए और गठबंधन करके सरकार बना ली।

इसके बाद 2020 में बिहार में विधानसभा चुनाव हुए। नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और जीत भी हासिल की। इस चुनाव में नीतीश की पार्टी जेडीयू को सिर्फ 43 सीटें हासिल हुईं। भाजपा को 74 और आरजेडी को 75 सीटें हासिल हुईं, लेकिन इन सबके बावजूद मुख्यमंत्री के सिंहासन पर नीतीश कुमार ही विराजमान हुए।

वे अब तक आठ बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। फिर बदलाव के बाद वे नवमी बार शपथ लेंगे।उनका इस्तेमाल आरजेडी के उभरते नेता तेजस्वी को रोकने में इस्तेमाल होगा साथ ही साथ लोकसभा चुनाव में भाजपा समर्थित मुख्यमंत्री बड़ा मददगार हो सकेगा।यह सियासी चालबाजियां हैं। शिवराज सिंह और वसुंधरा राजे का उदाहरण सामने है।जीत के बाद आक थू करना वे भली-भांति जानते हैं। नीतीश का भविष्य भी सांप छछूंदर की गति को प्राप्त होता नज़र आ रहा है बाकी बिहार के मतदाता जानें।

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