आलोक कुमार
नीतीश कुमार पिछले दिनों तमतमा गए। पत्रकारों ने उनसे पूछा कि बख्तियारपुर का नाम बदलने की मांग हो रही है। इस पर उनका क्या कहना है। भड़के नीतीश ने कहा, हम जहां जन्मे हैं उहरे का नाम बदलेगा, बिना मतलब की बात करते हैं। फालतू बात है। फिर कुछ दिनों बाद उनकी पार्टी जनता दल (यूनाईटेड) के नए नवेले राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह की बारी थी। उनसे पत्रकारों ने उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ के बाबाजान वाले बयान पर प्रतिक्रिया ली। उन्होंने भर्त्सना तो नहीं की लेकिन असहमति ऐसे जताई – किसी भी राजनीतिक दल के नेता को संयमित भाषा में अपनी बात रखनी चाहिए। देश सबका है। हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, ये सभी का है। ऐसी कोई बात नहीं बोलनी चाहिए जिससे देश को नुकसान हो।
दरअसल उत्तर प्रदेश में चुनाव है। बिहार में पार्टी कमजोर है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) हावी होती जा रही है। इसलिए सेक्युलर दिखाने का टाइम है। नीतीश कुमार ने नया-नया ताज दिया है तो ललन सिंह जेडीयू विस्तार करने चले हैं। अगस्त में ही उन्होंने साफ कर दिया कि अगर बीजेपी ने सम्मानजनक सीटें नहीं दी तो उनकी पार्टी अकेले चुनाव लडे़गी। वो बिहार में मिले सम्मान के नतीजे को भूल गए। सीट शेयरिंग में 122 सीटें मिली। सात जीतन राम मांझी को दी। 115 पर लड़े और 72 सीटों पर हार गए। बीजेपी इतनी ही पर लड़ी और 74 सीटें जीत गई। बीजेपी के प्यार-दुलार से चिराग पासवान ने नीतीश की तीन नंबर पर समेट दिया।
अब एक नंबर पर आना है। ऐसा होगा या नहीं कह नहीं सकते। नीतीश कुमार लास्ट इनिंग का लस्ट कैसे छोड़ सकते हैं। सीएम बनने के बाद पहली कोशिश तो बिना चुनाव के ही टैली बढ़ाने की थी। 46 तक चला भी गया लेकिन दो विधायकों के असामयिक निधन से फिर 44 पर हैं। सम्मान की लड़ाई में सिद्धांत को आगे रखा जा रहा है। यूपी में चुनाव है। अभी धर्मनिरपेक्ष होने का सीजन चल रहा है। इसी बहाने बिहार के मुसलमान भी कहीं साथ आ जाएं। खिसके वोट बैंक में ये 17 परसेंट से आस तो है ही। जब असदुद्दीन ओवैसी हैदराबाद से आकर बिहार की पांच सीटें पा सकते हैं तो सेक्युलर नीतीश पुरानी छवि हासिल क्यों नहीं कर सकते। 2020 में 15.3 परसेंट वोट जेडीयू को मिले। 2015 में 16.8, 2010 में 22.5 और 2005 में 20.4 परसेंट वोट मिले थे। ये गिरवाट 2010 से ही जारी है। 2015 तो लालू के साथ लड़ कर जीते।
बेतुका दावा
जेडीयू का दावा है कि बिहार से सटी 20 से ज्यादा सीटों पर कुर्मी, भूमिहार वोट उनकी पार्टी को मिल सकता है। अगर नीतीश को लगता है कि ललन सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने से भूमिहार वोट मिलेगा तो वहम है। सिपहसालार आरसीपी सिंह को मंत्री बनाने से यूपी में कुर्मी वोट मिलेगा तो भी वहम है। अनुप्रिया पटेल पंकज चौधरी ही बीजेपी के लिए ये काम करेंगे। यूपी के मुसलमान नीतीश कुमार को वोट क्यों करेंगे ?
नीतीश कुमार क्राइम, करप्शन और सेक्युलरिज्म तीनों से समझौता नहीं करने की कसम खाते रहे हैं। क्राइम और करप्शन से समझौते का लेवल तो बिहार के अखबार हर सुबह बता रहे।
सेक्युलरिज्म सीजनल है। उदाहरण ले लीजिए। पांच अगस्त, 2019 को धारा 370 खत्म करने का कानून पास हो गया। राज्यसभा में जेडीयू ने इसके विरोध में वॉकआउट किया। सात अगस्त को राज्यसभा में पार्टी के नेता ने समर्थन दे दिया। जवाब था अब तो कानून बन गया और देश में बने कानून का सम्मान होना चाहिए। बात में पंच भी फील नहीं हो रहा था। नीतीश कुमार ने बेइज्जत भले किया हो पर जॉर्ज फर्नांडिंस का हवाला देकर कह चुके थे – हमारे नेता स्वर्गीय जॉर्ज साहब जब एनडीए के कनवीनर थे तभी से हम राम मंदिर, धारा 370 और समान आचार संहिता के खिलाफ थे।
इत्तेफाक ऐसा रहा कि जुलाई से नवंबर के बीच अदालत और संसद के सहारे तीन तलाक कानून भी बन गया। राम मंदिर का रास्ता प्रशस्त हुआ और 370 भी इतिहास बन गया। पर नीतीश टस से मस नहीं हुए। सेक्युलर बने रहे और एक साल बाद ही बीजेपी के साथ चुनाव लड़ कर अपनी ही पार्टी को 15 साल के सबसे बुरे हाल में पहुंचा दिया।
खिलजी से बदला ले रहे नीतीश ?
इसलिए जब बीजेपी विधायक हरिभूषण ठाकुर ने बख्तियारपुर का नाम बदलने की मांग की तो नीतीश को जन्मस्थान की याद आ गई। उन्होंने अपना नैरेटिव दिया। वो संसदीय समिति के किसी सदस्य के हवाले से अपना गुणगान कर बैठे। कहते हैं – वहां तो चर्चा हुई कि एक बख्तियार था जो वहां से नालंदा जाकर विध्वंस किया और अब एक उसी बख्तियारपुर का है जो वहां फिर से बना रहा है। दरअसल वो नालंदा यूनिवर्सिटी की बात करते -करते जता गए कि बख्तियार खिलजी का बदला नीतीश कुमार ले रहे हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल, डिप्टी सीएम तारकेश्वर प्रसाद और पार्टी के कई नेताओं ने नीतीश कुमार को आईना दिखाया था। कटिहार और गोपालगंज में दलित बस्तियों पर मुसलमानों के हमले पर नीतीश को घेरने की कोशिश की गई।
बीजेपी से घिरे नीतीश इसलिए सेक्युलर हो रहे हैं। इतने कि जब कैबिनेट बना रहे थे तो बसपा के टिकट पर जीते जमा खान को मंत्री बना दिया। तर्क ये था कि बिहार में अल्पसंख्यक विभाग कौन संभालेगा? हालांकि देश में सिर्फ मुसलमान हीं अल्पसंख्यक नहीं हैं। पर सेक्युलर कहलाने के लिए ऐसा करना जरूरी है। नीतीश ने ही पहली बार सीएम बनने पर 2006 में सामाजिक अधिकारिता मंत्रालय से हटाकर अलग अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय बनाया। नीतीश से छिटके मुसलमानों को ये नीतीश का तोहफा था। अब ओबीसी पर जो पकड़ बीजेपी ने बनाई है उसमें लव-कुश ही साथ रहें तो नीतीश के लिए बड़ी बात होगी। इसलिए भी सेक्युलर होना सीजन की जरूरत है।

