शिवानन्द तिवारी,
पूर्व सांसद
आज की अख़बारी ख़बरों के मुताबिक़ नीतीश जी ने अपने पदाधिकारियों को भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सख़्त क़दम उठाने का निर्देश दिया है. विधान सभा का चुनाव सर पर है . लगता है कि नीतीश जी को यह भनक मिल गई है कि सरकारी तंत्र में भयंकर भ्रष्टाचार से लोग त्रस्त हैं. ग़ुस्से में हैं. इसलिए बिहार की जनता के ग़ुस्से को ठंडा करने के मकसद से नीतीश जी ने बिहार की जनता को संदेश देने का प्रयास किया है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए वे बहुत गंभीर हैं. लेकिन बिहार के लोग नीतीश जी की बात पर यकीन कैसे और क्यों करें ! विगत बीस वर्षों से नीतीश जी बिहार में अपनी सरकार चला रहे हैं. यह भी देश में एक रिकार्ड है. अगर नीतीश जी के कार्यकाल का विश्लेषण किया जाए तो उनके पहले कार्यकाल को स्वर्णिम काल कहा जा सकता है. लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया वे जनता से दूर होते गए और प्रशासनिक तंत्र पर उनकी निर्भरता बढ़ती गई. आज तो यह कहना मुश्किल है कि प्रशासनिक तंत्र नीतीश जी के अधीन है या वे इस तंत्र के अधीन हैं. जैसे जैसे समय बीतता गया धीरे-धीरे वे जनता से कटने लगे. पार्टी के कार्यकर्ताओं से भी दूर होते गए. कार्यकर्ताओं द्वारा दी जाने वाली ज़मीनी हक़ीक़त की ख़बरों से ज़्यादा प्रशासन तंत्र पर उनकी निर्भरता बढ़ती गई. पार्टी के वरिय कार्यकर्ताओं ने, जब भी उनको मौक़ा मिला तब उन्होंने नीतीश जी को सचेत करने का प्रयास किया . लेकिन वे सचेत नहीं हुए.
बहुत पुरानी बात है. जब नीतीश जी के साथ हम लोग युवा राजनीति में सक्रिय थे. जनता पार्टी की युवा शाखा युवा जनता से अलग होकर हमलोगों ने छात्र युवा संघर्ष समिति बनाई थी. उसके एक सम्मेलन में हमलोगों के नेता किशन पटनायक ने एक संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी. उन्होंने कहा था कि जब भी कोई राजनीतिक व्यक्ति जनता की समस्याओं के लिए जद्दोजहद करते हुए शासन में बैठता है तो वही समय होता है जब जनता के हक में वह कोई बड़ा कदम उठा सकता है. लेकिन जैसे जैसे उसकी सत्ता पुरानी होती जाती है वैसे वैसे प्रशासनिक तंत्र पर उसकी निर्भरता बढ़ती जाती है. इस सिलसिले में लेनिन और स्टालिन का उदाहरण दिया था. उन्होंने कहा था कि ‘लेनिन की कुर्सी नई थी तो वह क्रांतिकारी था. लेकिन स्टालिन की कुर्सी पुरानी थी तो वह नौकर शाह बन गया.
नीतीश जी के संदर्भ में किशन जी का विश्लेषण कितना सटीक बैठता है. आज नीतीश जी तंत्र पर शासन नहीं कर रहे हैं. बल्कि तंत्र ही उन पर शासन कर रहा है. जब किसी काम को जल्दी पूरा कराने के लिए किसी पदाधिकारी का पैर पकड़ने को बढ़ते हैं तो वे स्वयं प्रमाणित कर रहे होते हैं कि यह बात सच है.
हमारे देश के प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचार का घुन लग गया है. मैंने 67 की संविद सरकार को बहुत नज़दीक से देखा है. महामाया बाबू उस सरकार के मुख्यमंत्री थे और कर्पूरी जी उप मुख्यमंत्री थे. मेरे बाबूजी उस सरकार में गृहमंत्री थे. जैसे आज के जमाने में नाम लिया जाता है कि अमुक पदाधिकारी ईमानदार है. इसी तरह उस ज़माने में नाम लिया जाता था कि कौन पदाधिकारी भ्रष्ट है. उस दौर का एक क़िस्सा मुझे याद है. कोई बेदी नाम के पदाधिकारी पुलिस में डीआईजी थे. यह ध्यान नहीं है कि कहाँ की घटना है. संभवतः धनबाद की घटना है. एक बारात में डीआईजी साहब ने नर्तकी को इतना छूट दिया था जो उनका जो तनख़्वाह था उसमें नर्तकी को उतना छूट देना संभव नहीं था. आय से अधिक खर्च करने का आरोप लगा. और उनको निलंबित करने का आदेश हुआ. एक स्पेशल मेसेंजर द्वारा संचिका दिल्ली भेज कर निलंबन की संचिका पर भारत सरकार के गृह विभाग से उसका अनुमोदन कराया गया.
67 की वह सरकार संघर्ष के रास्ते सत्ता में आई थी. 1965 में उस सरकार के अधिकांश मंत्रियों को केबी सहाय की सरकार ने बग़ैर किसी उकसावे के बुरी तरह पिटवाया था. कर्पूरी जी के हाथ में दो जगह फ्रैक्चर हो गया था. कामरेड चंद्रशेखर सिंह के सर में एक लाठी ऐसी लगी कि बेहोश होकर मंच से नीचे लुढ़क गए थे. तिवारी जी उक्त सभा की अध्यक्षता कर रहे थे. संभवतः वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे. उनकी पीठ पर ऐसी लाठी लगी कि उनके मुँह से खून आने लगा था. पटना के तत्कालीन सांसद भी बुरी तरह पिटाए थे. और कौन कौन उस सभा में थे जो पुलिस की लाठी से घायल हुए थे उन सबका नाम याद नहीं है बाबू जी को बचाने के प्रयास में ज़िंदगी में पहली बार पुलिस की लाठी का स्वाद मैंने भी चखा था. बिहार के इतिहास में विरोधी दलों के नेताओं की जिस ढंग से जिस बर्बरता के साथ पिटाई हुई थी वैसा कोई उदाहरण बिहार की सियासत में नहीं है.
65 के उस आंदोलन में डॉ लोहिया भी पटना में गिरफ़्तार हुए थे. उसी पृष्ठभूमि में केबी सहाय पटना से चुनाव हार गये थे. महामाया बाबू ने उनको हराया था. उस चुनाव में बिहार में कांग्रेस परास्त हुई थी और संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी थी. समाजवादी आंदोलन का यह दुर्भाग्य है कि वह सरकार चल नहीं पाई. संभवतः उस सरकार की आयु मात्र ग्यारह महीने की थी. वह सरकार संघर्ष के गर्भ से पैदा हुई थी. अगर उस सरकार ने पाँच वर्ष का अपना कार्यकाल पूरा किया होता तो संभवत: बिहार का इतिहास आज दूसरा होता.
नीतीश कुमार की सरकार ने पहले पाँच वर्षों में ऐतिहासिक काम किया. आज यह सरकार भ्रष्टाचार का नज़ीर बन गई है. भ्रष्टाचार की गंगोत्री एक अणे मार्ग से ही निकल रही है. लेकिन नीतीश जी की ईमानदारी पर किसी ने उँगली नहीं उठाई है. लेकिन यह कैसी ईमानदारी है कि आपके अग़ल बग़ल के लोग भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं और आपको पता नहीं है! आपके राजनीतिक सहयोगी इस प्रतियोगिता में लगे हुए हैं कि नीतीश जी को मस्का लगाने में कोई हमसे आगे न निकल जाए.
मुझे नहीं लगता है कि अगर नीतीश जी की सरकार को पुनः बहुमत मिल भी गया तो भाजपा उनको मुख्यमंत्री बनायेगी. अब तक यही होता रहा है कि चुनाव के पहले ही मोदी जी या अमित शाह जी घोषणा कर देते थे कि भाजपा से कम सीट आने पर भी नीतीश जी मुख्यमंत्री होंगे. लेकिन अभी तक उन दोनों ने यही कहा है कि चुनाव हम नीतीश जी के नेतृत्व में ही लड़ेंगे. लेकिन चुनाव के बाद नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बनेंगे, ऐसा कुछ उन लोगों के मुँह से नहीं निकला है.

