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*और नहीं अब इंतिहा हो गई*

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शशिकांत गुप्ते

आज सीतारामजी मिलने गया तब वे संत कबीर साहब का दोहे पढ़ रहे थे।
सीतारामजी ने मुझे भी संत कबीर साहब के दोहा पढ़ कर सुनाया।
मन मैला तन ऊजला बगुला कपटी अंग।
तासों तो कौआ भला तन मन एकही रंग

संत कबीर साहब का दोहा सुनकर मुझे प्रख्यात हास्य – व्यंग्य के कवि स्व.काका हाथरसीजी की कविता का स्मरण हुआ।
मन मैला, तन ऊजरा, भाषण लच्छेदार
ऊपर सत्याचार है, भीतर भ्रष्टाचार।

झूठों के घर पंडित बांचें, कथा सत्य भगवान की,
जय बोलो बेईमान की
सीतारामजी ने मुझ से कहा व्यंग्यकार अंतः व्यंग्य ढूंढ ही लेटा है।
सीतारामजी ने कहा मुझे शायर
अल्लाम इक़बालजी का शेर याद आ गया
मस्जिद तो बना दी शब भर में ईमाँ की हरारत वालों ने
मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन न सका

इस शेर का भावार्थ समझ में आ जाएगा तो छद्म आस्था क्या होती है, यह भी समझ में आ जाएगा।
उक्त शेर सुनने के बाद मुझे भी शायर आशुफ़्ता चंगेज़ीजी का यह शेर याद आ गया।
बुरा मत मान इतना हौसला अच्छा नहीं लगता
ये उठते बैठते ज़िक्र-ए-वफ़ा अच्छा नहीं लगता
व्यवहारिक भाषा में समझने के लिए अति आत्मविश्वास मतलब सरल शब्दों में
Over confidence कभी भी अच्छा नहीं।
इन दिनों थी तो सब देखने को मिल रहा है।
अति आत्मविश्वास,नासमझी,
नादानी, अल्पज्ञान, और अहंकार सभी एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द है।
आगे इतना ही कहना पर्याप्त है।
यहां नेकी बदी दो रास्ते हैं गौर से सुन ले
तुझे जाना है किस मंजिल पर अपना रास्ता चुन ले,
कदम उठने से पहले सोच लें अंजाम क्या होगा
भलाई कर भला होगा बुराई कर बुरा होगा
कोई देखे या ना देखे प्रभु तो देखता होगा

उक्त पंक्तियां किसी दार्शिक ने लिखें भजन की पंक्तियां है।
अंत में सभी सहित्यकारों,कवियों, शायरों यह सिर्फ अभियान नहीं दायित्व भी है। जो फर्ज अदा करना है वह शायर अशहर इक़बाल ने निम्न शेर में कहा है।
यही जुनून यही एक ख़्वाब है मेरा
वहां चाराग जलाना है जहां अंधेरा है

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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