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एमएसपी मिलने से किसी का नुक्सान नही होगा 

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मुनेश त्यागी 

      वैसे तो भारत के किसान पहले भी संघर्ष करते रहे हैं, मगर पिछले तीन चार सालों से किसान आंदोलन तेज गति से आगे बढ़ गया है। पहले तो किसान तीन काले कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सड़कों पर आ गए थे और यह आंदोलन एक वर्ष से ज्यादा समय तक जारी रहा। इसकी गंभीरता को देखकर मोदी सरकार को तीनों काले कृषि कानून वापस लेने पड़े।

      उस आंदोलन में सरकार ने किसानों के साथ एक समझौता किया था जिसमें अन्य मांगों के साथ-साथ मुख्य मांग किसानों को एमएसपी देने की भी थी। किसान मोदी जी की बातों में आ गए और उन्होंने अपना आंदोलन वापस ले लिया। इसके बाद लगभग दो सालों तक सरकार बैठकों पर बैठकें करती रही, मगर उसने संघर्षरत किसान संगठनों के साथ कोई बातचीत नहीं की। जो समझौता हुआ था उसे नही माना गया और उनकी कोई मांग स्वीकार नहीं की गई।

     इसके बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की मांग को लेकर अब फिर से किसानों को संघर्ष के मैदान में सड़कों पर आना पड़ा है और अब तो जैसे सरकार किसानों के आंदोलन से डर ही गई है। उसने किसानों को दिल्ली आने से पहले ही हरियाणा बॉर्डर पर रोक दिया और वहां पर सड़कों पर कीलें गाड दी, गड्ढे खोद दिए, संघर्षरत किसानों पर पानी की बौछार, रबड़ की गोलियां आदि से उन पर हमला किया गया।

     यहीं पर सवाल उठता है कि आखिर हमारे किसान संघर्षरत क्यों है? हमारे किसान मुख्य रूप से संघर्षरत इसलिए है कि उन्हें उनकी अधिकांश फसलों का एमएसपी मिलता ही नहीं। यहीं पर यह सवाल उठता है कि एमएसपी की क्या जरूरत है? क्या सभी फसलों पर एमएसपी दिया जा सकता है? और इसी के साथ-साथ समझौता करने के बाद भी सरकार फसलों की सरकारी खरीद की एमएसपी की गारंटी क्यों नहीं दे रही है? वह एमएसपी का सरकारी कानून बनाने को क्यों तैयार नहीं है? किसानों की फसलें खरीदने वाले व्यापारी उन्हें उनकी फसलों का वाजिब दाम क्यों नहीं देते?

     किसान पिछले कई दशकों से दोहन का शिकार हैं । क्या यह समाज और राजनीति की असफलता नहीं है? अगर आंकड़ों की बात करें तो 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, किसान परिवार की आय 10218 रुपए मासिक है, जो मनरेगा से भी काम है। यानी किसान परिवार के एक सदस्य की प्रतिदिन की आय 27 रुपए बैठती है। एक आंकड़ा यह भी है की 2000 से लेकर 2016 तक यानी पिछले 16 सालों में किसानों को 45 लाख करोड रुपए का नुकसान हुआ है। इतने बड़े नुकसान पर भी सरकार या किसान विरोधी ताकतें कोई चर्चा नहीं कर रही हैं। हकीकत में देखा जाए तो यह हानि या नुकसान और भी ज्यादा है। 

   भारत सरकार द्वारा भारत के चंद पूंजीपतियों का पिछले 5-6 साल में 15 लाख करोड रुपए से ज्यादा के कर्ज माफ किया जा चुके हैं जबकि किसानों के साथ ऐसा बिल्कुल भी नहीं किया गया है, उनका एक पैसा कर्ज भी माफ़ नहीं किया गया है और आज हमारा किसान दुनिया में सबसे ज्यादा कर्जदार है। अपनी इन्हीं मांगों को लेकर 2020 में पर्याप्त आमदनी को लेकर किसानों ने आंदोलन किया था और इसी कारण सरकार को तीनों काले कृषि कानून वापस लेने पड़े थे।

      इसके बाद किसानों ने एमएसपी की मांग की ताकि उन्हें लगातार हो रही बर्बादी से बाहर निकला जा सके। मुख्य हकीकत यह है कि पिछले तीन सालों में सरकार ने किसानों की समस्याओं पर कोई चर्चा नहीं की, किसानों के साथ समझौते पर कोई चर्चा नहीं की और उनकी किसी मांग को नहीं माना गया। हमारे देश में पिछले कई सालों में 4 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं क्योंकि वे लगातार कर्ज के जाल में डूबे हुए हैं और कर्ज का बुरी तरह से शिकार हैं ।

    यह सब दिखाता है कि भारत का किसान समुदाय भयंकर कृषि संकट में है। गांव में रोजगार नहीं हैं , उन्हें फसलों का सही दाम नहीं मिलता, उनकी शिक्षा और रोजगार की दशा हालत बुरी दशा में है, उनकी फसलों की लागत लगातार बढ़ती जा रही है और वे लगातार बढ़ती कीमतों का शिकार हो रहे हैं। भारत का किसान 2000 से घाटे की खेती करता चला आ रहा है, उसे उसकी फसलों का वाजिब दाम नहीं मिलता, भारत का किसान धनी नहीं है, वह गरीब है, कर्जमंद है, इसलिए वह लगातार बार-बार आंदोलन करने को मजबूर हो रहा है।

       कुछ लोग कहते हैं कि किसानों को एमएसपी देने से पूरे देश में महंगाई बढ़ जाएगी। यह आरोप और तर्क बिल्कुल बेबुनियाद है। जब उसकी आमदनी बढ़ जाएगी तो वह टैक्स भी देने लगेगा। इस प्रकार किसानों द्वारा टैक्स न देने की बात बिल्कुल बेबुनियाद है। हमारे देश में 50% जनसंख्या खेती पर आधारित है। 14% किसानों को ही एमएसपी मिलती है। 86% किसान बाजार की मनमानी ताकतों पर निर्भर हैं, जिन्हें एमएसपी नहीं मिलती है। भारत के किसानों को 23 फसलों का एमएसपी नहीं मिलता इसी वजह से किसान आंदोलनरत हैं।

      यहीं पर एक महत्वपूर्ण सच्चाई यह है कि अगर भारत के किसानों को एमएसपी मिल जाएगी तो इससे देश की हालत ही बदल जाएगी। किसानों को एमएसपी देने से उन्हें अपनी फसलों के वाजिब दाम मिलेंगे, जिससे उनके पास पैसा आएगा, इस वजह से उनकी खर्च करने की ताकत बढ़ जाएगी, जिससे वह अधिक चीजें खरीदेंगे और वह पैसा बाजार में आएगा, जिस वजह से चीजों की लगातार मांग बढ़ेगी, उद्योग धंधें बढ़ेंगे। इससे भारत का विकास होगा और भारत की विकास दर बढ़ जाएगी और जब भारत का विकास होगा, तो भारत तेज गति से आगे बढ़ेगा, इसका उत्पादन बढ़ेगा, खर्च के साथ-साथ खरीदने की शक्ति बढ़ेगी तो भारत की विकास दर कुलांचे मारकर आगे बढ़ने लगेगी और भारत देखते ही देखते विकसित देशों की सूची में शामिल हो जाएगा।

      यहीं पर सवाल उठता है कि वादा करने के बाद भी वर्तमान केंद्र सरकार किसानों को एमएसपी क्यों नहीं दे रही है? इसके पीछे मुख्य कारण है कि भारत सरकार डब्ल्यूटीओ की शर्तों से संचालित होती है, उसी की शर्तों पर कृषि कानून बनाती है। जब किसानों को उनकी फसलों का वाजिब दाम मिल जाएगा तो किसान कॉर्पोरेट के हाथों लूटने से बच जाएगा और कारपोरेट के मुनाफों में कमी आयेगी।इसलिए इस सरकार को किसानों की चिंता नहीं है। वह कॉर्पोरेट के मूनाफों के बढ़ाने को लेकर ही चिंतित है, इसीलिए किसानों को एमएसपी की गारंटी नहीं दी जा रही है।

      बल्कि हकीकत यह है कि सरकार किसानी खेती को कॉर्पोरेट यानी औद्योगिक घरानों के हवाले करना चाहती है जिससे कृषि किसानी पर देशी विदेशी कारपोरेट घरानों का अधिकार हो जाएगा, जमीनों पर उनका अधिकार और कब्जा हो जायेगा, जिससे किसान मजदूर बन जाएंगे और तब वे सस्ते मजदूर बनकर कॉर्पोरेट के खेतों में काम करने को मजबूर हो जाएंगे। 

    इसी के साथ-साथ यह जानना भी जरूरी है कि किसान गरीब ही नहीं हैं, वे कर्जदार भी हैं। 79 प्रतिशत किसानों को पता ही नहीं है कि एमएसपी क्या होती है? एमएसपी उसे कैसे मिलेगी? यह बात केवल और केवल पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के कुछ किसानों को पता है। इसीलिए वे पूरे देश के किसानों के लिए लड़ रहे हैं। पंजाब के किसान और पंजाब की जनता हमेशा ही संघर्षों में आगे रही है। उसने आजादी के आंदोलन में भी बहुत बलिदान किए थे। पंजाब के किसान संघर्ष करने की स्थिति में है, उनकी आर्थिक स्थिति अन्य किसानों से कुछ अच्छी है और दिल्ली उनके पास है, इसलिए वे दिल्ली पर दबाव बनाने के लिए आंदोलनरत हो जाते हैं। दूरदराज के किसान एक तो गरीब हैं, कर्जमंद हैं, उनमें संघर्ष का जज्बा और हौसला भी कम है, उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है, उन्हें अपनी मांगों की जानकारी भी नहीं है, वे दिल्ली से दूर हैं, इसलिए वे बहुत लंबे समय तक आंदोलन करने की स्थिति में नहीं हैं।

    सरकार की कृषि और किसान विरोधी नीतियों के कारण ही हमारे गांव के अधिकांश बच्चे गांव छोड़कर अपने मां-बाप को छोड़कर शहरों की तरफ भाग रहे हैं। गांव में उद्योग धंधे नहीं है, कारखाने नहीं हैं, पढ़ने के पर्याप्त सही साधन नहीं हैं, स्वास्थ्य की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। वहां के अधिकांश किसान गरीब हैं, कर्जमंद हैं, उन्हें उनकी फसलों का वाजिब दाम नहीं मिलता, इसलिए छोटे मोटे रोजगार की तलाश में गांव के अधिकांश बच्चे, गांवों को छोड़कर, शहरों की तरफ भाग रहे हैं।

      इस प्रकार हम कह सकते हैं कि इस सरकार की किसान मजदूर विरोधी नीतियों के कारण, सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण, हमारे किसान सड़कों पर आने को मजबूर हैं। किसानों को एमएसपी की कानूनी गारंटी मिलने से पूरे देश का विकास होगा, गांव के नौजवान गांव छोड़कर शहरों में नहीं आएंगे। अब जरूरी हो गया है कि गांव में नफरत और हिंसा न फैला कर, किसानों की समस्याओं का समाधान किया जाए, उनकी फसलों का वाजिब दाम दिया जाए, वहां पर जीवन में आगे बढ़ाने वाली सुविधाओं जैसे रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए जाएं।

      एमएसपी मिलने से गांव के लोगों की खरीदने की शक्ति बढ़ेगी, वे माल खरीदेंगे, सामान खरीदेंगे, जिससे उद्योग धंधों का मनचाहा विकास होगा। इससे भारत के विकास को गति मिलेगी और देखते ही देखते, भारत विकसित देशों की सूची में शामिल हो जाएगा। इसलिए भारत के विकास की रक्षा करने के लिए, भारत के किसानों और मजदूरों के बुनियादी अधिकारों की रक्षा करने के लिए, उनके बेटे बेटियों को इस किसान और मजदूर आंदोलन को आगे बढ़ना होगा।

      ऐसा करके ही उनकी बुनियादी समस्याएं पूरी होंगी, उन्हें अपने जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता मिलेगा और यहां पर यह बात भी ध्यान रखने की है कि किसान और मजदूर के आंदोलन को किसान मजदूर संगठनों के संयुक्त मोर्चे के साथ साथ, किसान और मजदूर के बेटे बेटियां ही आगे बढ़ाएंगे। उसे दूसरे शोषक और मुनाफाखोर लोग कभी भी ना तो आगे बढ़ाएंगे और ना उसे कोई समर्थन देंगे। इसलिए एमएसपी आंदोलन से भारत आगे बढ़ेगा, पीछे नहीं जाएगा। अत: आज सरकार के लिए यह सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है कि वह किसानों को उनकी फसलों की एमएसपी खरीद की कानूनी गारंटी का जरूरी कानून बनाये, ताकि हमारे किसानों को बार-बार आंदोलन के रास्ते पर सड़कों पर न आना पड़े।

    यहीं पर दो बातें प्रमुख रूप से नोट की जानी चाहिएं, वे यह कि जब कोई भी व्यापारी या कारखानेदार अपना माल बनाता है तो वह उस पर उसका मूल्य यानी कीमत भी लिखता है, चाहे पंखा हो, ऐसी हो, बल्ब हो, मकान हो, खाने-पीने का समान हो, दूध हो, दही हो, बिस्किट हो, कपड़े हों, नमकीन हो, आटा दालें हों, गाडी कार मोटरसाइकिल स्कूटर यानी कुछ भी हो, सब पर दाम लिखे होते हैं, तो फिर जब भारत के किसान अपनी फसलें उगाते हैं तो उनको न्यूनतम दाम या कीमत पाने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए? और सरकार इस बहुत ही जरूरी मुद्दे को सालों साल से क्यों लटकाए हुए हैं?  किसानों को अपनी फसलों का एमएसपी क्यों नहीं मिलना चाहिए?

     दूसरा यह कि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी इन संघर्षरत किसानों को बदनाम करने पर उतरी हुई है। वह लोगों को गुमराह कर रही है, लोगों में तरह-तरह की गलतफहमियां और गलत जानकारियां प्रचारित प्रसारित कर रही हैं। वह किसानों की समस्याओं पर विचार करने को तैयार नहीं है। यहीं पर किसानों मजदूरों के बेटे बेटियों का सबसे जरूरी काम पैदा हो जाता है और वह यह है कि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी द्वारा किसानों और एमएसपी के बारे में फैलाई जा रही गलतफहमियों को दूर करें, उनके बारे में विशेष जानकारियां हासिल करके, जनता को अवगत करायें।

      और याद रखना कि यह काम किसान मजदूर विरोधी ताकतें, सांप्रदायिकता ताकतें, जनता को हिंदू मुस्लिम में बांटने वाली ताकतें या पूंजीपति ताकतें नहीं करेंगी। यह काम मुख्यरूप से केवल और केवल किसानों मजदूरों के संगठनों, समर्थकों, कार्यकर्ताओं और मुख्य रूप से उनके बेटे बेटियों को ही करना पड़ेगा। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी द्वारा फैलाई जा रही गलतफहमियों और अफवाहों को दूर करने की मुख्य जिम्मेदारी उन्हें अपने कंधों पर लेनी होगी। आज के समय में किसान मजदूर के संगठनों, समर्थकों, कार्यकर्ताओं और उनके बेटे बेटियों का यह सबसे प्रमुख काम है। इसे किसी भी हालत में नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। एमएसपी की कानूनी गारंटी भारत के अधिकांश किसानों के लिए जीवन मरण का प्रश्न बन गई है। भारत सरकार अपनी जिम्मेदारी से किसी भी दशा में नहीं भाग सकती है। किसानों को एमएसपी की कानूनी गारंटी, भारत को हर हालत में विकास के मार्ग पर आगे ही ले जाएगी।

     हम यहां पर यही कहेंगे,,,,

किसान आ मजदूर आ, वतन  के  नौजवान  आ 

तुझे सितम की सरहदों के पार अब निकलना है। 

यह राह पुरखतर है पर तुझे  इसी  पे  चलना  है 

जमाने को बदलना  है, जमाने  को  बदलना  है।

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