पिछले सप्ताह ऐसा ही एक कारनामा, मोदी सरकार जिसे अपना सबसे महत्वपूर्ण विभाग मानती है उस सूचना एवं प्रसारण विभाग ने कर दिखाया। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने टीवी9 भारतवर्ष, आजतक, एबीपी, ज़ी न्यूज़ और टीवी18 आदि चैनलों को औपचारिक नोटिस भेजकर कहा कि उनका चैनल हिंदी का होने के बावजूद उर्दू शब्दों का प्रयोग कर रहा है। उन्होंने पता नहीं कैसे लेकिन पक्का गिनकर भी बता दिया कि ये चैनल अपनी वर्तनी में 30 फ़ीसदी से ज्यादा शब्द उर्दू के इस्तेमाल कर रहे हैं। कहते हैं कि इसके लिए मंत्रालय ने एक नागरिक की निजी शिकायत को आधार बनाया और इसे तुरंत सुधारने और भविष्य में ऐसा न हो इसके लिए भाषा विशेषज्ञ की नियुक्ति करने का भी निर्देश दे मारा।

बादल सरोज
यूं भले दस्तावेज़ी सबूतों के पहाड़ खड़े किए जाने के बाद भी चुनाव आयोग उन्हें बिना पढ़े और देखे ही निराधार और भ्रामक बता दे, मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के सप्रमाण ज्ञापनों की भी दाखिल-खारिज कर दे, नेता प्रतिपक्ष से भी शपथपत्र पर लिखकर देने को कहे, यूं भले ही बिना किसी सबूत के ही जेल में पड़े लोगों की ‘जांच जारी है’ के नाम पर जमानत देने से इनकार करते-करते पांच-सात वर्ष गुजार दे मगर मामला यदि विग्रह, विभाजन को आगे बढ़ाने वाले, देश में द्वेष फैलाने के उनके नफरती एजेंडे का हो तो आनन-फानन में आदेश भी निकल जाता है और उसे फौरन-से-पेश्तर अमल में लाने का हुक्म भी सुना दिया जाता है।
पिछले सप्ताह ऐसा ही एक कारनामा, मोदी सरकार जिसे अपना सबसे महत्वपूर्ण विभाग मानती है उस सूचना एवं प्रसारण विभाग ने कर दिखाया। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने टीवी9 भारतवर्ष, आजतक, एबीपी, ज़ी न्यूज़ और टीवी18 आदि चैनलों को औपचारिक नोटिस भेजकर कहा कि उनका चैनल हिंदी का होने के बावजूद उर्दू शब्दों का प्रयोग कर रहा है। उन्होंने पता नहीं कैसे लेकिन पक्का गिनकर भी बता दिया कि ये चैनल अपनी वर्तनी में 30 फ़ीसदी से ज्यादा शब्द उर्दू के इस्तेमाल कर रहे हैं। कहते हैं कि इसके लिए मंत्रालय ने एक नागरिक की निजी शिकायत को आधार बनाया और इसे तुरंत सुधारने और भविष्य में ऐसा न हो इसके लिए भाषा विशेषज्ञ की नियुक्ति करने का भी निर्देश दे मारा।
बात इतने पर ही नहीं ठहरी – गोएबल्स का अवतार बन चुके इस मंत्रालय ने चैनलों को पंद्रह दिनों के भीतर शिकायत पर लिए गए निर्णय की सूचना मंत्रालय और शिकायतकर्ता दोनों को देने का आदेश भी दे दिया। इस पूरे प्रपंच का मजेदार हिस्सा यह है कि उर्दू के उपयोग पर रोक लगाने की बात भी उर्दू के ही एक शेर “उर्दू को हम इक रोज मिटा देंगे जहां से / कमबख्त ने वो बात भी उर्दू में कही है” को अमल में लाते हुए ही कही है। इस बारे में चैनलों को मंत्रालय ने जो फ़क़्त 7 छोटी पंक्तियों की चिट्ठी लिखी है उसमें भी तौर, ग़लत, इस्तेमाल, खिलाफ, शिकायत, कार्रवाई, दिन, तहत जैसे कुल जमा 13 शब्द उर्दू के इस्तेमाल किए हैं; जो पक्के से 30 फ़ीसदी से ज्यादा ही होते हैं। मंत्रालय की यह चिट्ठी इसलिए और भी ग़ज़ब है कि इसमें चैनलों के लिए संबोधन अंग्रेज़ी भाषा में उसकी रोमन लिपि में लिखा गया है।
विडंबना की बात एक और है और वह यह है कि “हिंदी न्यूज़ चैनल द्वारा अपनी रोज़ाना की टिप्पणियों में अन्य भाषाओं का इस्तेमाल करने को जनता के साथ धोखाधड़ी और आपराधिक कृत्य” बताने वाले ये शिकायतीलाल खुद उस महाराष्ट्र के ठाणे में रहते हैं जहां इन दिनों भाजपा सरकार के राज में हिंदी भाषा बोले भर जाने पर ठुकाई-पिटाई का पुण्यकार्य अंजाम दिया जा रहा है।
सूचना प्रसारण मंत्रालय ने हिंदी चैनलों के लिए यह नोटिस जनवरी 2025 में केबल टेलीविज़न नेटवर्क (संशोधन) नियम, 2025 के तहत दिया है। इन नियमों को बनाते समय दावा किया गया था कि इन्हें इस सेक्टर के आधुनिकीकरण और बेहतर नियंत्रण के लिए बनाया गया है। हालांकि इस देश में टीवी चैनलों पर भाषा और सामग्री के संबंध में कानून और दिशा-निर्देश पहले से ही मौजूद रहे हैं। इन नियमों का घोषित मक़सद सार्वजनिक शालीनता, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामुदायिक सद्भाव के मानकों का पालन सुनिश्चित करना है।
कार्यक्रम संहिता के नाम के ये नियम बाक़ायदा स्पष्ट करते हैं कि टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाली सामग्री में ऐसी भाषा का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए जो अश्लील, अपमानजनक, या अभद्र हो; जो किसी धर्म या समुदाय पर हमला करती हो, या सांप्रदायिक भावनाओं को बढ़ावा देती हो; जो हिंसा को भड़काती हो या बढ़ावा देती हो; जो जान-बूझकर झूठी, भ्रामक या आधी-अधूरी सच्चाई बताती हो; जो शिष्टता और अच्छे नैतिक मूल्यों के विरुद्ध हो; जो न्यायपालिका या राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पदों की गरिमा के विरुद्ध हो। साफ़ हो जाता है कि इनमें से कोई भी नियम हिंदी, उर्दू, मराठी, गुजराती, तेलुगु या तमिल के उपयोग करने-न करने की बात नहीं करता।
पहली नज़र में ही एकदम बेतुकी इस शिकायत को खारिज किया जाना चाहिए था – मगर बजाय ऐसा करने के इसे सही मानते हुए इसके आधार पर कदम उठाने और इसका निराकरण करने के आदेश जारी कर दिए गए। यह किसी एक बंदर जैसी स्वामिभक्ति में विश्वास रखने वाले अदने अधिकारी द्वारा अज्ञानवश की गई कार्रवाई नहीं, यह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की उस आपराधिक प्रक्रिया को तेज करने की दिशा में उठाया गया एक और कदम है; नफरती अभियान पर सरकारी ठप्पा लगाना है।
यह इस धारणा पर आधारित है कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है। यह सरासर झूठी और भ्रांत और कुटिल धारणा आरएसएस के उस कुत्सित अभियान का हिस्सा है जो भारत की विरासत और बनावट दोनों के बारे में कुछ भी नहीं जानते, भाषाओं के बारे में जिनका ज्ञान द्वेष और वैमनस्य से आगे नहीं गया। उनके निशाने पर सभी भारतीय भाषाएं हैं मगर फिलहाल चूंकि उनका मूल मंत्र हिंदू-मुसलमान के बीच रार और तकरार बढ़ाने का है इसलिए उर्दू को मुद्दा बनाया जा रहा है। जबकि सच यह है कि उर्दू ठेठ हिंदुस्तानी भाषा है जो धरती के इसी हिस्से पर जन्मी, पली और हिंदवी, देहलवी, रेख़्ता, उर्दू जैसे नामों के साथ जवान हुई।
उर्दू सिर्फ मुसलमानों की भाषा नहीं है। पंडित चंद्रभान ब्रह्मन उर्दू के पहले कवि हुए हैं, ऐसी अनगिनत मिसालें और भी हैं मगर चूंकि उन पर पहले भी लिखा जा चुका है इसलिए उसे दोहराने की बजाय सार में कहें तो यह कि उर्दू हो या हिंदी हो या अथवा ‘बा’ नाम की कोई भाषा हो, कोई भी भाषा किसी धर्म, संप्रदाय, जाति की नहीं होती। वह कई मर्तबा इलाक़ाई होती है जैसे बांग्ला, मराठी, गुजराती आदि भाषाएं हैं, मगर उस तरह हिंदी-उर्दू नहीं हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में जहां-जहां हिंदी है वहां-वहां उर्दू है और जहां-जहां उर्दू है वहां उसकी हमजोली हिंदी है। इसलिए इनके संगम को सदा गंगा-जमुनी कहा और माना गया है। दिलचस्प है कि दोनों का नाभि-नाल संबंध अमीर ख़ुसरो से है और दोनों का पालना बृज और अवधी का रहा है।
उसे अल्पसंख्यकों की भाषा बनाकर उसका प्रभाव व आयतन कम करना एक साम्प्रदायिक क़िस्म की हरकत है। उर्दू सारे धर्म, जातियों की चहेती भाषा है। मूलतः धरती के इस हिस्से पर जन्मी भारत की भाषा है। स्वतंत्रता संग्राम की भाषा है। क़ौमी तरानों की भाषा है। साम्प्रदायिक एकता, भाईचारे और सद्भाव की भाषा है। हिंदी ही नहीं, उर्दू साहित्य के इतिहास में भी उर्दू को कभी अल्पसंख्यकों या मुसलमानों की भाषा नहीं बताया गया और न किसी स्कूल या कॉलेज में ऐसा पढ़ाया गया। यह ख़ुराफ़ात उन तंगनज़रिए वाले षड्यंत्रकारियों द्वारा फैलाई गई अफ़वाह है जो इस तरह की भाषाई साम्प्रदायिकता इसलिए भी फैलाते हैं क्योंकि उर्दू एक सेक्युलर, धर्म और पंथ निरपेक्ष भाषा है। उर्दू तो बहाना है, असली मक़सद मुसलमानों को निशाना बनाकर उन्माद फैलाना है।
उर्दू तो उर्दू, इन फ़र्ज़ी हिंदी भक्तों को यह भी नहीं पता कि जिस हिंदी के नाम पर वे जाल बिछा रहे हैं वह आधुनिक हिंदी तो बमुश्किल सवा डेढ़ सौ साल पुरानी है और अभी-अभी 19वीं सदी में बृजभाषा और अवधी जैसे मज़बूत भाषाओं से शब्द-भंडार लेकर खड़ी बोली के रूप में अस्तित्व में आई है। इससे पहले जिसे पुरानी हिंदी कहते हैं वह – अवहट्ट – खुद प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश की अंगुली पकड़कर बढ़ी हुई थी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में हिंदुस्तानी अवाम की विराट एकता से घबराए अंग्रेज़ों ने “फूट डालो और राज करो” की नीति में भाषा को भी इस्तेमाल करने की बुरी नीयत से कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज में इसे अपनी तरह से ढालने की भरपूर कोशिश की; तब जो अंग्रेज़ों के दास होना सौभाग्य की बात मानते रहे आज सत्ता में पहुंचकर वे उसी राह पर चलने और भाषाओं को भी साम्प्रदायिकता का ज़रिया बनाने की जी-तोड़ कोशिशें कर रहे हैं। यह ताज़ा बहाना उसी कुटिलता को नया जामा पहनाना है।
इन्हें हिंदी चैनलों पर अंग्रेज़ी का बेतहाशा और ज़्यादातर अनावश्यक इस्तेमाल किया जाना बुरा नहीं लगता – बहुत मुमकिन है कि रानी एलिज़ाबेथ और विक्टोरिया के प्रति घनघोर आदर और ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’ भाव से उनको लिखी चिट्ठियों के अनुभवों के चलते वे अंग्रेज़ी को ही अपनी मातृभाषा मानते हों। शायद इसीलिए इन्हें अपने जुमलों और खोखली घोषणाओं के लिए इस भाषा के जिंगल्स और पंचलाइन्स ही अधिक भाती हैं मगर इस देश की ज़मीन पर जन्मी और संविधान में दर्ज उर्दू के शब्दों का उपयोग इन्हें ‘जनता के साथ धोखाधड़ी और आपराधिक कृत्य’ लगता है।
ज़ोरदार बात यह है कि अन्यथा भारत की गौरवशाली विरासत की बहाली करने की दुहाई देने वाले इस कुनबे को भारतीय समाज को संस्कारित करने वाली प्राकृत या पाली या अपभ्रंश की बहाली की याद नहीं आती, दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषा तमिल को तवज्जोह देने की सुध नहीं आती; उर्दू के मुकाबले में हिंदी – उस हिंदी को जिसका उर्दू के साथ चोली-दामन का बहनापा है – को ही खड़ा करना सूझता है।
मगर असल में वे जिस हिंदी की बात कर रहे होते हैं यह हिंदुस्तान के आम अवाम द्वारा बोली जाने वाली हिंदी नहीं है। यह वह हिंदी है जिसे वे संस्कृतनिष्ठ बनाकर आम व्यवहार से बाहर कर देते हैं और इस तरह एक बार फिर भाषा का उपयोग उस मनुवादी वर्चस्व की कायमी के लिए करना चाहते हैं। इस दूरगामी बदनीयती के अलावा फ़ौरी इरादा उन चौतरफा विफलताओं और बरबादियों से ध्यान हटाने का, हर मामले में भट्ठा बिठा दी गई अर्थव्यवस्था के संकट पर पर्दा डालने के लिए नित नए शिगूफ़े छोड़ने का भी है।
सूचना प्रसारण मंत्रालय की इस हरकत के खिलाफ देश भर में हुई प्रतिक्रियाओं के दबाव में फिलहाल सरकार ने मंत्रालय की ओर से जारी उस नोटिस के दावों का खंडन कर दिया है, जिसमें हिंदी समाचार चैनलों को अपने प्रसारण में अत्यधिक उर्दू शब्दों का प्रयोग न करने और भाषा विशेषज्ञों की नियुक्ति करने का निर्देश दिया गया है।
इस लीपापोती वाली सफ़ाई में कहा गया है कि मंत्रालय ने केबल टेलीविज़न नेटवर्क विनियमन अधिनियम के प्रावधानों के तहत केवल एक दर्शक की शिकायत संबंधित चैनलों को भेजी थी। यह खंडन मंत्रालय की ओर से भेजे गए पत्रों में लिखे निर्देशों से मेल नहीं खाता – मगर, पानी में कंकड़ फेंककर उसकी प्रतिक्रिया का अंदाज़ा लगाने के बाद फिलहाल लगता है पांव पीछे खींच लिए गए हैं। मगर यह फिलहाल के लिए ही किया गया है – कल वे फिर इसी तरह की कोई नई खुड़पेंच लेकर आएंगे।
(बादल सरोज लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)