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अब मेहनत हड़पना अब सबसे नैतिक काम था !

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कुछ पाठ धर्मों के बारे में थे
कुछ संस्कृति और इतिहास के बारे में
कुछ ईश्वरों के बारे में
अधिकांश पाठों में घृणा फैलाने के
तरीक़ों का सजीव वर्णन था
बच्चों के लिए ये पाठ निषिद्ध थे
हमने इन पाठों को कभी नहीं पढ़ा

कुछ पाठों में कामयाब बनने के तरीक़े थे
औरों की मेहनत को अपने लाभ में
बदल देने की नायाब विधियाँ थीं
उन दिनों रोटी कमा-खा सकने वाला
आदमी कामयाब माना जाता था
और मेहनत के अलावा कोई मंत्र अनैतिक था
सो इन पाठों को ग़ैर ज़रूरी पाया गया

कुछ पाठ विज्ञान और प्रकृति के बारे में थे
ये पाठ रोमांच और कौतुहल से भरे थे
इन पाठों को पढ़ते हुए हम गर्व से भर जाते
या रहस्य के दरिया में डूबकर डर जाते
ये पाठ बहुत दिनों तक गुदगुदाते रहे
और लम्बे समय तक जिज्ञासा को जगाते रहे
इन पाठों को हम पूरी तरह कभी नहीं भूले

बहुत सारे पाठ इन्सानों के बारे में थे
इन्सानियत, सद्भाव, ईमानदारी
सदाशयता, सच्चाई, करुणा से भरे
इन पाठों के केन्द्र में इन्सान ही था
ये पाठ हमने इतनी बार पढ़े कि हम
इन्हें कभी भी पहाड़ों की तरह गा सकते थे
और गीतों की तरह गुनगुना सकते थे

अब जाकर पता चला कि हमने कुछ पढ़ा ही नहीं
गीतों की तरह गाए पाठ हास्यास्पद हो चुके हैं
जो पाठ भूले नहीं, उन्हें भूल जाने में हर्ज़ नहीं था
जो पाठ ग़ैर ज़रूरी लगे, वे बहुत ज़रूरी थे
औरों की मेहनत हड़पना अब सबसे नैतिक काम था
जिन पाठों को निषिद्ध क़रार दिया गया था
दरअसल वही अपरिहार्य पाठ थे भविष्य के लिए।

हरभगवान चावला,संपर्क-93545 45440,ईमेल-hbchawla1958@gmail.com

      संकलन -निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद,उप्र
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