अजीत कुमार
थोक महंगाई दर (डब्ल्यूपीआई) में जबरदस्त उछाल आया है। क्रूड और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की कीमतों में तेजी के चलते अप्रैल 2021 में थोक महंगाई दर रिकॉर्ड 10.49 फीसदी पर पहुंच गई। यह मार्च 2021 में 7.39 फीसदी और अप्रैल 2020 में शून्य से 1.57 फीसदी नीचे थी। थोक महंगाई दर में लगातार चौथे महीने बढ़ोतरी हुई है। हालांकि सरकारी आंकड़ों मंे अप्रैल माह के दौरान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित खुदरा महंगाई की दर मार्च के 5.52 फीसदी से घटकर 4.29 फीसदी दर्ज की गई।
भले ही आंकड़ों में खुदरा महंगाई दर में गिरावट आई हो, लेकिन आम उपभोक्ता के नजरिए से इन आंकड़ों की जब पड़ताल की जाती है तो स्थिति भिन्न नजर आती है। सब्जियों और कुछ अनाजों को छोड़ दें तो ज्यादातर कमोडिटीज की कीमतों में जबरदस्त उछाल नजर आ रहा है। इनमें भी सबसे ज्यादा दिक्कतें खाद्य तेलों और दाल की बढ़ी हुई कीमतों से हो रही हैं, क्योंकि ये दोनों ऐसी चीजें है जो रोजाना उपयोग में आने की वजह से उपभोक्ता पर सीधा असर कर रही है।
हर जरूरी चीज महंगी…
राज्य नागरिक आपूर्ति विभाग के आंकड़ों के अनुसार देश में खुदरा में विभिन्न तेलों की कीमतों में पिछले एक साल में 20 से 60 फीसदी तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। चना दाल, अरहर दाल और मसूर दाल की कीमतों में भी पिछले एक साल में तकरीबन 15 फीसदी का इजाफा हुआ है। चाय की कीमतें भी तकरीबन 30 फीसदी तक बढ़ी हैं। चावल, चीनी, मसालों की कीमतों में भी हाल के दिनों में तेजी आई है। साथ ही पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के अलावा एफएमसीजी व कंज्यूमर ड्यूरेबल्स प्रोडक्ट्स की बढ़ती कीमतें भी लोगों को परेशान कर रही हैं। स्टील, सीमेंट और पेंट की कीमतों में तेजी की वजह से आम लोगों के लिए मकान बनाना भी महंगा हो गया है। यानी आंकड़ों को छोड़ दें, तो हर जनउपयोगी चीज महंगी हुई है।
आम लोगों पर कैसा हो रहा है असर?
– सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारी दर अप्रैल के 7.97 फीसदी के मुकाबले मई में बढ़कर अपने एक साल के उच्चतम स्तर यानी 11.9 फीसदी तक चली गई। सीएमआईई के आंकड़े यह भी बताते हैं कि कोविड के आने के बाद से देश में तकरीबन एक करोड़ से ज्यादा वेतनभोगी लोगों की नौकरी छिन गई है। पिछले एक साल में तकरीबन 97 फीसदी लोगों की आय प्रभावित हुई है। ऐसे में महंगाई नीम पर करेला जैसी साबित हो रही है।
– रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक अप्रैल के महीने में देश में खुदरा बिक्री में वर्ष 2019 के इसी महीने के मुकाबले 49 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। क्रेडिटास सॉल्यूशंस के आंकड़े बताते हैं कि लोन रीपेमेंट के लिए चेक बाउंस रेट पिछले साल के मुकाबले बढ़कर दोगुनी यानी 21 फीसदी हो गई है, जबकि क्रेडिट कार्ड के लिए यह 10 फीसदी से बढ़कर 18 फीसदी हो गई है। ये सब महंगाई के असर को ही बयां करते हैं।
अर्थव्यवस्था के लिए क्यों घातक है महंगाई?
– घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए मौजूदा महंगाई की स्थिति अच्छी नहीं है, क्योंकि मौजूदा स्थितियों में कंज्यूमर सेंटीमेंट काफी कमजोर होगा, उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति घटेगी, जो अर्थव्यवस्था के लिए किसी भी सूरत में बेहतर नहीं होगी।
– वित्त वर्ष 2020-21 में जहां प्रति व्यक्ति आय (स्थिर कीमतों पर) में 8.2 फीसदी की कमी आई, वहीं खुदरा महंगाई दर 6.2 फीसदी रही (जो वित्त वर्ष 2013-14 के बाद सबसे ज्यादा है)। इसका असर यह हुआ कि पिछले वित्त वर्ष में प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय 10.1 फीसदी लुढ़क गया। परिणामस्वरूप प्राइवेट यानी हाउस होल्ड कंजप्शन में 9 फीसदी से ज्यादा की गिरावट देखी गई।
– बढ़ती महंगाई की वजह से आरबीआई को भी मौद्रिक नीति को लेकर अपने मौजूदा रुख में बदलाव करना होगा, मतलब उन्हें सिस्टम में लिक्विडिटी बढ़ाने के अपने प्रयासों से थोड़ा पीछे हटना होगा, ब्याज दरों में तेजी की तरफ जाना होगा। जो अंतत: इकोनॉमी में रिकवरी और घरेलू शेयर बाजार पर नेगेटिव असर डालेगा।
क्या कर सकती है सरकार?
चूंकि भारत अपनी खपत का तकरीबन 60 फीसदी खाद्य तेल विदेशों से आयात करता है। इसलिए अगर सरकार खाद्य तेलों और साथ ही दालों पर इंपोर्ट ड्यूटी में कटौती करें तो इनके दाम कम हो सकते हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार इस पर विचार भी कर रही है। सरकार ने फिलहाल दाल के आयात पर से प्रतिबंध हटाने का फैसला किया है जिससे आने वाले समय में दाल के दाम कम हो सकते हैं। जहां तक पेट्रोल-डीजल की बात है, केंद्र और राज्य सरकारें अगर मिलजुल कर टैक्स में कटौती करे तो उपभोक्ताओं को थोड़ी राहत मिल सकती है।
महंगाई के ये 4 कारण
1. वैश्विक बाजार में बढ़े तेलों के दाम…
एग्री कमोडिटी पैक में सबसे ज्यादा खाद्य तेल की कीमतों में तेजी आई है। इनकी कीमतों में बढ़ोतरी की मुख्य वजह वैश्विक बाजारों में आई भारी तेजी है। भारत अपनी खपत का तकरीबन 60 फीसदी खाद्य तेल विदेशों से आयात करता है। आयातित खाद्य तेलों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी पॉम आयल (तकरीबन 60 फीसदी) की है। मई के शुरुआती हफ्ते में वैश्विक बाजारों में पॉम आयल की कीमत पिछले साल के मुकाबले 130 फीसदी से भी ज्यादा बढ़कर अपने उच्चतम स्तर तक चली गई।
2. पाम ऑइल के दाम का असर अन्य चीजों पर…
पाम ऑइल की कीमतों में तेजी की वजह से साबुन, तेल, शैंपू, बिस्कुट, चॉकलेट, कॉस्मेटिक, नमकीन जैसे एफएमसीजी प्रोडक्ट्स की कीमतों में भी हाल के दिनों में काफी तेजी आई है। गौरतलब है कि इन उत्पादों के निर्माण में पॉम आयल का काफी इस्तेमाल किया जाता है।
3. बारिश में नष्ट हो गई दाल की फसल …
दाल की कीमतों में तेजी की वजह बीते खरीफ सीजन में भारी बारिश की वजह से फसलों को हुआ नुकसान है। साथ ही आयात पर पाबंदी और कोरोना के बीच मांग में तेजी से भी कीमतों में तेजी आई है।
4. पेट्रोल-डीजल की कीमतें बहुत बढ़ गईं …
पेट्रोल-डीजल की बढ़ीती कीमतें भी महंगाई के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ने की वजह से ज्यादातर ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक कंपनियों ने किराया बढ़ा दिया है जिसका चौतरफा असर हुआ है। ऑनलाइन खरीदारी करने वालों के लिए भी डिलीवरी चार्ज बढ़ गए हैं। परिवहन लागत बढ़ने से कूरियर प्रदाता कंपनियों ने भी अपने चार्ज बढा दिए हैं।
– अजीत कुमार, वित्त एवं बाज़ार मामलों के विशेषज्ञ

