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“अब जरुरत है प्रगतिशील प्रयोगशाला की

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संजय कनौजिया की कलम✍️
आज देश कि कुल आबादी के 85 प्रतिशत के लगभग या 2-4 प्रतिशत ऊपर नीचे, लोग मतदाता बने हुए है, नए क़ानून CAA-NRC की बात अभी ना करें तो सभी मतदाता भारतीय नागरिक की श्रेणी में ही आते हैं..और आज आधुनिक युग में हर नागरिक अपने मत अमूल्यता को, बखूबी समझने भी लगा है, कि उसका अमूल्य मत उसका ही नहीं उसके परिवार का उसके मौहल्ले का उसकी गली, नगर, जिले, राज्य ही नहीं बल्कि उसके राष्ट्र का भविष्य भी तय करता है..चूँकि भारत विभिन्न जाति-धर्म-भाषा-वर्ग आदि को लेकर आज भी विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, अतः इसी लोकतंत्रीय प्रणाली के अनुसार देश के राजनैतिक दल भी अपनी-अपनी विचार धाराओं को अलग-अलग लेकर चलते है..थोड़ा इतिहास के कुछ पन्ने खोलकर देंखें तो पाएंगे कि भारत के सोने की चिड़या की तस्वीर, शक्ति के आधार पर विफल होने, व्यावसायिक लाभ अनुसार, मजबूरी वश, आपसी कबीलों-राजाओं-सामंतों-रियासतों की आपसी रंजिश से उपजे सहारों की जरुरत या षड्यंत्रकारियों द्वारा विदेशी ताक़तों को निमंत्रण देने या सम्पदा हेतु उनके हमलों के बहाने स्थापित होने वाले जैसे इस्लाम-ब्रिटिश-फ्रेंच-डच-पुर्तगाली आदि इत्यादि विचार धारा भी भारत में अपने-अपने कालखंडों में बहती रहीं है..देश की आजादी के बाद भी बहुत से लोग फिरंगियों की विचार धारा से आज तक प्रभावित हो रखें है..बल्कि देश का एक ऐसा वर्ग जो RSS नामक संगठन की प्रयोगशाला से निकले नफरत-तुष्टिकरण-गैरबराबरी-वैमनष्य- धार्मिक आस्थाओं व भावनाओं के दुरूपयोग करने वाले प्रयोगों के माध्यम से इस्लामिक विचारधारा के विरुद्ध भय का वातावरण बनाकर धीरे-धीरे ऐसा दरख्त बन गया है और इस फासीवादी संगठन के कट्टर समर्थक देश के केंद्र बिंदु में सत्तासीन होकर इतने शक्तिशाली हो गए है कि वो अब अपने को विश्व का सबसे बड़े संगठन होने की दुहाई देने लगे हैं..जबकि आज़ादी के बाद बने संविधान ने भारत के, सभी धर्मो की आस्था-संस्कृति-उत्सवों-खान पान-पहनावे आदि के अधिकारों को सम्मान देते हुए, किसी भी तरह का कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया एवं सर्वधर्म की समावेशी विचार को ही प्राथमिकता देकर धर्मनिरपेक्षता के सौहार्द को ही बल दिया है..उसके बावजूद फासीवादी संगठन संविधान के विपरीत अलोकतांत्रिक रूप से गैरजिम्मेदार होकर मनमानी कर विश्वचर्चित लोकतंत्र की तस्वीर को धूमिल कर रही है..क्या देश की कुल आबादी का 30 प्रतिशत नागरिक अपने मत के प्रति केवल इतना ही जागरूक हुआ कि उसे ना तो महंगाई से ना अपराध से ना बेरोजगारी से ना सामरिक सुरक्षा से ना बिगड़ी आर्थिक व्यवस्था से ना माँ-बहन-बहू-बेटी के बलात्कार व सुरक्षा विहीन व्यवस्था से कोई सरोकार नहीं ? कौन है इसका जिम्मेदार राजनैतिक दल या शिक्षित हो रही जागरूक जनता ?
देश की जनता का एक चालाक वर्ग, जब उसे उचित स्थान पर काम करने का मौका मिलता है चाहे वो चपरासी हो या सिपाही या कोई बाबू अधिकारी, स्वयं बड़े पैमाने पर भ्रष्ट्राचार में कितना ही लिप्त क्यों ना हो..लेकिन नेता उसे साफ़-सुथरी छबि का चाहिए..सोचिये किसान-मजदूर-शोषित-उपेक्षित-वंचित-भूमिहीन लोग भष्ट्राचारी हो सकते हैं ? क्या ये नागरिक नहीं ?..नागरिक उदासीनता या लापरवाही राष्ट्र निर्माण में कितनी बाधक सिद्ध होती है, क्या जनता को इस ओर कदम बढ़ाने या सहयोग नहीं करना चाहिए ? ..ग्रामीण अंचल के लोग भले ही खाद्यानो के मामले में सजग रहते है लेकिन शहरों के लोग जितना खाते है उससे कहीं अधिक पकाते है..एक वीडियो प्रसारण द्वारा उठाई बात के आधिकारिक आंकड़े कितने सटीक है, में उसपर नहीं जाऊँगा परंतु उसका सन्देश विचारणीय है कि एक सर्वे के अनुसार जितनी आबादी देश की है उससे दुगुना खाना रोज बनता है, लेकिन फिर भी लोग भूख से मर रहे है और बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, एग्रीकल्चर मंत्रालय के अनुसार ही हर वर्ष 50 हज़ार करोड़ की लागत से तैयार होने वाले खाने, जिसमे 300 करोड़ लीटर तेल को रोज जलाते हैं इस भोजन को बनाने के लिए और अन्न को भगवान मानने वाले लोग गटर में बहा देते हैं..20 करोड़ लोग भूखे ही सो जाते है, 70 लाख बच्चे कुपोषण या भूख से मर जाते हैं, देश की 45 प्रतिशत ज़मीन जो बंजर होती जा रही है वहां जल स्तर बहुत नीचे चला गया है, उन जमीनों से जंगल काट दिए गए है ताकि खेती हो या पूँजीवादी लोग अपने भौतिक उत्पादों को और ज्यादा पैदा कर सकें, इतनी बड़ी कीमत के बावजूद किसान जो अन्न उपजाता है उसे लोग फेंक देते हैं, यह कृत्य भी तो राष्ट्र निर्माण में बाधक है ? क्या इस ओर नागरिक का कोई कर्त्तव्य नहीं ?..जो कहते है जात-पात नहीं मानते वो क्यों नहीं समाज में जाति-धर्म से हटकर डॉ० लोहिया के “रोटी और बेटी के रिश्ते” को बढ़ावा नहीं देते ?..दहेज़ प्रथा खत्म हो गई क्या ? जबकि इन बुराइयों के प्रतीकों पर कानून बने हुए है, बलात्कार करते वक्त जाति नहीं देखी जाती लेकिन सजा देते वक्त जाति सामने आ जाती है..खाप पंचायतों की अपनी दिशाएं हैं, इसी तरह के और भी बहुत से मसले हैं जिनपर जनता द्वारा चुने प्रतिनिधियों ने संसदीय प्रणाली अनुसार जन-हित में समय-समय पर कानून बनाएं हैं लेकिन समाज की स्वीकार्यता कभी नहीं मिली..ऐसा भी नहीं कि इस ओर सामाजिक संगठन या NGOs आदि काम नहीं कर रहे, कर रहे हैं लेकिन समाजसेवी बनकर..जबकि जरुरत है समाज सुधारक बनकर उतरने की..कौन त्रस्त है इन बुराइयों से ?..”जवाब है देश का 70 प्रतिशत”..माना कि इस ग्लोबलाइजेशन के युग में भूमण्डलीयकरण का महत्व बहुत बढ़ चुका है और ये दो क्षेत्रों में उदारीकरण तथा निजीकरण को बल देता है..उदारीकरण औद्योगिकि और सेवा क्षेत्र के नियमो में ढील जरूर देता है लेकिन निजीकरण के माध्यम से निजी क्षेत्र की कंपनियों को उत्पादन की अनुमति प्रदान करता है और विदेशी संधियों के आधार पर सभी सरकारी-गैर सरकारी संस्थानों को कौड़ियों के दाम पर बेचकर देश के उस बड़े वर्ग जो दलित-पिछड़े में आते हैं उनके रोजगारों के अधिकारों को समाप्त किया जा रहा है..!!
सवाल फिर खड़ा होता आखिर कौन हैं इस व्यवस्था को लागू करने वाले लोग..?

इस व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदार कांग्रेस रही है, समय के थपेड़ों ने इस व्यवस्था को और अधिक असरदार बनाने वाले बदल दिए हैं.. चेहरे बदल दिए झंडे बदल दिए सोच- विचार सहित चुनाव चिन्ह बदल दिए..अब भगवा है, कमल है और दो चेहरों के पीछे एक अत्यंत ही खतरनाक सोच की प्रयोगशाला है और इनके साथ है देश के कट्टर 30 प्रतिशत वह लोग जो उदार 70 प्रतिशत लोगों के उज्जवल भविष्य को सदा ही अन्धकार में रखना चाहते है..इन 30 प्रतिशत की संख्या और बढ़ गई तो ना संविधान बचेगा ना लोकतंत्र..अब जरुरत है इस फासीवादी प्रयोगशाला के खिलाफ, डॉ० अंबेडकर और डॉ० लोहिया, सामाजिक न्याय-समता- समानता-बराबरी-प्रेम-सौहार्द-धर्मनिरपेक्ष के वैचारिक वैज्ञानिक-डॉ०-प्रोफ०-पत्रकार- साहित्यकार-कलाकार आदि विद्वानों की एक समावेशी नई प्रयोगशाला को स्थापित करने की..!!
(लेखक राजनैतिक सामाजिक चिंतक है)

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