नीलम ज्योति
चाहे हम कितना ही चिल्लाएं कि
स्त्री और पुरुष समान हैं,
वे समान नहीं हो सकते थे।
क्योंकि पुरुष स्वतन्त्रता बरतता है, बिना पकड़े जाने के डर के.
स्त्री स्वतन्त्रता नहीं बरत सकती।
विज्ञान की व्यवस्था ने
स्त्री को पुरुष के निकट खड़ा कर दिया।
अब वे दोनों बराबर स्त्री थोडी स्वतन्त्र हैं।
अगर पवित्रता निश्चित करनी है तो
दोनों को समान निश्चित करनी पड़ेगी और
अगर स्वतन्त्रता तय करनी है तो
दोनों समान रूप से स्वतन्त्र होंगे।
बर्थ-कण्ट्रोल, सन्तति-नियमन के कृत्रिम साधन
स्त्री को पहली बार पुरुष के समकक्ष बिठाते हैं।
बुद्ध नहीं बिठा सके,
महावीर नहीं बिठा सके,
अब तक दुनिया का कोई महापुरुष नहीं बिठा सका
स्त्री को बराबर।
कहा उन्होंने कि दोनों बराबर हैं।
लेकिन वे बराबर हो नहीं सके,
क्योंकि उनकी एनाटॉमी, उनकी शरीर की व्यवस्था,
खास कर गर्भ की व्यवस्था कठिनाई में डाल देती थी।
स्त्री कभी भी पुरुष की तरह स्वतन्त्र नहीं हो सकी।
आज पहली दफे स्त्री भी स्वतन्त्र हो सकती है।
अब इसके दो ही अर्थ होंगे :
या तो स्त्री स्वतन्त्र की जाए
या पुरुष की अब तक की जो स्वतन्त्रता थी
उस पर पुनर्विचार किया जाए।
सारी नीति को बदलना पड़ेगा।
इसलिए धर्मगुरु परेशान हैं।
अब मनु की और मुल्लाओं की नीति नहीं चल सकेगी,
क्योंकि सारी व्यवस्था बदल जायेगी।
और इसलिए उनकी घबराहट स्वाभाविक है।
लेकिन~
बुद्धिमान लोगों को समझ लेना चाहिए कि
उनकी घबराहट, उनकी नीति को बचाने के लिए
मनुष्यता की हत्या नहीं की जा सकती।
उनकी नीति जाती हो कल तो आज चली जाए,
लेकिन मनुष्यता का बचना
ज्यादा महत्वपूर्ण और ज्यादा जरूरी है।
मनुष्य रहेगा तो हम नयी नीति खोज लेंगे।
और मनुष्य न रहा तो
मनु की और याज्ञवल्क्य की किताबें सड़ जायेंगी
और गल जायेंगी और नष्ट हो जायेंगी,
उनको कोई बचा भी नहीं सकता है।
परिवार-नियोजन में मैं मनुष्य के भविष्य के लिए
बड़ी क्रान्ति की सम्भावनाएँ हैं।
इतना ही नहीं कि
आप दो बच्चों पर रोक लेंगे अपने को,
बल्कि अगर परिवार-नियोजन की फिलासफी,
उसका पूरा दर्शन हमारे खयाल में आ जाए तो
हमें मनुष्य की पूरी नीति, पूरा धर्म, अन्ततः
परिवार की पूरी व्यवस्था और अन्तिम रूप से
समाज का पूरा ढाँचा बदल जायेगा।
कभी छोटी चीजें सब बदल देती हैं
जिनका हमें खयाल नहीं होता।
मैं परिवार-नियोजन और कृत्रिम साधनों के पक्ष में हूँ,
क्योंकि मैं अन्ततः जीवन को चारों तरफ से
क्रान्ति से गुजरा हुआ देखना चाहती हूँ।
चीन का एक आदमी
जर्मनी में एक विचारक को
एक छोटी सी पेटी भेजी,
लकड़ी की पेटी।
बहुत खूबसूरत खुदाव था उस पेटी पर।
अपने मित्र को उसने वह पेटी भेजी,
एक लेखक को, और कहा कि
एक ही शर्त है मेरी उसको ध्यान में रखना,
इस पेटी का मुँह हमेशा पूर्व की तरफ रखना।
क्योंकि यह पेटी हजार वर्ष पुरानी है और
जिन-जिन लोगों के हाथ में गयी है,
यह शर्त उनके साथ रही है कि
इसका मुँह पूर्व की तरफ रहे,
यह इसे बनाने वाले की इच्छा है।
अब तक पूरी की गयी है,
इसका ध्यान रखना।
उसके मित्र ने लिख भेजा कि
चाहे कुछ भी हो,
वह पेटी का मुँह पूर्व की तरफ रखेगा।
इसमें कठिनाई क्या है!
लेकिन पेटी इतनी खूबसूरत थी कि
जब उसने अपने बैठकखाने में पेटी का मुँह
पूर्व की ओर कर के रखा तो देखा कि
पूरा बैठकखाना बेमेल हो गया।
उसे पूरे बैठकखाने को बदलना पड़ा,
फिर से आयोजित करना पड़ा,
सोफे बदलने पड़े,
टेबलें बदलनी पड़ीं,
फोटो बदलने पड़े।
जब उसने सब बदल दिया तो उसे हैरानी हुई कि
कमरे के जो दरवाजे-खिड़कियाँ थीं,
वे बेमेल हो गयीं।
पर उसने पक्का आश्वासन दिया था,
तो उसने खिड़की-दरवाजे भी बदल डाले।
लेकिन वह कमरा अब पूरे मकान में बेमेल हो गया।
तो उसने पूरा मकान बदल दिया।
आश्वासन दिया था तो उसे पूरा करना था.
उसने पाया कि
उसका बगीचा,
बाहर का दृश्य,
फूल, सब बेमेल हो गये।
तब उसको उन सबको बदलना पड़ा।
फिर भी उसने अपने मित्र को लिखा कि
मेरा घर मेरी बस्ती में बेमेल हुआ जा रहा है,
इसलिए मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया हूँ,
अपने घर तक को बदल सकता हूँ,
लेकिन पूरे गाँव को कैसे बदलूँगा ?
और गाँव को बदलूँगा तो शायद
वह सारी दुनिया में बेमेल हो जाए,
तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी।
यह घटना बताती है कि
एक छोटी सी बदलाहट अन्ततः सब चीजों को बदल देती है।
धर्मगुरु का डरना ठीक है, वह डरा हुआ है।
वह डरा हुआ है, उसके कारण हैं।
उसे अचेतन में यह बोध हो रहा है कि
अगर सन्तति-नियमन और
परिवार-नियोजन की व्यवस्था आ गयी तो
अब तक की परिवार की धारणा, नीति, सब बदल जाएगी।
मैं क्यों पक्ष में हूँ ?
क्योंकि मैं चाहती हूँ कि
वह जितनी जल्दी बदले, उतना अच्छा है।
आदमी ने बहुत दुःख झेल लिया पुरानी व्यवस्था से,
उसे नयी व्यवस्था खोजनी चाहिए।
जरूरी नहीं कि नयी व्यवस्था सुख ही लायेगी,
लेकिन कम से कम पुराना दुख तो न होगा।
दुःख भी होंगे तो नये होंगे।
और जो नये दुःख खोज सकता है,
वह नये सुख भी खोज सकेगा।
असल में,
नये की खोज की हिम्मत जुटानी जरूरी है।
पूरे मनुष्य को नया करना है।
और परिवार-नियोजन और
सन्तति-नियमन केन्द्रीय बन सकता है,
क्योंकि सेक्स मनुष्य के जीवन में केन्द्रीय है।
हम उसकी बात करें या न करें,
हम उसकी चर्चा करें या न करें,
सेक्स मनुष्य के जीवन में केंद्रीय तत्व है।
अगर उसमें कोई भी बदलाहट होती है,
तो हमारा पूरा धर्म, पूरी नीति, सब बदल जायेगी।
वे बदल जानी ही चाहिए।
मनुष्य के भोजन,
निवास,
भविष्य की समस्याएँ ही
इससे बँधी नहीं हैं,
मनुष्य की आत्मा,
मनुष्य की नैतिकता,
मनुष्य के भविष्य का धर्म,
मनुष्य के भविष्य का परमात्मा भी
इस बात पर निर्भर है कि
हम अपने यौन के सम्बन्ध में
क्या दृष्टिकोण अख्तियार करते हैं।
(चेतना विकास मिशन)

