आकर्षित समुद्री तटों, दर्शनीय मंदिरों, खूबसूरत पर्यटन स्थलों के साथ लगभग 2000 साल पुरानी
ऐतिहासिक और भव्य सांस्कृतिक विरासत अपने हृदय में समेट ओडिशा भारत के इतिहास से लेकर
वर्तमान तक एक अहम स्थान रखता है। यह भगवान जगन्नाथ की भूमि है तो सम्राट अशोक के हृदय
में बौद्ध धर्म के बीज भी यहीं पड़े। कोणार्क के सूर्य मंदिर से लेकर जगन्नाथ रसगुल्ला और चिल्का
झील तक यहां कदम-कदम पर ऐसी विरासतें हैं, जिन पर न सिर्फ ओडिशा, बल्कि पूरे देश को गर्व है।
ओडिशा को हमें एक और बात के लिए भी जानना चाहिए। वर्ष 1817 का पाइका सशस्त्र संघर्ष, जिसे
असल में भारतीय स्वतंत्रता इतिहास का पहला सशस्त्र संघर्ष भी कहा जाता है…
ओडिशा 1 अप्रैल को उत्कल दिवस के रूप में अपना 86वां स्थापना दिवस मना रहा है। यही वो दिन है
जब 1936 में भाषाई आधार पर ‘उड़ीसा’ की स्थापना तत्कालीन बिहार, मद्रास प्रेसीडेंसी, संयुक्त बंगाल के
कुछ हिस्सों को अलग कर की गई थी। तब से ‘उत्कल दिवस’ या ‘उत्कल दिवाशा’ इसी दिन मनाया
जाता है। 2011 में इसका नाम ‘आेडिशा’ कर दिया गया। सम्राट अशोक का अहिंसा की सीख देने वाला
यह उत्कल प्रदेश भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में भी बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वर्ष 1857 के स्वतंत्रता
संग्राम से भी 40 साल पहले ओडिशा की पवित्र भूमि पर 1817 में एक ऐसे सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत हो
चुकी थी, जिसने पूर्वी भारत में अंग्रेजों की जड़ें हिला देने का काम किया, जिसे हम पाइक या पाइका संघर्ष
के नाम से जानते हैं। पाइक ही नहीं, बल्कि गंजाम आंदोलन, और लारजा कोल्ह आंदोलन से लेकर
सम्बलपुर संग्राम तक, ओडिशा की धरती ने विदेशी हुकूमत के खिलाफ क्रांति की ज्वाला को हमेशा नई
ऊर्जा दी। जब देश ने गांधी जी के नेतृत्व में गुलामी के खिलाफ अपनी अंतिम लड़ाई शुरू की, तो भी
ओडिशा और यहां के लोग उसमें बड़ी भूमिका निभा रहे थे। असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा ये
ऐसे आंदोलन थे जहां से लेकर नमक सत्याग्रह तक पंडित गोपबंधु, आचार्य हरिहर और हरेकृष्ण महताब,
लक्ष्मण नायक जैसे हीरो ओडिशा को नेतृत्व दे रहे थे। रमा देवी, मालती देवी, कोकिला देवी, रानी
भाग्यवती, ऐसी कितनी ही महिलाएं थीं, जिन्होंने आजादी की लड़ाई को एक नई दिशा दी थी। प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी कहते हैं, ”ओडिशा तो हमारी इस सांस्कृतिक विविधता का एक सम्पूर्ण चित्र है। यहां की कला,
यहां का आध्यात्म, यहां की आदिवासी संस्कृति पूरे देश की धरोहर है। पूरे देश को इससे परिचित होना
चाहिए, जुड़ना चाहिए।” ओडिशा के अतीत को आप खंगालें, तो आप देखेंगे कि उसमें हमें ओडिशा के साथ-
साथ पूरे भारत के ऐतिहासिक सामर्थ्य के भी दर्शन होते हैं। इतिहास में लिखित ये सामर्थ्य वर्तमान और
भविष्य की संभावनाओं से जुड़ा हुआ है। भविष्य की इन्हीं संभावनओं के द्वार खोलने के लिए आज
ओडिशा पूर्वी भारत का प्रवेश द्वार बना हुआ है। बीते 7 वर्षों पर अगर गौर करें तो यहां विकास के लिए
बुनियादी ढांचे पर केंद्र सरकार ने सबसे ज्यादा ध्यान दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं, ”आज
ओडिशा में हजारों किमी के नेशनल हाइवेज बन रहे हैं, कोस्टल हाइवेज बन रहे हैं। सागरमाला प्रोजेक्ट
पर भी हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। यहां उद्योगों, कंपनियों को प्रोत्साहित करने के लिए काम
हो रहा है। ऑयल रिफाइनरीज हों, एथानॉल बायो रिफाइनरीज हों, इनके नए नए प्लांट्स आज ओडिशा में
लग रहे हैं। इसी तरह स्टील इंडस्ट्री की व्यापक संभावनाओं को भी आकार दिया जा रहा है। शिक्षा के
क्षेत्र में आईआईटी भुवनेश्वर, आईआईएसईआर बहरामपुर और आईआईएस जैसे संस्थानों की यहां
शुरुआत की गई है। हमें ओडिशा के इतिहास को, यहां की संस्कृति को, यहां के वास्तु वैभव को देश-विदेश
तक लेकर जाना है।”

