मुनेश त्यागी
स्वर्णवाद, दलितवाद, पिछड़ावाद, जातिवाद और साम्प्रदायिकता केवल पूंजीवाद के पिछलग्गू हैं, उसके सहयोगी, रक्षक और बगलगीर हैं। इनका किसानों मजदूरों की सरकार से, किसानों, मजदूरों, नौजवानों, विद्यार्थियों और किसानों मजदूरों की मुक्ति से, उनकी समस्याओं से, इनका कोई नाता और रिश्ता नहीं है, उनसे कुछ लेना देना नही है।
साम्राज्यवाद और पूंजीवाद ने बड़े करीने से, जानबूझकर और भली-भांति इन्हें पाला और पोसा है, इनका दिशा निर्देशन किया है, इन्हें पैसों से मजबूत किया है। इन लुटेरों का मुख्य काम है स्वर्ण, दलित, पिछड़ा और ओबीसी के नाम पर जनता की एकता को तोड़ना, उसे खंड खंड करना और उसे बनाए रखना।
भारत में दुनियाभर के पूंजीवादी और साम्राज्यवादियों की नीति रही है कि इन तबकों को, किसानों, मजदूरों के साथ कोई वास्ता, संबंध नहीं रखने देना है, इन्हें किसानों मजदूरों के मंच पर संयुक्त एवं एकजुट कार्रवाई और लड़ाइयों से अलग थलग रखना है।
पहले अंग्रेज दो सौ वर्षों तक भारत में "बाटों और राज करो" कि नीति अपनाते रहे और भारत को गुलाम बना कर रखा और उसे लूट लूट का कंगाल कर दिया। अब आजाद भारत में हिंदुस्तान का पूंजीपति और सामंती वर्ग, विश्व की पूंजीवादी और साम्राज्यवादी ताकतों के नेतृत्व में भारत की जनता को स्वर्ण, अगडा, पिछड़ा, दलित और ओबीसी के नाम पर बांट कर जनता की एकता को खंडित किये हुए हैं और अपनी पूंजीवादी साम्राज्यवादी लूट, शोषण, अन्याय और असमानता को बरकरार रखे हुए है।
दरअसल, यह देशी विदेशी लुटेरा वर्ग, आजादी की लडाई में भी जनता की एकता और जनता की एकजुटता से भयभीत रहता था और यह वर्ग आज भी जनता की, किसानों मजदूरों की एकता और एकजुटता से भय खाता है। यह तथ्य बड़ा ही आश्चर्यजनक है कि इन समस्त तबकों का कोई भी कार्यक्रम क्रांतिकारी और समाज में बुनियादी परिवर्तन करने वाला नहीं है। ये तमाम के तमाम तबके क्रांति विरोधी हैं, क्रांति के अवरोधक और रोडे हैं। समाज के क्रांतिकारी और बुनियादी बदलाव के और रुपांतरण के खिलाफ हैं। इन सब ने मिलकर भारत में क्रांति का रास्ता रोक दिया है क्रांतिकारी बदलाव की लड़ाई को धीमा और ज्यादा कठिन बना दिया है।
भारत की क्रांतिकारी ताकतों को इन सब मुद्दों पर इन तमाम तबकों से, उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं व बुध्दिजीवियों से मिलजुलकर गंभीर विचार विमर्श करना होगा और जनता की "मुक्ति का कार्यक्रम" बनाकर और "जनता की मुक्ति" का नारा देकर इन वंचित, अभावग्रस्त, पिछड़े और गरीब तबकों को अपने कार्यक्रम और संघर्ष के दायरे में लाना होगा और क्रांति और समाज परिवर्तन के क्रांतिकारी मार्ग पर अग्रसर करना होगा। इसके अलावा भारत में क्रांतिकारी बदलाव का और कोई रास्ता और विकल्प नहीं रह गया है
यहां पर यह जानना और ध्यान रखना भी जरूरी है कि इन लोगों की विचारधारा, कार्यक्रमों और कार्यवाहियों से आम जनता को, आम भारतीयों को, किसानों मजदूरों को, सामना की जा रही बुनियादी समस्याओं रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक असुरक्षा से कोई मुक्ति नहीं मिल सकती क्योंकि जनता की मुक्ति का, जनता की समस्याओं को समाप्त करने का, इनके पास न तो कोई कार्यक्रम है और ना ही इन समस्याओं को दूर करने के लिए ये ताकतें कोई संघर्ष करना चाहती हैं। हां बस इनको पद और पैसा चाहिए। हां यह जरूर है कि इन तबकों के नेताओं, रिश्तेदारों और लग्गे भग्गों ने अपने घर जरूर भर लिए हैं, अपना कल्याण जरूर कर लिया है।
यहां पर एक बात और नोट करने की है कि इन्होंने अपने घर भरने के अलावा पूंजीपतियों की तिजोरियां भरी हैं, उनके कार्यक्रमों और नीतियों को आगे बढ़ाया है, उनकी उदारीकरण निजी करण और वैश्वीकरण की नीतियों और मुहिम को आगे बढ़ाने में मदद की है, उसे विस्तार देने में अपनी पूरी जान लगा दी है, उनके मुनाफों में अनाप-शनाप वृद्धि की है। मगर यहीं पर देखा जाए तो इन्होंने अपने दायरे के जो गरीब, वंचित, शोषित, पीड़ित और अन्याय और उपेक्षा के शिकार लोग हैं उनके लिए न तो कोई प्रभावी और कारगर कार्यक्रम बनाया है ना कोई संघर्ष किया है और ना ही कोई संघर्ष करने की इच्छा रखते हैं, हां दिखावे के लिए ये कुछ भी कह या कर सकने का दिखावा कर सकते हैं।
आम जनता को, किसानों मजदूरों नौजवानों को, बुनियादी समस्याओं से मुक्ति दिलाने के लिए दलितों और पिछड़ों को, किसानों मजदूरों और वामपंथियों के साथ क्रांतिकारी मोर्चा बनाना पड़ेगा और जनता की मुक्ति का प्रोग्राम जनता के सामने पेश करना होगा और इस प्रोग्राम के पीछे जनता को लामबंद करना होगा और इस जनविरोधी, पूंजीवादी, साम्राज्यवादी, सामंती, फासीवादी निजाम और गठजोड़ को बदलना होगा, तभी जाकर जनता को इन बुनियादी समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है और क्रांति का कारवां आगे बढ़ाया जा सकता है और क्रांति के इन जनविरोधी अवरोधकों और रोडों को हटाया, हराया और अलग थलग किया जा सकता है।

