पुष्पा गुप्ता
_अमेरिका में पिछले कुछ सालों तक भारतीय मूल के लोगों या भारत से काम करने अमेरिका आए लोगों को मॉडल माइनॉरिटी या आदर्श अल्पसंख्यक कहा जाता रहा है._
आदर्श यानि कि अमेरिका में आने के बाद नौकरी करना, पैसे कमाना और अमेरिकी रंग में रंग जाना. साठ के दशक में जब अमेरिकी नियमों में बदलाव हुआ तो बड़ी संख्या में भारत से लोगों का अमेरिका आना हुआ.
उस दौरान अमेरिका आने वाले लोगों में खास तौर पर वो लोग थे जो विज्ञान और मेडिसीन के क्षेत्र से जुड़े थे. उन्हें यहां अच्छी नौकरियों पर बुलाया गया और उन्हें यहां एक बेहतर ज़िंदगी मिली. नब्बे के दशक में सूचना प्रौद्योगिकी में आए उछाल के बाद बड़ी संख्या में भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर अमेरिका आए.
_धीरे धीरे अमेरिका के पश्चिमी इलाके यानी कैलिफोर्निया और आसपास के राज्यों में भारतीय लोगों की एक बड़ी आबादी बसी. इसी तरह पूर्वी तट पर जहां कंप्यूटर से जुड़ी कंपनियों का काम था वहां भी भारतीय इंजीनियर धीरे धीरे बसते चले गए._
>साठ और सत्तर के दशक में भारतीयों के प्रति नस्ली भेदभाव की घटनाएं बहुत कम हुआ करती थीं क्योंकि साठ के दशक में अमेरिका में सिविल राइट्स आंदोलन चल रहा था. सत्तर- अस्सी के दशक तक भारतीय लोगों की संख्या भी कम थी.
नब्बे के दशक में जब भारतीयों की संख्या बढ़ी तो उनके खिलाफ भेदभाव की घटनाएं छिटपुट घटने लगीं. इसका एक कारण यह भी था कि नब्बे के दशक तक एक नई पीढ़ी भारतीय मूल के लोगों की खड़ी हो गई थी जो बस दिखने में भारतीय लगते थे पर वो यहीं पैदा हुए और पले बढ़े थे.
इस पीढ़ी ने भेदभाव का सामना किया और अपने साथ होने वाले भेदभाव को रिपोर्ट भी करने लगे.
इसी दौरान ग्यारह सितंबर की घटना हुई और अरबी तथा भारतीय लोगों खासकर सिक्खों के साथ मारपीट की घटनाएं बड़ी संख्या में हुई. बीसेक साल बीतने पर इस तरह की घटनाएं कम हुई लेकिन अमेरिका में राइट विंग के उभार के साथ ही एक बार फिर भारतीय लोगों के साथ भेदभाव और नस्ली हिंसा की खबरों में अचानक तेजी आई है.
पिछले दिनों कैलिफोर्निया राज्य में एक ही परिवार के चार सदस्यों की हत्या का सनसनीखेज मामला सामने आया है.
इस मामले में गिरफ्तारी तो हुई है और पुलिस का कहना है कि हत्या करने वाला आदमी मानसिक रूप से परेशान है लेकिन इस मामले की जड़ में नस्लीय भेदभाव के होने को नकारा नहीं जा सकता है.
वर्ष 2017 में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के कुछ समय बाद ही कैन्सास के एक रेस्तरां में एक भारतीय युवक की हत्या कर दी गई थी और वहां इस तरह के नारे लगाए थे कि बाहरी लोग हमारे देश से निकल जाओ.
इस तरह की घटनाएं आम तो नहीं हुईं लेकिन गाली गलौज़, मारपीट की घटनाएं भारतीय मूल के लोगों के साथ उनकी त्वचा के रंग को लेकर टिप्पणियां होती रही हैं. वर्ष 2020 में भारतीय लोगों के बीच किए गए एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि हर दो में से एक भारतीय को अपने रंग के कारण भद्दी टिप्पणियों या भेदभाव का सामना करना पड़ता है.
करीब बारह सौ भारतीयों के बीच किए गए इस इंडियन अमेरिकन एटीट्यूड सर्वे में कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं.
सर्वे करने वाले बताते हैं कि सत्तर और अस्सी के दशक में न्यूयार्क में भारतीय लोगों के साथ मारपीट की कई घटनाएं हुई हैं लेकिन उन्हें कभी मीडिया में बड़ा मुद्दा नहीं बनाया गया.
इस कड़ी में 1987 में सिटीबैंक के एक भारतीय अधिकारी की हत्या भी शामिल है. इस सर्वे के अनुसार करीब 31 प्रतिशत लोगों का मानना था कि भारतीयों के खिलाफ भेदभाव एक बड़ा मुद्दा है जबकि बाकी लोगों के अनुसार इसे एक छोटी समस्या के रूप में देखा जाना चाहिए.
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हालांकि सर्वे में हिस्सा लेने वाले हर दो में से एक आदमी का कहना था कि पिछले बारह महीनों में उन्होंने कम से कम एक बार भेदभाव झेला है अपने रंग के कारण. रंग के अलावा भारतीय लोगों के साथ भेदभाव की वजह उनका धर्म, भारतीय तौर तरीके और लिंग रहा है. सर्वे के अनुसार भारतीय मुस्लिम महिलाओं को सबसे अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है और ऐसा करने वालों में ज्यादातर गैर भारतीय होते हैं.
भारतीयों के साथ भेदभाव की एक बड़ी वजह अमेरिका में उनका सफल होना भी है. अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की औसत आय पचासी हज़ार डॉलर सालाना है जबकि बाकी अमेरिका की औसत सालाना आय चालीस हज़ार डॉलर है.
इसका कारण यही है कि यहां आने वाले अधिकतर भारतीय अच्छे पेशों में अच्छे वेतन पर आए और फिर उनके बच्चों ने डॉक्टरी, इंजीनियरिंग या ऐसे पेशों को अपनाया जिसमें बहुत अधिक पैसा था. आम तौर पर भारतीय लोगों के बारे में आम राय है कि वो अपने बच्चों को कॉलेज की शिक्षा ज़रूर देते हैं और उनके बच्चे पढ़ने लिखने में अच्छे होते हैं.
इतना ही नहीं भारतीय लोगों में अपने ही लोगों के साथ रहने का एक चलन भी उन्हें अमेरिकी समाज से थोड़ा अलग थलग करता है. अमेरिका के हर शहर में जहां भी भारतीय लोगों की संख्या अधिक है वो एक ही इलाके में रहना पसंद करते हैं जिसका कारण अच्छे स्कूल और जान पहचान के लोगों का पड़ोसी होना बताया जाता है.
ऐसे में भारतीय बच्चों और परिवारों का अमेरिकी मूल के लोगों के साथ उठना बैठना या उस संस्कृति में घुलना बहुत अच्छे से नहीं हो पाता है.
इन सब कारणों के बीच अमेरिका में जब से राइट विंग राजनीति का उभार हुआ है तो ऐसी राजनीति को सपोर्ट करने वाले ये भी मानने लगे हैं कि भारतीय लोग सारी अच्छी नौकरियां ले लेते हैं और उनके लिए कम विकल्प बचते हैं. हालांकि ये बहुत ही गलत धारणा है लेकिन जैसा कि होता है कि राइट विंग की राजनीति में चीजों का सामान्यीकरण कर दिया जाता है.
इस सरलीकरण के कारण आम अमेरिकी के मन में भारतीय लोगों के लिए नफरत पैदा होने की संभावना बढ़ गई है जो कि गाली गलौज, मारपीट, या भारतीयों की हत्या के रूप में तब्दील होती दिखती है.
यह दुखद है कि नस्ली हिंसा के मामले में जहां अमेरिकी मीडिया अश्वेत लोगों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को अत्यंत गंभीरता से लेता है वहीं भारतीय लोगों के साथ होने वाले भेदभाव पर मीडिया में वैसी तत्परता नहीं दिखती है.
इसका एक कारण भारतीयों की संख्या कम होना हो सकता है लेकिन कैलिफोर्निया में हुए हालिया हत्याकांड के बाद उम्मीद की जा रही है कि भारतीयों के खिलाफ हो रहे भेदभाव और हिंसा की घटनाओं को मीडिया भी गंभीरता से लेगा.

