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तेल निकल गया टेलेंट वाली फिलॉसफ़ी का

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 सुधा सिंह

     आठवी में पढ़ने वाला बेटा, यही टैलेंट और आरक्षण का रोना सीखकर आया है। यह ख़तरनाक है, और भविष्य में अपने किसी भी फेलियर का दोष, व्यवस्था पर मढ़ने की राह तैयार कर रहा है। 

    सवर्ण होने के नाते आरक्षण विरोध की थ्योरी पर उसे मेरे समर्थन की अपेक्षा थी। पर मैंने ये कहानी सुना दी। 

     अब उसे समझ मे आ गया कि सरकारी नौकरियां, सरकार किसी को कॉलेक्स, कोरोला, गणित, इतिहास, या मैक्सवेल थ्योरी रट लेने का इनाम बांटने को नही दी जाती। उन्हें सत्ता चलाने को लोग चाहिए, हर तबके से चाहिए। 

राष्ट्र का स्वरूप मेंटेन रखना है, तो सबको प्रतिनिधित्व देना होगा। गैरबराबरी वाले समाज मे आरक्षण एक मजबूरी है। और यह वेलफेयर स्टेट, लोकतंत्र की ब्यूटी है। 

     जिन सवर्ण घरों में आरक्षण को लेकर जनरल डिस्कोर्स, नकारात्मक है, शिकायती है, वे परिवार अपने बच्चो को, फेलियर के जस्टिफिकेशन का बहाना तैयार करके देते हैं।

   घर मे बकवास को समर्थन देने से बचिए, क्योंकि :

*बनवारी को राजा बनना था*

        उसने दुनिया का नक्शा निकाला, एक द्वीप खोजा। यहां कोई दस हजार लोग रहते थे, पुरातन तरीकों से जीते थे। 

     तो बनवारी ने 100 कारिंदे जुटाए, बन्दूक चलाने में उस्ताद। इनको लेकर वह द्वीप पर पहुँचा।

    एक एक कर सारे कबीलों को हरा दिया। राजा बन गया। 

अब दस हजार लोगों पर 100 लोग राज कर रहे थे। ताकत के जोर पर.. पर अंदर से कमजोर।क्योकि उन्हें पता था कि जिस दिन द्वीपवासियों में एका हुआ, इनका राज खत्म हो जाएगा। 

      लोकल सपोर्ट के लिए उसने राजव्यवस्था में लोकल लोगो को नियुक्त करना शुरू किया। राज चलाने के लिए बन्दूक चलाना आना चाहिए था। तो उसने पब्लिक सर्विस कमीशन की स्थापना कर दी। 

     कमीशन परीक्षा आयोजित करता, बन्दूकबाजी में जिसके ज्यादा मार्क्स आयें, उन्हें नियुक्त कर देता। लोकल लोगो में तीर भाले चलाने की प्रैक्टिस थी। बन्दूक चलाना आता ही नही था। 

      मगर मजबूरी थी, लेकिन राजा को लोकल सपोर्ट चाहिए था। इसलिए निशाना भले ही लगे या न लगे, जो बन्दूक सीधी पकड़कर दिखा दें, उन लोकल्स को चुन लेता। इसे शास्त्रों में आरक्षण नीति कहा गया। 

इसका खूब फायदा हुआ। बहुत से लोकल, राजा के चाकर बन गए। अपने ही लोगो से अलग रहने लगे। राजा का शासन स्थायी हुआ। 

      वक्त पंख लगाकर उड़ा। पांच सात पीढियां गुजर चुकी थी। द्वीप में आबादी बढ़ चुकी थी। दस हजार लोकल, बढ़कर एक लाख हो गए। राजा के साथ आये 100 लोग भी बढ़कर, 100 हो चुके थे। 

     पब्लिक सर्विस कमीशन अभी भी आरक्षण पर चलता था। साल में एक सौ पोस्ट निकालता, इसमे पचास लोकल्स के लिए रिजर्व होती। 

राजा के साथ आई कम्युनिटी वारियर थी। बचपन से ही बन्दूक उठा लेते। कम्पटीशन टफ था, वे 100 में से 90 निशाना लगाते तो मुश्किल से सफल हो पाते। 

     उधर लोकल्स में जो 35-40 निशाने लगा लेता, सफल हो जाता। जल्दी ही वारियर कम्युनिटी में असंतोष फैल गया। टैलेंट की तो कद्र ही नही इस देश मे। आरक्षण हटना चाहिए। 

    खूब आंदोलन हुआ, बसे फूंकी गयी, आत्मदाह हुए। सरकार गिर गयी, नए चुनाव हुए। 

*आंदोलनकारी सत्ता में आये, सरकार बनी :*

    सरकार को तो राज चलाना है। व्यवस्था बनाये रखनी है। आंदोलनकारी सरकार को अब समझ आयी, कि आरक्षण हटाया, तो बवाल हो जाएगा। एक लाख लोग का शासन में प्रतिनिधित्व नही होगा, एक हजार की कम्युनिटी से सारे पद भर जाएंगे। 

      तो नई सरकार ने आरक्षण नही हटाया। पर कुछ तो करना था। तो गरीबी के नाम पर “गरीब वारियर्स” को 10 परसेंट आरक्षण जोड़ दिया।

      नतीजा ये कि वारियर कम्युनिटी के “नॉन वारियर” टाइप निकम्मे भी गरीबी का तमगा लगाकर शासन में आने लगे।

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