Site icon अग्नि आलोक

सर्वविद

Share

मैं वो भी सुनता हूं
जो तुम कहते हो
मेरी पीठ के पीछे
चुपके से
फिर भी एक चुपी है,
लबों पर
क्योंकि आवरण है
मेरे विशुद्धि पर
अनाहत के मधुर स्वर का।

मैं वह भी देखता हूं
जो तुम औरों को
दिखाना नहीं चाहते
और खुद से कभी
छिपाना नहीं चाहते,
फिर भी एक निशब्दता है
होठों पर
क्योंकि आच्छादन है
मेरे दशम द्वार पर
सहस्त्रार की अखंड ज्योति का।

डॉ.राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)
(हिंदी अध्यापक)
पता-गांव जनयानकड़
पिन कोड -176038
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
rajivdogra1@gmail.com

Exit mobile version