मैं वो भी सुनता हूं
जो तुम कहते हो
मेरी पीठ के पीछे
चुपके से
फिर भी एक चुपी है,
लबों पर
क्योंकि आवरण है
मेरे विशुद्धि पर
अनाहत के मधुर स्वर का।
मैं वह भी देखता हूं
जो तुम औरों को
दिखाना नहीं चाहते
और खुद से कभी
छिपाना नहीं चाहते,
फिर भी एक निशब्दता है
होठों पर
क्योंकि आच्छादन है
मेरे दशम द्वार पर
सहस्त्रार की अखंड ज्योति का।
डॉ.राजीव डोगरा
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश (युवा कवि लेखक)
(हिंदी अध्यापक)
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